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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

यारी साहिब
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १२० ]
॥ गुरुदेव ॥
झूलना
गुरु के चरन की रज लै के, दोउ नैन के बिच अंजन दीया।
तिमिर मेटि उँजियार हुआ, निरंकार पिया को देखिलिया॥
कोटि सुरज तहँ छिपे घने, तीनि लोक धनी धन पाइ पिया।
सतगुरु ने जो करी किरपा, मरि के यारी जुग जुग जीया ॥
॥ अनहद शब्द ॥
(१)
झिलमिल झिलमिल बरखै नूरा,
नूर जहूर सदा भरपूरा ॥ १ ॥
रुनझुन रुनझुन अनहद बाजै,
भँवर गुँजार गगन चढ़ि गाजै ॥ २ ॥
रिमझिम रिमझिम बरखै मोती,
भयो प्रकास निरंतर जोती ॥ ३ ॥
निरमल निरमल निरमल नामा,
कह यारी तहँ लियो बिस्रामा ॥ ४ ॥
(२)
सुन्न के मुकाम मैं बेचून१ की निसानी है ॥ १ ॥
जिकिर२ रूह सोई अनहद बानी है ॥ २ ॥
अगम को गम्म नाहीं झलक पिसानी३ है ॥ ३ ॥
कहै यारी आपा चीन्हे सोई ब्रह्मज्ञानी है ॥ ४ ॥
(१) मालिक । (२) सुमिरन । (३) पेशानी माथा ।
१६

१४६ शब्द संग्रह
॥ प्रेम ॥
(१)
बिरहिनी मंदिर दियना बार ॥ टेक ॥
बिन बाती बिन तेल जुगति सौँ, बिन दीपक उँजियार ॥१
प्रान पिया मेरे गृह आयो, रचि पचि सेज सँवार ॥ २ ॥
सुखमन सेज परम तत रहिया, पिय निर्गुन निरकार ॥३॥
गावहु री मिलि आनंद मंगल, यारी मिलि के यार ॥४॥
(२)
होली
हौँ तो खेलौँ पिया सँग होरी ॥ १ ॥
दरस परस पतिबरता पिय की, छबि निरखत भइ बौरी ॥२
सोरह कला सँपूरन देखौँ, रबि ससि भे इक ठौरी ॥ ३ ॥
जब तैँ दृष्टि परी अबिनासी, लागो रूप ठगौरी ॥४॥
रसना रटत रहत निस बासर, नैन लगे यहि ठौरी ॥५॥
कह यारी भक्ती करू हरि की, कोई कहै सो कहौ री ॥६॥
॥ भेद ॥
(१)
झूलना
दोउ मूँदि के नैन अंदर देखा, नहिँ चाँद सुरज दिनरातिहैरे ।
रोसन समा बिनुतेल बाती, उस जोति सैँसैलिफानि¹हैरे॥
गोला मारि देखो आदम, कोउ अवर नाहिं सँगसाथिहैरे ।
यारी कहै तहकीक किया, तू मलकउलमौत² की जाति है रे ॥
(२)
झूलना
जमीँ बरखै असमान भींजै, बिन बातिहिँ तेल जलाइये जी।
जहाँ नूर तजल्ली³ बीच है रे, चैरंगी रंग दिखाइये जी ॥
(१) गुन। (२) जमराज । (३) प्रकाश।

यारी साहिब १४७
फूल बिना जदि फल होवै, नहि हीर¹ की लज्जत पाइये जी ।
यारो कहै यहि कौन बूझै, यह का सौं बात जनाइये जी ॥
॥ उपदेश ॥
(१)
कवित्त
गहने के गढ़े तैं कहौं सोनो भी जातु है ।
सोनो बीच गहनो और गहनो बीच सोन है ॥
भीतर भी सोनो और बाहर भी सोन दीसै ।
सोनो तो अचल अंत गहनो को मीच² है ॥
सोन को तो जानि लीजै गहनो बरबाद कीजै ।
यारी एक सोनो ता मैं ऊँच कवन नीच है ॥
(२)
झूलना
बिन बंदगी इस आलम में, खाना तुझे हराम है रे ।
बंदा करै सोइ बंदगी, खिदमत में आठो जाम है रे ॥
यारी मौला बिसारि के, तू क्या लागै बेकाम है रे ।
कुछ जीते बंदगी करले, आखिर को गौर³ मुकाम है रे ॥
॥ मिश्रित ॥
कवित्त
आँधरे को हाथी हरि, हाथ जा को जैसो आयो ।
बूझा जिन जैसो, तिन तैसोई बतायो है ॥ १ ॥
टकटोरी दिन रैन, हिये हू के फूटे नैन ।
आँधरे को आरसी मैं, कहा दरसायो है ॥ २ ॥
मूल की खबरि नाहिं, जा सौं यह भयो मुलुक ।
वा को बिसारि भौंदू, डारै⁴ अरुझायो है ॥ ३ ॥
आपनो सरूप रूप, आपु माहिं देखै नाहिं ।
कहै यारी आँधरे ने, हाथी कैसो पायो है ॥४॥
(१) तत्व, गूदा । (२) मृत्यु । (३) क़वर । (४) शाखा मैं ।

दरिया साहिब (बिहार वाले)
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १२१]
॥ अनहद ॥
होरी सद् संत समाज संतन गाइया ॥ टेक ॥
बाजा उमँग झाल झनकारा, अनहद धुन गहराइया ।
झरि झरि परत सुरंग रंग तहँ, कौतुक नभ मैं छाइया ॥१॥
राग रुबाध अघोर तान तहँ, झिनझिन जंतर लाइया ।
छवो राग छत्तीस रागिनी, गंधर्ब सुर सत्र गाइया ॥२॥
पाँच पचीस भवन मैं नाचहिँ, भर्म अबीर उड़ाइय ।
कह दरिया चित चन्दन चर्चित, सुन्दर सुभग सुहाइया ॥३॥
॥ विरह ॥
अमर पति प्रीतम काहे न आवो ।
तुम सत बर्ग है, ऋतु सुहावन, किमि नहिँ उर गहि लावोँ ॥१
बरषा विबिधि प्रकार पवन अति, गरजि घुमरि गहरावा ।
बुन्द अखंडित मंडित महि पर, छटा चमक चहुँ जावो ॥२
झींगुर झनकि झनकि झनकारहि, बान विरह उर लावो ।
दादुर मोर सोर सघन बन, पिय बिनु कछु न सुहावो ॥३॥
सरिता उमडि घुमडि जल छावो, लघु दीर्घ सत्र बढ़ियावो ।
थाके पंथ पथिक नहिँ आवत, नैनन मैं झरि लावोँ ॥४॥
केहि पूछौं पछितावत दिल मैं, जो पर होइ उड़ि धावौँ ।
जो पिय मिलैं तो मिलौं प्रेम भरि, अमि भाजन भरि लावों १ ॥५॥
है बिस्वास आस दिल मेरे, फिरि दृग दर्शन पावैँ ।
कह दरिया धन भाग सुहागिनि, चरन कँवल लपटावो ॥६॥
(१) अमृत से बरतन को भर लूँ ।

दरिया साहिब (बिहार वाले) १४६
॥ प्रेम ॥
तुम मेरो साँई मैं तेरो दास, चरन कँवल चित मेरो बास ॥१॥
पल पल सुमिराँ नाम सुबास, जीवन जग मैं देखो दास ॥२॥
जल मैं कुमुदिनि चन्द अकास, छाड़ रहा छत्रिपहुपबिलास ॥३
उनमुनि गगन भया परगास, कह दरिया मेटा जम त्रास' ४
॥ विनय ॥
(१)
अब के बार बकस मोरे साहिब ।
तुम लायक सब जोग हे ॥ १ ॥
गुनह१ बकसिहै सब भ्रम नसिहै ।
रखिहै आपन पास हे ॥ २ ॥
अच्छै बिरिछि तरि लै बैठैहै ।
तहवाँ धूप न छाँह हे ॥ ३ ॥
चाँद न सुरज दिवस नहिँ तहवाँ ।
नहिँ निसु होत बिहान हे ॥ ४ ॥
अमृत फल मुख चाखन दैहै ।
सेज सुगन्धि सुहाय हे ॥ ५ ॥
जुग जुग अचल अमर पद दैहै ।
इतनी अरज हमार हे ॥ ६ ॥
भौसागर दुख दारुन मिटि है ।
छुटि जैहै कुल परिवार हे ॥ ७ ॥
कह दरिया यह मंगल मूला ।
अनूप फुलै जहाँ फूल हे ॥ ८ ॥
(२)
मैं जानहुँ तुम दीन-दयाल ।
तुम सुमिरे नहिँ तपत काल ॥ १ ॥
(१) पाप, दोष ।

१५० शब्द संग्रह
ज्यौं जननी प्रतिपाले सूत¹ ।
गर्भ बास जिन दियो अकूत ॥ २ ॥
जठर अगिनि तैं लियो है काढ़ि ।
ऐसी वा की ठवर गाढ़ि ॥ ३ ॥
गाढ़े जो जन सुमिरन कीन्ह ।
परघट जग मैं तेहि गति दीन्ह ॥ ४ ॥
गरबी मारेउ गैब बान ।
संत को राखेउ जीव जान ॥ ५ ॥
जल मैं कुमुदिनि इन्दु² अकास ।
प्रेम सदा गुरु चरन पास ॥ ६ ॥
जैसे पपिहा जल से नेह ।
बुन्द एक बिस्वास तेह ॥ ७ ॥
स्वर्ग पताल मृत मंडल तीनि ।
तुम ऐसे साहिब मैं अधीन ॥ ८ ॥
जानि आयो तुम चरन पास ।
निज मुख बोलेउ कहेउ दास ॥ ९ ॥
सत पुरुष बचन नहिं होहिं आन ।
बलु पूरब से पच्छिम उगहि भान ॥ १० ॥
कह दरिया तुम हमहिँ एक ।
ज्यौं हारिल की लकड़ी टेक³ ॥ ११ ॥
॥ भेद ॥
मानु सबद जो करु बिबेक ।
अगम पुरुष जहँ रूप न रेख ॥ १ ॥
(१) पुत्र । (२) चंद्रमा । (३) हारिल चिड़िया चंगुल में लकड़ी पकड़े बिना
ज़मीन पर नहीं उतरती ।

दरिया साहिब (बिहार वाले) १५१
अठदल कँवल सुरति लौ लाय ।
अजपा जपि के मन समुझाय ॥ २ ॥
भँवरगुफा मैं उलटि जाय ।
जगमग जोति रहे छवि छाय ॥ ३ ॥
बंक नाल गहि खैंचे सूत ।
चमके बिजुली जोती बहुत ॥ ४ ॥
सेत घटा चहुँ ओर घनघोर ।
अजरा जहवाँ होय अँजोर ॥ ५ ॥
अमिय कँवल निज करै बिचार ।
चुवत बुन्द जहँ अमृत धार ॥ ६ ॥
छव चक्र खोजि करै निवास ।
मूल चक्र जहँ जिव को बास ॥ ७ ॥
काया खोजि जोगी भुलान ।
काया बाहर पद निरबान ॥ ८ ॥
सतगुर सबद जो करै खोज ।
कहैं दरिया तब पूरन जोग ॥ ६ ॥
॥ उपदेश ॥
(१)
पेड़ को पकरु तब डारि पालो मिलै ।
डारि गहि पकर नहिं पेड़ याग¹ ॥
देख दिब दृष्टि अस्मान में चन्द्र है ।
चन्द्र की जोति अनगिनित तारा ॥ १ ॥
आदि औ अंत सब मध्य है मूल मैं ।
मूल मैं फूल धौं केति डारा ॥
(१) हे यार पेड़ पकड़ने से डाल पत्ती भी मिल जायगी पर डाल के पकड़ने
से पेड़ नहीं हाथ आवैगा ।

१५२ शब्द संग्रह
नाम निर्गुन निर्लेप निर्मल बरै ।
एक से अनँत सब जगत सारा ॥ २ ॥
पढ़ि बेद कितेब बिस्तार वक्ता कथै ।
हांरि बेचून वह नूर न्यारा ॥
निर्पँच निर्बान निःकर्म निःभर्म वह ।
एक सर्बज्ञ सत नाम प्यारा ॥ ३ ॥
तजु मान मनी करु काम को काबू१ यह ।
खोजु सतगुरु भरपूर सूरा ॥
असमान कै बुन्द गरकाब२ हूआ ।
दरियाव की लहरि कहि बहुरि मूरा३ ॥ ४ ॥
(२)
भीतर मैलि चहल४ कै लागी, ऊपर तन का धोवै है ॥१॥
अविगति मूरति महल के भीतर, वा का पंथ न जोवै है ॥२॥
जुगुति बिना कोइ भेद न पावै, साधुसंगति का गोवै है ॥३
कह दरिया कुटने रे गीदी५, सीस पटकि का रोवै है ॥४॥
॥ मिश्रित ॥
सत सुकृत दूनौँ खंभा हो, सुखमनि लागलि डोरि ।
[L

दरिया साहिब (माड़चार वाले। १५३
कौन झुलावै कौन भूलहिँ हो, कौन बैठालि खाट ।
कौन पुरुष नहिँ झूलहिँ हो, कौन रोकै बाट ॥ ४ ॥
मन रे झुलावै जिव भूलहिँ हो, सक्ति बैठालि खाट ।
सत्त पुरुष नहिँ झूलहिँ हो, कुमति रोकै बाट ॥ ५ ॥
सुर नर मुनि सब झूलहिँ हो, झूलहिँ तीनि देव ।
गनपति फनपति¹ झूलहिँ हो, जोगि जती सुकदेव ॥६॥
जीव जंतु सब झूलहिँ हो, झूलहिँ आदि गनेस ।
कल्प कोटि लै झूलहिँ हो, कोइ कहै न सँदेस ॥ ७ ॥
सत्त सब्द जिन पावल हो, भयो निर्मल दास ।
कहै दरिया दर देखिय हो, जाय पुरुष के पास ॥ ८ ॥
दरिया साहिब (मारवाड़ वाले)
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १२६]
॥ नाम ॥
नाम बिन भाव करम नहिँ छूटै ॥ टेक ॥
साध संग औ राम भजन बिन, काल निरंतर लूटै ॥ १ ॥
मल सेती जो मल को धोवै, सो मल कैसे छूटै ॥ २ ॥
प्रेम का साबुन नाम का पानी, दुइ मिलि ताँता टूटै ॥ ३ ॥
भेद अभेद भरम का भाँडा, चौड़े परि परि फूटै ॥ ४ ॥
गुरुमुख सबद गहै उर अंतर, सकल भरम से छूटै ॥ ५ ॥
राम का ध्यान धरहु रे प्रानी, अमृत का मैँह बूटै² ॥६॥
जन दरियाव अरप दे आपा, जरा मरन तब टूटै ॥ ७ ॥
(१) शेष नाग । (२) बरसै ।
२०

१५४ शब्द संग्रह
॥ प्रेम ॥
(१)
बाबल१ कैसे बिसरा जाई ।
यदि मैं पति सँग रल खेलूँगी, आपा धरम समाई ॥टेक॥
सतगुर मेरे किरपा कीन्ही, उत्तम बर परनाई२ ।
अब मेरे साईँ को सरम पड़ेगी, लेगा चरन लगाई ॥१॥
थे३ जानराय मैं बाली भोली, थे निर्मल मैं मैली ।
वे बतरायें४ मैं बोल न जानूँ, भेद न सकूँ सहेली ॥ २ ॥
थे ब्रह्म भाव मैं आतम कन्या, समझ न जानूँ बानी ।
दरिया कहै पति पूरा पाया, यह निश्चय करि जानी ॥३॥
(२)
कहा कहूँ मेरे पिउ की बात ।
जो रे कहूँ सोइ अंग सुहात ॥ टेक ॥
जब मैं रही थी कन्या क्वारी ।
तब मेरे करमे हता५ सिर भारी ॥ १ ॥
जब मेरी पिउ से मनसा दौड़ी ।
सतगुर आन सगाई जोड़ी ॥ २ ॥
तब मैं पिउ का मंगल गाया ।
जब मेरा स्वामी ब्याहन आया ॥ ३ ॥
हथलेवा दै बैठी संगा ।
तब मोहिँ लीन्ही बायें अंगा ॥ ४ ॥
जन दरिया कहै मिटि गइ दूती६ ।
आपा अरपि पीव सँग सूती ॥ ५ ॥
(१) बाप । (२) ब्याह कराया । (३) तुम । (४) बात करें । (५) था । (६) द्वैत भाव ।

दरिया साहिब (मारवाड़ वाले)
॥ भेद ॥
पतिव्रता पति मिली है लाग ।
जहँ गगन मँडल में परम भाग ॥ टेक ॥
जहँ जल बिन कँवला बहु अनंत ।
जहँ बपु¹ बिन भौंरा गोह² करंत ॥ १ ॥
अनहद बानी अगम खेल ।
जहँ दीपक जरै बिन बाती तेल ॥ २ ॥
जहँ अनहद सबद है करत घोर ।
बिन मुख बोलै चात्रिक मोर ॥ ३ ॥
बिन रसना गुन उदत³ नार ।
बिन पग पातर निरतकार⁴ ॥ ४ ॥
जहँ जल बिन सरवर भरा पूर ।
जहँ अनँत जोत बिन चंद सूर ॥ ५ ॥
बारह मास जहँ रितु बसंत ।
ध्यान धरैं जहँ अनँत संत ॥ ६ ॥
त्रिकुटी सुखमन चुवत छीर ।
बिन बादल वरखै मुक्ति नीर ॥ ७ ॥
अमृत धारा चलै सीर⁵ ।
कोइ पीवै बिरला संत धीर ॥ ८ ॥
ररंकार धुन अरूप एक ।
सुरत गही उनहीं की टेक ॥ ९ ॥
जन दरिया बैराट चूर ।
जहँ बिरला पहुँचे संत सूर ॥ १० ॥
) शरीर । (२) गुंजार । (३) गाती है। (४) वेश्या नाचती है। (५) ठंडी ।

१५६ शब्द संग्रह
॥ पारख ॥
जा के उर उपजी नहिँ भाई ।
सो क्या जाने पीर पराई ॥ टेक ॥
ब्यावर१ जानै पीर की सार ।
बाँझ नार क्या लखै बिकार ॥ १ ॥
पतिव्रता पति को व्रत जानै ।
बिभचारिनि मिलि कहा बखानै ॥ २ ॥
हीरा पारख जौहरि पावै ।
मूरख निरख के कहा बतावै ॥ ३ ॥
लागा घाव कराहै सोई ।
कौतुकहार२ के दर्द न कोई ॥ ४ ॥
राम नाम मेरा प्रान-अधार ।
सोई राम रस पीवनहार ॥ ५ ॥
जन दरिया जानैगा सोई ।
(जाके) प्रेम की झाल कलेजे पोई ॥ ६ ॥
॥ मिश्रित ॥
संतो कहा गृहस्थ कहा त्यागी ।
जेहि देखूँ तेहि बाहर भीतर, घट घट माया लागी ॥टेक॥
माटी की भीत पवन का थंभा, गुन औगुन से छाया ।
पाँच तत्त आकार मिलाकर, सहजाँ गिरह बनाया ॥१॥
मन भयो पिता मनसा भइ माई, दुख सुख दोनों भाई ।
आसा तृस्ना बहिनैँ मिलकर, गृह की साँज३ बनाई ॥२॥
मोह भयो पुरुष कुबुधि भइ घरनी४, पाँचो लड़का जाया ।
प्रकृति अनंत कुटुंबी मिलकर, कलहल५ बहुत उपाया ॥३॥
(१) लड़कोरी । (२) बनाघट करने वाला, तमाशा देखने वाला । (३) सामान ।
(४) स्त्री । (५) झगड़ा ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण है:

लड़कौं के सँग लड़की जाई, ता का नाम अधोरी ।
वन मैं बैठी घर घर डोलै, स्वास्थ संग खपी री ॥ ४ ॥
पाप पुन्य दोउ पड़ पड़ोसी, अनँन वासना नाती ।
राग द्वेष का बंधन लागा, गिरह बना उतपाती ॥ ५ ॥
कोइ गृह माँडि¹ गिरह मैं बैठा, वैरागी वन बासा ।
जन दरिया इक राम भजन बिन, घट घट सँचर बासा ॥६॥
दूलनदासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १३३ ]
॥ नाम महिमा ॥
(१)
कोइ बिरला यहि बिधि नाम कहै ॥ टेक ॥
मंत्र अमोल नाम दुइ अच्छर, विनु रसना रट लागि रहै ॥१॥
होठ न डोलै जीभ न बोलै, सूरति धरनि दिढ़ाइ गहै ॥२॥
दिन औ राति रहै सुधि लागी, यहि माला यहि सुमिरन है ॥३
जन दूलन सत

१५ शब्द संग्रह
जगजिवन सतगुरु कृपा पूरन, सुफल भे जन काज ।
धनि भाग दूलनदास तेरे, भक्ति तिलक बिराज ॥ ४ ॥
(३)
मन वहि नाम की धुनि लाउ ।
रटु निरंतर नाम केवल, अवर सब बिसराउ ॥ १ ॥
साधि सूरति आपनो, करि सुवा१ सिखर२ चढ़ाउ ।
पोखि प्रेम प्रतीत तैं, कहि राम नाम पढ़ाउ ॥ २ ॥
नामही अनुरागु निसु दिन, नाम के गुन गाउ ।
बनी तौ का अबहिँ, आगे और बनी बनाउ ॥ ३ ॥
जगजिवन सतगुरु बचन साचे, साच मन माँ लाउ ।
करु बास दूलनदास सत माँ, फिरि न यहि जग आउ॥४॥
(४)
जब गज अरध नाम गुहरायो ।
जब लगि आवै दूसर अच्छर, तब लगि आपुहि धायो ॥१॥
पाँय पियादे भे करुनामय, गरुड़ासन बिसरायो ।
धाय गजंद गोद प्रभु लीन्हो, आपनि भक्ति दिढ़ायो ॥२॥
मीरा को बिष अमृतं कीन्हो, बिमल सुजस जग छायो ।
नामदेव हित कारन प्रभु तुम, मिरतक गाय जियायो ॥३॥
भक्त हेत तुम जुग जुग जनमेउ, तुमहिँ सदा यह भायो ।
बलि बलि दूलनदास नाम की, नामहिँ तैं चित लायो ॥४॥
॥ भेद ॥
(१)
साईँ तेरो गुप्त मर्म हम जानी ।
कस करि कहैँ बखानी ॥ टेक ॥
सतगुरु संत भेद मोहिँ दीन्हा, जग से राखा छानी ।
निज घर का कोउ खोज न कीन्हा, करम भरम अटकानी ॥१॥
(१) तोता । (२) पहाड़ की चोटी ।

निज घर है वह अगम अपारा, जहाँ बिराजै स्वामी ।
ता के परे अलोक अनामी, जा का रूप न नामी ॥२॥
त्रम्ह रूप धरि सृष्टि उपाई, आप रहा अलगानी ।
वेद कितेब की रचन रचाई, दस औतार धरानी ॥ ३ ॥
निज माता सीता सोइ राधा, जिन पितु राम सुवामी ।
दोउ मिलि जीवन बंद छुड़ाया, निज पद मैं दिया ठामी ॥४॥
दूलनदास के साईं जगजीवन, निज सुत जक्त पठानी ।
मुक्ति द्वार की कूँची दीन्ही, ता तैं कुलुफ खुलानी ॥५॥

दोहा

दूलन यह मत गुप्त है, प्रगट न करौ बखान ।
ऐसे राखु छिपाय मन, जस बिधवा औधान ॥ ६ ॥

(२)

देख आयोँ मैं तो साईँ की सेजरिया ।
साईँ की सेजरिया सतगुरु की डगरिया ॥ १ ॥
सबदहि ताला सबदहि कूँची, सबद की लगी है जँजिरिया ॥२
सबद ओढ़ना सबद बिछौना, सबद की चटक चुनरिया ॥३॥
सबद सरूपी स्वामी आप बिराजैँ, सीस चरन मैं धरिया ॥४
दूलनदास भजु साईँ जगजीवन, अगिन से अहँग उजरिया५

॥ चितावनी ॥

(१)

पछितान क्या दिन जात बीते, समुझ करु नर चेत रे ।
अंध तेरे कंध सिर पर, काल डंका देत रे ॥ १ ॥
हुसियार है गुन गाव प्रभु के, ठाढ़ रहु गुरु खेत रे ।
ताके रहै छूटै नहीं, जिमि राहु रवि ससि केत रे ॥ २ ॥
जम द्वार तर सब पीसिगे, चर अचर निन्दक जेत रे ।
नहिँ पियत अमृत नाम रस, भरिस्वास सुरति सचेत रे ॥३

१६० शब्द संग्रह
मद मोह महुवा दाख दुख, बिष का पियाला लेत रे ।
जग नात गोत बिसारि सब, हर दम गुरू से हेत रे ॥४॥
सगलौ सुपन अपना वही, जिस रोज परत संकेत रे ।
वह आइ सिरजनहार हरि, सतनाम भौजल सेत रे ।
जन दूलन सतगुरु चरन बंदत, प्रेम प्रीति समेत रे ॥५॥
(२)
तू काहे को जग में आया, जो पै नाम से प्रीति न लाया रे॥टेक
तृस्ना काम स्वाद घनेरे, मन से नहिं बिसराया रे ।
भोग बिलास आस निस बासर, इतउत चित भरमाया रे॥१
त्रिकुटी तीरथ प्रेम जल निर्मल, सुरत नहीं अन्हवाया रे ।
दुर्मति करम मैल सत्र मन के, सुमिरि सुमिरि न छुड़ाया रे॥२
कहँ से आयो कहँ को जैहै, अंत खोज नहिं पाया रे ।
उपजि उपजि के बिनसि गये सब, काल सबै जग खाया रे॥३
कर सतसंग आपने अंतर, तजि तन मोह औ माया रे ।
जन दूलन बल बल सतगुरु के, जिन मोहिं अलख लखाया रे४
॥ उपदेश ॥
(१)
बोल मनुआँ राम राम ॥ टेक ॥
सत्त जपना और सुपना, जिकर लावो अष्ट जाम ॥ १ ॥
समुझि बूझि बिचारि देखो, पिंड पिँजरा धूम धाम ॥ २ ॥
बालमीकि हवाल पूछो, जपत उलटा सिद्ध काम ॥ ३ ॥
दास दूलन आस प्रभु की, मुक्ति-करता सत्तनाम ॥ ४ ॥
दोहा
राम नाम दुइ अच्छरै, रटै निरंतर कोय ।
दूलन दीपक बरि उठै, मन परतीत जु होय ॥५॥

दूलनदासजी १६१
(२)
जागु जागु आतमा, पुरान दाग धोउ रे ।
कर्म भर्म दूर करु, कीच काम खोउ रे ॥ १ ॥
अपनी सुधि भूलि गई, और की क्या टोउ रे ।
सत्त बात झूठ करै, झूठ ही को गोउ¹ रे ॥ २ ॥
इहै बात जानि जानि, द्वार द्वार रोउ रे ।
सत्तर पानी साबुन का, प्रेम पानी सोउ² रे ॥ ३ ॥
लाग दाग धोय डारु, वाह वाह होउ रे ।
दूलन बेकूफ³ काम, गाफिल ह्वै न सोउ रे ॥ ४ ॥
(३)
चलो चढ़ौ मन यार महल अपने ॥ टेक ॥
चौक चाँदनी तारे झलकैं, बरनत बनत न जात गने ॥ १ ॥
हीरा रतन जड़ाव जड़े जहँ, मोतिन कोटि वितान बने ॥२
सुखमन पलँग सहज बिछौना, सुख सोवै को करै मने ॥३॥
दूलनदास के साईं जगजीवन, को आवै यह जग सुपने ॥४॥
(४)
जोगी चेत नगर मैं रहौ रे ॥ टेक ॥
प्रेम रंग रस ओढ़ चदरिया, मन तसबीह गहौ रे ॥ १ ॥
अन्तर लाओ नामहि की धुनि, करम भरम सब धो रे ॥ २॥
सूरत साधि गहो सत मारग, भेद न प्रगट कहो रे ॥३॥
दूलनदास के साईं जगजीवन, भवजल पार करो रे ॥ ४ ॥
(५)
प्रानी जपि ले तू सतनाम ॥ टेक ॥
मात पिता सुत कुटुम कबीला, यह नहिं आवैं काम ।
सब अपने स्वारथ के संगी, संग न चलै छदाम ॥ १ ॥
(१) छिपा कर रखना, पकड़े रहना । (२) थोड़े पानी से भिंगाना। (३) मूर्ख ।
२१

१६२ शब्द संग्रह
देना लेना जो कुछ होवै, करिले अपना काम ।
आगे हाट बजार न पावै, कोइ नहिं पावै ग्राम ॥ २ ॥
काम क्रोध मद लोभ मोह ने, आन बिछाया दाम ।
क्यों मतवारा भया बावरे, भजन करो निःकाम ॥ ३ ॥
यह नर देही हाथ न आवै, चल तू अपने धाम ।
अब की चूक माफ नहि होगी, दूलन अचल मुकाम ॥ ४ ॥
(६)
राम राम रटु राम राम सुनु, मनुवाँ सुवा सलोना रे ॥टेक॥
तन हरियाले बदन¹ सुलाले, बोल अमोल सुहौना रे ॥१॥
सत्त तंत्र अरु सिद्ध मंत्र पढ़ु, सोई मृतक जियौना रे ॥२॥
सुबचन तेरे भौजल बेरे², आवागवन मिटौना रे ॥३॥
दुलनदास के साईँ जगजीवन, चरन सनेह दृढ़ौना रे ॥४॥
(७)
मन रहि जा चरनन सीस धरी, लागि रहै धुनि हरी हरी ॥१
तोहि समझावौं घरी घरी, कुमति बिपति तोरि जाय टरी ॥२
पाँच पचीसो एक करी, पियहु दरस रस पेट भरी ॥ ३ ॥
हारे बहुत बहुत रगरी³, चरन प्रीति बिन कछु न सरी ॥४॥
चरन प्रभाव जानु कुबरी⁴, परसत गौतम नारि तरी⁵ ॥५॥
साईँ जगजीवन कृपा करी, जन दूलन परतीत परी ॥६॥
॥ बिनय ॥
(१)
साईँ हो गरीब निवाज ॥ टेक ॥
देखि तुम्हें घिन लागत नाहीं, अपने सेवक कै साज ॥१॥
मोहिँ अस निलज न यहि जग कोऊ, तुम ऐसे प्रभु लाज जहाज ॥२
(१) चिहरा। (२) बेड़ा, नाव। (३) थक कर। (४) कुबजा जिसकी पीठ
का कूब श्रीकृष्ण ने अपने चरण से सीधा किया। (५) गौतम की नारी अहिल्या
जो सराप बस शिला बनी पड़ी थी और श्रीरामचन्द्र के चरण लगाने से तरी।

दूलनदासजी १६३
और कछू हम चाहित नाहीं, तुम्हारे नाम चरन तैं काज ॥३॥
दूलनदास गरीब निवाजहु, साईँ जगजीवन महराज ॥४॥
(२)
साईँ दरस माँगौँ तोर, अपने जन जानि साईँ मान राखहु मोर ॥१॥
अपथ१ पंथ न सूझि इत उत, प्रबल पाँचो चोर ।
भजन केहि विधि करौँ साईँ, चलत नाहीं जोर ॥ २ ॥
नात लाइ दुरात२ काहे, पतित जन की दौर ।
बचन अवधि३ अधार मेरे, आसरा नहिं और ॥ ३ ॥
हेरिये करि कृपा जन तन, ललित४ लोचन कोर ।
दास दूलन सरन आयो, राम बंदी-छोर ॥ ४ ॥
(३)
साईँ तेरे कारन नैना भये बैरागी ।
तेरा सत दरसन चहौँ, कछु और न माँगौ ॥ १ ॥
निसु बासर तेरे नाम की, अंतर धुनि जागी ।
फेरत हौँ माला मनौँ५, अँसुवन भरि लागी ॥ २ ॥
पलक तजी इत उक्ति तैँ६, मन माया त्यागी ।
दृष्टि सदा सत सनमुखी, दरसन अनुरागी ॥ ३ ॥
मदमाते राते मनौँ५, दाधे बिरह आगी ।
मिलि प्रभु दूलनदास के, करु परम सुभागी ॥ ४ ॥
(४)
सुनहु दयाल मोहिँ अपनावहु ॥ टेक ॥
जन मन लगन सुधारन साईँ, मोरि बनै जो तुम्हहिँ बनावहु१
इत उत चित्त न जाइ हमारा, सूरत चरन कमल लपटावहु॥२
तबहूँ अब मैं दास तुम्हारा, अर्ज जिनि बिसरै। जिनि बिसरावहु॥३
दूलनदास के साईँ जगजीवन, हमहूँ कौँ भक्तन माँ लावहु॥४
(१) कुराह। (२) हटाते हो। (३) प्रतिज्ञा। (४) सुंदर, मोहनी। (५) गोया
कि। (६) इधर अर्थात संसार की चतुरता (उक्ति) की ओर से आँख मूँद ली।

१६४ शब्द संग्रह
(५)
साईँ सुनहु बिनती मोरि ॥ टेक
बुधि बल सकल उपाय-हीन मैं, पाँयन परौँ दोऊ कर जोरि १
इत उत कतहूँ जाइ न मनुवाँ, लागि रहै चरनन माँ डोरि ॥२
राखहु दासहिँ पास आपने, कस को सकिहै तोरि ॥३॥
आपन जानि कै मेटहु मेरे, औगुन सब क्रम भ्रम खोरि¹ ॥४॥
केवल एक हितू तुम मेरे, दुनियाँ भरी लाख करोरि ॥५॥
दुलनदास के साईँ जगजीवन, माँगौँ सत दरस निहोरि ॥६॥
(६)
साईँ भजन ना करि जाइ ।
पाँच तसकर संग लागे, मोहिँ हरकत² धाइ ॥ १ ॥
चहत मन सतसंग करना, अधर बैठि न पाइ ।
चढ़त उतरत रहत छिन छिन, नाहिँ तहँ ठहराइ ॥२॥
कठिन फाँसी अहै जग की, लियो सबहिँ बझाइ ।
पास मन मनि नैन निकटहिँ, सत्य गयो भुलाइ ॥ ३ ॥
जगजिवन सतगुरु करहु दाया, चरन मन लपटाइ ।
दास दूलन बास सत माँ, सुरत नहिँ अलगाइ ॥ ४ ॥
(७)
प्रभु तुम किहेउ कृपा बरियाईँ³ ।
तुम कृपाल मैं कृपा अलायक,⁴ समुझि निवजतेहु साईँ ॥१॥
कूकुर धोये होइ न बाछा,⁵ तजै न नीच निचाई ।
बगुला होइ न मानस-बासी,⁶ बसहि जे बिषै तलाई ॥२॥
(१) कसर, ऐब । (२) रोकते हैं । (३) ज़बरदस्ती । (४) अजोग ।
(५) गऊ का बच्चा । (६) मानसरोवर का बासी ।