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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 267 में से

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पृष्ठ 157

दरिया साहिब (बिहार वाले)
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १२१]
॥ अनहद ॥
होरी सद् संत समाज संतन गाइया ॥ टेक ॥
बाजा उमँग झाल झनकारा, अनहद धुन गहराइया ।
झरि झरि परत सुरंग रंग तहँ, कौतुक नभ मैं छाइया ॥१॥
राग रुबाध अघोर तान तहँ, झिनझिन जंतर लाइया ।
छवो राग छत्तीस रागिनी, गंधर्ब सुर सत्र गाइया ॥२॥
पाँच पचीस भवन मैं नाचहिँ, भर्म अबीर उड़ाइय ।
कह दरिया चित चन्दन चर्चित, सुन्दर सुभग सुहाइया ॥३॥
॥ विरह ॥
अमर पति प्रीतम काहे न आवो ।
तुम सत बर्ग है, ऋतु सुहावन, किमि नहिँ उर गहि लावोँ ॥१
बरषा विबिधि प्रकार पवन अति, गरजि घुमरि गहरावा ।
बुन्द अखंडित मंडित महि पर, छटा चमक चहुँ जावो ॥२
झींगुर झनकि झनकि झनकारहि, बान विरह उर लावो ।
दादुर मोर सोर सघन बन, पिय बिनु कछु न सुहावो ॥३॥
सरिता उमडि घुमडि जल छावो, लघु दीर्घ सत्र बढ़ियावो ।
थाके पंथ पथिक नहिँ आवत, नैनन मैं झरि लावोँ ॥४॥
केहि पूछौं पछितावत दिल मैं, जो पर होइ उड़ि धावौँ ।
जो पिय मिलैं तो मिलौं प्रेम भरि, अमि भाजन भरि लावों १ ॥५॥
है बिस्वास आस दिल मेरे, फिरि दृग दर्शन पावैँ ।
कह दरिया धन भाग सुहागिनि, चरन कँवल लपटावो ॥६॥
(१) अमृत से बरतन को भर लूँ ।