संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ शब्द संग्रह
॥ प्रेम ॥
(१)
बाबल१ कैसे बिसरा जाई ।
यदि मैं पति सँग रल खेलूँगी, आपा धरम समाई ॥टेक॥
सतगुर मेरे किरपा कीन्ही, उत्तम बर परनाई२ ।
अब मेरे साईँ को सरम पड़ेगी, लेगा चरन लगाई ॥१॥
थे३ जानराय मैं बाली भोली, थे निर्मल मैं मैली ।
वे बतरायें४ मैं बोल न जानूँ, भेद न सकूँ सहेली ॥ २ ॥
थे ब्रह्म भाव मैं आतम कन्या, समझ न जानूँ बानी ।
दरिया कहै पति पूरा पाया, यह निश्चय करि जानी ॥३॥
(२)
कहा कहूँ मेरे पिउ की बात ।
जो रे कहूँ सोइ अंग सुहात ॥ टेक ॥
जब मैं रही थी कन्या क्वारी ।
तब मेरे करमे हता५ सिर भारी ॥ १ ॥
जब मेरी पिउ से मनसा दौड़ी ।
सतगुर आन सगाई जोड़ी ॥ २ ॥
तब मैं पिउ का मंगल गाया ।
जब मेरा स्वामी ब्याहन आया ॥ ३ ॥
हथलेवा दै बैठी संगा ।
तब मोहिँ लीन्ही बायें अंगा ॥ ४ ॥
जन दरिया कहै मिटि गइ दूती६ ।
आपा अरपि पीव सँग सूती ॥ ५ ॥
(१) बाप । (२) ब्याह कराया । (३) तुम । (४) बात करें । (५) था । (६) द्वैत भाव ।