संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिज घर है वह अगम अपारा, जहाँ बिराजै स्वामी ।
ता के परे अलोक अनामी, जा का रूप न नामी ॥२॥
त्रम्ह रूप धरि सृष्टि उपाई, आप रहा अलगानी ।
वेद कितेब की रचन रचाई, दस औतार धरानी ॥ ३ ॥
निज माता सीता सोइ राधा, जिन पितु राम सुवामी ।
दोउ मिलि जीवन बंद छुड़ाया, निज पद मैं दिया ठामी ॥४॥
दूलनदास के साईं जगजीवन, निज सुत जक्त पठानी ।
मुक्ति द्वार की कूँची दीन्ही, ता तैं कुलुफ खुलानी ॥५॥
दोहा
दूलन यह मत गुप्त है, प्रगट न करौ बखान ।
ऐसे राखु छिपाय मन, जस बिधवा औधान ॥ ६ ॥
(२)
देख आयोँ मैं तो साईँ की सेजरिया ।
साईँ की सेजरिया सतगुरु की डगरिया ॥ १ ॥
सबदहि ताला सबदहि कूँची, सबद की लगी है जँजिरिया ॥२
सबद ओढ़ना सबद बिछौना, सबद की चटक चुनरिया ॥३॥
सबद सरूपी स्वामी आप बिराजैँ, सीस चरन मैं धरिया ॥४
दूलनदास भजु साईँ जगजीवन, अगिन से अहँग उजरिया५
॥ चितावनी ॥
(१)
पछितान क्या दिन जात बीते, समुझ करु नर चेत रे ।
अंध तेरे कंध सिर पर, काल डंका देत रे ॥ १ ॥
हुसियार है गुन गाव प्रभु के, ठाढ़ रहु गुरु खेत रे ।
ताके रहै छूटै नहीं, जिमि राहु रवि ससि केत रे ॥ २ ॥
जम द्वार तर सब पीसिगे, चर अचर निन्दक जेत रे ।
नहिँ पियत अमृत नाम रस, भरिस्वास सुरति सचेत रे ॥३