संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 156, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंयारी साहिब १४७
फूल बिना जदि फल होवै, नहि हीर¹ की लज्जत पाइये जी ।
यारो कहै यहि कौन बूझै, यह का सौं बात जनाइये जी ॥
॥ उपदेश ॥
(१)
कवित्त
गहने के गढ़े तैं कहौं सोनो भी जातु है ।
सोनो बीच गहनो और गहनो बीच सोन है ॥
भीतर भी सोनो और बाहर भी सोन दीसै ।
सोनो तो अचल अंत गहनो को मीच² है ॥
सोन को तो जानि लीजै गहनो बरबाद कीजै ।
यारी एक सोनो ता मैं ऊँच कवन नीच है ॥
(२)
झूलना
बिन बंदगी इस आलम में, खाना तुझे हराम है रे ।
बंदा करै सोइ बंदगी, खिदमत में आठो जाम है रे ॥
यारी मौला बिसारि के, तू क्या लागै बेकाम है रे ।
कुछ जीते बंदगी करले, आखिर को गौर³ मुकाम है रे ॥
॥ मिश्रित ॥
कवित्त
आँधरे को हाथी हरि, हाथ जा को जैसो आयो ।
बूझा जिन जैसो, तिन तैसोई बतायो है ॥ १ ॥
टकटोरी दिन रैन, हिये हू के फूटे नैन ।
आँधरे को आरसी मैं, कहा दरसायो है ॥ २ ॥
मूल की खबरि नाहिं, जा सौं यह भयो मुलुक ।
वा को बिसारि भौंदू, डारै⁴ अरुझायो है ॥ ३ ॥
आपनो सरूप रूप, आपु माहिं देखै नाहिं ।
कहै यारी आँधरे ने, हाथी कैसो पायो है ॥४॥
(१) तत्व, गूदा । (२) मृत्यु । (३) क़वर । (४) शाखा मैं ।