संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ शब्द संग्रह
॥ पारख ॥
जा के उर उपजी नहिँ भाई ।
सो क्या जाने पीर पराई ॥ टेक ॥
ब्यावर१ जानै पीर की सार ।
बाँझ नार क्या लखै बिकार ॥ १ ॥
पतिव्रता पति को व्रत जानै ।
बिभचारिनि मिलि कहा बखानै ॥ २ ॥
हीरा पारख जौहरि पावै ।
मूरख निरख के कहा बतावै ॥ ३ ॥
लागा घाव कराहै सोई ।
कौतुकहार२ के दर्द न कोई ॥ ४ ॥
राम नाम मेरा प्रान-अधार ।
सोई राम रस पीवनहार ॥ ५ ॥
जन दरिया जानैगा सोई ।
(जाके) प्रेम की झाल कलेजे पोई ॥ ६ ॥
॥ मिश्रित ॥
संतो कहा गृहस्थ कहा त्यागी ।
जेहि देखूँ तेहि बाहर भीतर, घट घट माया लागी ॥टेक॥
माटी की भीत पवन का थंभा, गुन औगुन से छाया ।
पाँच तत्त आकार मिलाकर, सहजाँ गिरह बनाया ॥१॥
मन भयो पिता मनसा भइ माई, दुख सुख दोनों भाई ।
आसा तृस्ना बहिनैँ मिलकर, गृह की साँज३ बनाई ॥२॥
मोह भयो पुरुष कुबुधि भइ घरनी४, पाँचो लड़का जाया ।
प्रकृति अनंत कुटुंबी मिलकर, कलहल५ बहुत उपाया ॥३॥
(१) लड़कोरी । (२) बनाघट करने वाला, तमाशा देखने वाला । (३) सामान ।
(४) स्त्री । (५) झगड़ा ।