संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 170, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूलनदासजी १६१
(२)
जागु जागु आतमा, पुरान दाग धोउ रे ।
कर्म भर्म दूर करु, कीच काम खोउ रे ॥ १ ॥
अपनी सुधि भूलि गई, और की क्या टोउ रे ।
सत्त बात झूठ करै, झूठ ही को गोउ¹ रे ॥ २ ॥
इहै बात जानि जानि, द्वार द्वार रोउ रे ।
सत्तर पानी साबुन का, प्रेम पानी सोउ² रे ॥ ३ ॥
लाग दाग धोय डारु, वाह वाह होउ रे ।
दूलन बेकूफ³ काम, गाफिल ह्वै न सोउ रे ॥ ४ ॥
(३)
चलो चढ़ौ मन यार महल अपने ॥ टेक ॥
चौक चाँदनी तारे झलकैं, बरनत बनत न जात गने ॥ १ ॥
हीरा रतन जड़ाव जड़े जहँ, मोतिन कोटि वितान बने ॥२
सुखमन पलँग सहज बिछौना, सुख सोवै को करै मने ॥३॥
दूलनदास के साईं जगजीवन, को आवै यह जग सुपने ॥४॥
(४)
जोगी चेत नगर मैं रहौ रे ॥ टेक ॥
प्रेम रंग रस ओढ़ चदरिया, मन तसबीह गहौ रे ॥ १ ॥
अन्तर लाओ नामहि की धुनि, करम भरम सब धो रे ॥ २॥
सूरत साधि गहो सत मारग, भेद न प्रगट कहो रे ॥३॥
दूलनदास के साईं जगजीवन, भवजल पार करो रे ॥ ४ ॥
(५)
प्रानी जपि ले तू सतनाम ॥ टेक ॥
मात पिता सुत कुटुम कबीला, यह नहिं आवैं काम ।
सब अपने स्वारथ के संगी, संग न चलै छदाम ॥ १ ॥
(१) छिपा कर रखना, पकड़े रहना । (२) थोड़े पानी से भिंगाना। (३) मूर्ख ।
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