संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० शब्द संग्रह
मद मोह महुवा दाख दुख, बिष का पियाला लेत रे ।
जग नात गोत बिसारि सब, हर दम गुरू से हेत रे ॥४॥
सगलौ सुपन अपना वही, जिस रोज परत संकेत रे ।
वह आइ सिरजनहार हरि, सतनाम भौजल सेत रे ।
जन दूलन सतगुरु चरन बंदत, प्रेम प्रीति समेत रे ॥५॥
(२)
तू काहे को जग में आया, जो पै नाम से प्रीति न लाया रे॥टेक
तृस्ना काम स्वाद घनेरे, मन से नहिं बिसराया रे ।
भोग बिलास आस निस बासर, इतउत चित भरमाया रे॥१
त्रिकुटी तीरथ प्रेम जल निर्मल, सुरत नहीं अन्हवाया रे ।
दुर्मति करम मैल सत्र मन के, सुमिरि सुमिरि न छुड़ाया रे॥२
कहँ से आयो कहँ को जैहै, अंत खोज नहिं पाया रे ।
उपजि उपजि के बिनसि गये सब, काल सबै जग खाया रे॥३
कर सतसंग आपने अंतर, तजि तन मोह औ माया रे ।
जन दूलन बल बल सतगुरु के, जिन मोहिं अलख लखाया रे४
॥ उपदेश ॥
(१)
बोल मनुआँ राम राम ॥ टेक ॥
सत्त जपना और सुपना, जिकर लावो अष्ट जाम ॥ १ ॥
समुझि बूझि बिचारि देखो, पिंड पिँजरा धूम धाम ॥ २ ॥
बालमीकि हवाल पूछो, जपत उलटा सिद्ध काम ॥ ३ ॥
दास दूलन आस प्रभु की, मुक्ति-करता सत्तनाम ॥ ४ ॥
दोहा
राम नाम दुइ अच्छरै, रटै निरंतर कोय ।
दूलन दीपक बरि उठै, मन परतीत जु होय ॥५॥