संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० शब्द संग्रह
ज्यौं जननी प्रतिपाले सूत¹ ।
गर्भ बास जिन दियो अकूत ॥ २ ॥
जठर अगिनि तैं लियो है काढ़ि ।
ऐसी वा की ठवर गाढ़ि ॥ ३ ॥
गाढ़े जो जन सुमिरन कीन्ह ।
परघट जग मैं तेहि गति दीन्ह ॥ ४ ॥
गरबी मारेउ गैब बान ।
संत को राखेउ जीव जान ॥ ५ ॥
जल मैं कुमुदिनि इन्दु² अकास ।
प्रेम सदा गुरु चरन पास ॥ ६ ॥
जैसे पपिहा जल से नेह ।
बुन्द एक बिस्वास तेह ॥ ७ ॥
स्वर्ग पताल मृत मंडल तीनि ।
तुम ऐसे साहिब मैं अधीन ॥ ८ ॥
जानि आयो तुम चरन पास ।
निज मुख बोलेउ कहेउ दास ॥ ९ ॥
सत पुरुष बचन नहिं होहिं आन ।
बलु पूरब से पच्छिम उगहि भान ॥ १० ॥
कह दरिया तुम हमहिँ एक ।
ज्यौं हारिल की लकड़ी टेक³ ॥ ११ ॥
॥ भेद ॥
मानु सबद जो करु बिबेक ।
अगम पुरुष जहँ रूप न रेख ॥ १ ॥
(१) पुत्र । (२) चंद्रमा । (३) हारिल चिड़िया चंगुल में लकड़ी पकड़े बिना
ज़मीन पर नहीं उतरती ।