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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

१०६ शब्द संग्रह
अपने मैं है साहिब हमरा, अजहूँ चेतु दिवानी ।
काहू जन के बस परि जैहै, भरत मरहुगी पानी ॥ २ ॥
तर ह्वै, चितै¹ लाज करु जन की, डारु हाथ की फाँसी ।
जन तैं तेरो जोर न लहिहै, रच्छपाल अबिनासी ॥३॥
कहै मलूका चुप करु ठगनी, औगुन राखु दुराई ।
जो जन उबरै राम नाम कहि, ता तैं कछु न बसाई ॥४॥
नाभाजी
इन का जीवन समय सत्रहवाँ शतक था और इन का देहान्त होना
सं० १७०० मैं इन के शिष्य प्रियादास जी ने लिखा है जिन्हों ने अपने गुरू की
आज्ञानुसार उन के मुख्य ग्रंथ भक्तमाल छंदबंद की टीका उनके देहान्त होने के
पीछे बनाई, परंतु मिश्र-बंधु विनोद मैं सं० १७२० के लगभग इन का मृत्यु-काल
सिद्ध किया गया है। इन की जाति के विषय मैं झगड़ा है, प्रायः लोग डोम
बतलाते हैं। इन के शिष्य प्रियादासजी ने अपनी टीका में इन्हें हनुमान-वंशी
लिखा है और माड़वारी भाषा में डोम शब्द का प्रयोजन हनुमान है। दूसरे
टीकाकार ने ऐसा लिखा है कि वैष्णवों की जाति पाँति वक्तव्य नहीं है। नाभाजी
अग्रदास के शिष्य और गुसाईँ तुलसीदासजी के बड़े मित्र थे ।
॥ शब्द ॥
नाभा नभ खेला कँवल केल रस सैला ॥ टेक ॥
दरपन नैन सैन मन माँजा, लाजा अलख अकेला ॥१॥
पल पर दल दल ऊपर दामिनि, जोत मैं होत उजेला ॥२॥
झंडा पार सार लख सूरन, सुन्नी सुन्न सुहेला ॥ ३ ॥
चढ़ गइ धाय जाय गढ़ ऊपर, सबद सुरत भया मेला ॥४॥
यह सब खेल अलेख अमेला, सिंध नीर नद मेला ॥ ५ ॥
जल जलधार सार पद जैसे, नहीं गुरू नहिं चेला ॥ ६ ॥
नाभा नैन सैन अंदर के, खुल गये निरख निहाला ॥७॥
संत उचिष्ट वार मन झेला, दुर्लभ दीन दुहेला ॥ ८ ॥
(१) नीची निगाह कर देख ।

सुंदरदासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १०६ ]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
सो गुरुदेव लिपै न छिपै कछु,
सत्व रजो तम ताप निवारी ।
इंद्रिय देह मृषा¹ करि जानत,
सीतलता समता² उर धारी ॥
व्यापक ब्रह्म विचार अखंडित,
द्वैत उपाधि सबै जिन टारी ।
सबद सुनाय संदेह मिटावत,
सुंदर वा गुरु की बलिहारी ॥
(२)
गोविंद के किये जीव, जात है रसातल को ।
गुरु उपदेसे से तो, छूटै जम फंद तैं ॥
गोविंद के किये, जीव बस परे कर्मन के ।
गुरु के निवाजे से, फिरत है स्वच्छंद³ तैं ॥
गोविंद के किये, जीव बूडत भवसागर मैं ।
सुंदर कहत गुरु, काढै दुःख द्वंद⁴ तैं ।
और हू कहाँ लौं कछू, मुख तैं कहूँ बनाय ।
गुरु की तौ महिमा, अधिक है गोविंद तैं ॥
॥ अजपा जाप ॥
स्वासाँ स्वास राति दिन सोहं सोहं होइ जाप ।
याही माला बारंबार दृढ़ कै धरतु है ॥
(१) वृथा। (२) सम-दृष्टि। (३) स्वाधीन। (४) झगड़ा।

१०८ शब्द संग्रह
देह परे इंद्री परे अंतःकरण परे ।
एकही अखंड जाप ताप१ कूँ हरतु है ॥
काठ की रुद्राच्छ की रु सूतहू की माला और ।
इनके फिराये कछु कारज सरतु है ॥
सुंदर कहत ता तैं आतमा चैतन्य रूप ।
आप को भजन सो तो आपही करतु है ॥
॥ शूर ॥
(१)
पाँव रोपि रहै, रण माहिँ रजपूत कोऊ ।
हय गज गाजत, जुरत जहाँ दल है ॥
बाजत जुझाऊ सहनाई, सिंधु राग पुनि ।
सुनतहि कायर की, छूटि जात कल है ॥
झलकत बरछी, तिरछी तरवार बहै ।
मार मार करत, परत खलभल२ है ॥
ऐसे जुद्ध मैं अडिग्ग, सुंदर सुभट सोई ।
घर माहिँ सूरमा, कहावत सकल है ॥
(२)
असन बसन३ बहु, भूषण सकल अंग ।
संपति बिबिधि भाँति, भर्यो सब घर है ॥
श्रवण नगारो सुनि, छिनक मैं छाड़ि जात ।
ऐसे नहिँ जानै कछु, मेरो वहाँ घर है ॥
मन मैं उछाह, रण माहिँ टूक टूक होइ ।
निर्भय निसंक वा के, रंचहू न डर है ॥
सुंदर कहत कोउ, देह को ममत्व नाहिँ ।
सूरमा को देखियत, सीस बिनु धर है ॥
(१) तपन, दुख । (२) खलबल, घबराहट । (३) भोजन और वस्त्र ।

सुंदरदासजी १०६
॥ पतिव्रता ॥
(१)
जल को सनेही मीन, बिछुरत तजै प्रान ।
मणि बिनु अहि¹ जैसे, जीवत न लहिये ॥
स्वाँति बुंद को सनेही, प्रगट जगत माहिँ ।
एक साँप दूसरो सु, चातक हु कहिये ॥
रबि को सनेही पुनि, कमल सरोवर मैं ।
ससि को सनेही हू, चकोर जैसे रहिये ॥
तैसेही सुंदर एक, प्रभु सूँ सनेह जोरि ।
और कछु देखि, काहू ओर नहिँ चहिये ॥
(२)
एक सही सब के उर अंतर, ता प्रभु कूँ कहु काहि न गावै ।
संकट माहिँ सहाय करै पुनि, सो अपनो पति क्यूँ बिसरावै ॥
चार पदारथ और जहाँ लगि, आठहु सिद्धि नवौ निधि पावै।
सुंदर छार परौ तिन के मुख, जो हरि कूँ तजि आनकूँ ध्यावै ॥
॥ विरह उराहना² ॥
(१)
पीव को अँदेसो भारी, तो सूँ कहूँ सुन प्यारी ।
यारी³ तोरि गये सो तौ, अजहूँ न आये हैं ॥
मेरे तौ जीवन-प्रान, निसि दिन उहै ध्यान ।
मुख सूँ न कहूँ आन, नैन उर लाये हैं ॥
जब तैं गये बिछोहि, कल न परत मोहिँ ।
ता तैँ हूँ पूछत तोहि, किन बिरमाये⁴ है ॥
सुंदर बिरहिनी को, सोच सखी बार बार ।
हम कूँ बिसार अब, कान के कहाये हैं ॥
(१) साँप । (२) उलहना । (३) स्नेह । (४) रिझाकर रोक लेना ।

११० शब्द संग्रह
(२)
हम कूँ तौ रैन दिन, संक मन माँहिँ रहै ।
उनकी तौ बातनि मैं, ठीकहु न पाइये ॥
कबहूँ संदेसा सुनि, अधिक उछाह¹ होइ ।
कबहूँक रोइ रोइ, आँसुन बहाइये ॥
औरन के रस बस, होइ रहे प्यारे लाल ।
आवन की कहि कहि, हम कूँ सुनाइये ॥
सुंदर कहत ताहि, काटिये सु कौन भाँति ।
जोइ तरु आपने सु, हाथ तैं लगाइये ॥
॥ अद्वैत ॥
(१)
ब्रह्म निरंतर व्यापक अग्नि, अरूप अखंडित है सब माहीं ॥
ईसुर पावक रासि प्रचंड जु, संग उपाधि लिये बरताहीं ॥
जीव अनंत मसाल चिराग, सु दीप पतंग अनेक दिखाहीं॥
सुंदर द्वैत उपाधि मिटै जब, ईसुर जीव जुदे कछु नाहीं ॥
(२)
जैसे ईख रस की मिठाई, भाँति भाँति भई ।
फेरि करि गारे, ईख रसही लहतु है ॥
जैसे घृत थीज के, डरा सौं बँधि जात पुनि ।
फेर पिघले तैं वह, घृतही रहतु है ॥
जैसे पानी जमि के, पषाण हू सौं देखियत ।
सो पषाण फेरि पानी, होय के बहुतु है ॥
तैसेही सुंदर यह, जगत है ब्रह्ममय ।
ब्रह्म सो जगतमय, वेद सु कहतु है ॥
(१) आनन्द ।

सुंदरग्रंथावली १११
॥ जीवात्मा वा गुप्त ॥
स्रोत्र सुनैं दृग देखत हैं, रसना रस घ्राण सुगंध पियारो ॥
कोमलता त्वक¹ जानत है पुनि, बोलत है मुख सबद उचारो॥
पाणि² गहै पद गौन करै, मलमूत्र तजै उभयो³ अध-द्वारो ॥
जासु प्रकास प्रकासत हैं सब, सुंदर सोई रहै घट न्यारो ॥
॥ स्वरूप विस्मरण ॥
(१)
आप न देखत है अपनो मुख, दर्पण काट⁴ लग्यो अति थूला॥
ज्यूँ दृग देखत तैं रहि जात, भयो जबहीँ पुतरी परि फूला ॥
छाय अज्ञान रह्यो अभिअंतर, जानि सकै नहिँ आतम मूला॥
सुंदर यूँ उपजे मन के मल, ज्ञान बिना निज रूपहि भूला ॥
(२)
इंद्रिन कूँ प्रेरि पुनि, इंद्रिन के पीछे पर्यो ।
आपनी अविद्या करि, आप तनु गह्यो है ॥
जोइ जोइ देह कूँ, संकट आइ परै कछु ।
सोइ सोइ मानै आप, या तैँ दुख सह्यो है ॥
भ्रमत भ्रमत कहूँ, भ्रम को न आवै अंत ।
चिरकाल बीत्यो पै, स्वरूप कूँ न लह्यो है ॥
सुंदर कहत देखो, भ्रम की प्रबलताई ।
भूतन मैं भूत मिलि, भूत होइ रह्यो है ॥
॥ भ्रम ॥
जैसे स्वान काच के, सदन⁵ मध्य देखि और ।
भूँकि भूँकि मरत, करत अभिमान जू ॥
जैसे गज फटिक, सिला सूँ लरि तोरै दंत ।
जैसे सिंह कूप माहिँ, उछक भुलान जू ॥
(१) त्वचा । (२) हाथ । (३) दोनों । (४) मोरचा । (५) घर ।

११२ शब्द संग्रह
जैसे कोउ फेरी खात, फिरत सु देखै जग ।
तैसेही सुंदर सब, तेरोही अज्ञान जू ॥
अपनो ही भ्रम सो तौ, दूसरो दिखाई देत ।
आप कूँ विचारे कोऊ, देखिये न आन जू ॥
॥ मन ॥
(१)
पलही मैँ मरि जाय, पलही मैँ जीवतु है,
पलही मैँ पर हाथ, देखत बिकानो है ।
पलही मैँ फिरै, नवखंड हू ब्रह्मांड सब,
देख्यो अनदेख्यो सो तौ, या तैँ नहिँ छानो१ है ॥
जातो नहिँ जानियत, आवतो न दीसै कछु,
ऐसेसी बलाइ अब, ता सूँ पर्यो पानो२ है ।
सुंदर कहत या की, गति हू न लखि परै,
मन की प्रतीत कोऊ, करै सो दिवानो है ॥
(२)
घेरिये तौ घेरे हू, न आवत है मेरो पूत,
जोई परबोधिये, सो कान न धरतु है ।
नीति न अनीति देखै, सुभ न असुभ पेखै,
पल ही मैँ होती, अनहोती हू करतु है ॥
गुरु की न साधु की, न लोक वेदहू की संक,
काहू की न मानै, न तौ काहू तैँ डरतु है ।
सुंदर कहत ताहि, धीजिये३ सु कौन भाँति,
मन को सुभाव, कछु कह्यो न परतु है ॥
(३)
तो सोँ न कपूत कोऊ, कितहूँ न देखियत ।
तो सोँ न सपूत कोऊ, देखियत और है ॥
(१) छिपा । (२) पाला, वास्ता । (३) पतियाइये ।

सुंदरसाखी ११३
तूही आप भूलै महा, नीचहू तैं नीच होइ ।
तूही आप जानै तौ, सकल सिर मौर है ॥
तूही आप भ्रमै तब, जगत भ्रमत देखै ।
तेरे स्थित भये सब, ठौर ही को ठौर है ॥
तूही जीवरूप तूही, ब्रह्म है अकासवत ।
सुंदर कहत मन, तेरी सब दौर है ॥
॥ विचार ॥
(१)
एकहि कूप तैं नीरहि सींचत, ईख अफीमहि अंब अनारा ॥
होत उहै जल स्वाद अनेकनि, मिष्ट कटूक¹ खटा अरु खारा ॥
त्यूँही उपाधि संजोग तैं आतम, दीसत आदि मिल्यो सविकारा ॥
काढ़ि लिये सु बिबेक विचार सुँ, सुंदर सुद्ध सरूपहि न्यारा ॥
(२)
देह ओर देखिये तौ, देह पंचभूतन को ।
ब्रह्मा अरु कीट लग, देहही प्रधान है ॥
प्राण ओर देखिये तौ, प्राण सबही के एक ।
छुधा पुनि तृषा दोऊ, व्यापत समान है ॥
मन ओर देखिये तौ, मन को सुभाव एक ।
संकल्प विकल्प करै, सदाही अज्ञान है ॥
आतम बिचार किये, आतमाही दीसै एक ।
सुंदर कहत कोऊ, दूसरो न आन है ॥
॥ बचन विवेक ॥
(१)
और तौ बचन ऐसे, बोलत हैं पसु जैसे ।
तिन के तौ बोलिबे मैं, ढंगहूँ न एक है ॥
(१) कडुवा ।
१५

११४ शब्द संग्रह
कोऊ रात दिवस, बकतही रहत ऐसे ।
जैसी बिधि कूप मैं, बकत मानो भेक¹ है ॥
बिबिधि प्रकार करि, बोलत जगत सब ।
घट घट प्रतिमुख, बचन अनेक है ॥
सुंदर कहत ता तैं, बचन बिचारि लेहु ।
बचन तो वहै जा मैं, पाइये बिबेक है ॥
(२)
एकनि के बचन सुनत, अति सुख होइ ।
फूल से झरत हैं, अधिक मनभावने ॥
एकनि के बचन तौ, असि² मानौ बरसत ।
स्रवण के सुनत, लगत अलखावने ॥
एकनि के बचन, कटुक कहु बिष रूप ।
करत मरम छेद, दुक्ख उपजावने ॥
सुंदर कहत घट घट मैं बचन भेद ।
उत्तम मध्यम अरु, अधम सुहावने ॥
(३)
बोलिये तौ तब जब, बोलिबे की सुधि होइ ।
न तौ मुख मौन गहि, चुप होइ रहिये ॥
जोरिये तौ तब जब, जोरिबे की जानि परै ।
तुक छंद अरथ, अनूप जा मैं लहिये ॥
गाइये तौ तब जब, गाइबे को कंठ होइ ।
स्रवण के सुनतही, मन जाइ गहिये ॥
तुक-भंग छंद-भंग, अरथ मिलै न कछु ।
सुंदर कहत ऐसी, बाणी नहीं कहिये ॥


(१) मेंढक । (२) तलवार ।

सुन्दरदासजी ११५
॥ विश्वास ॥
(१)
धीरज धारि विचार निरंतर, ताहि रच्यो सोइ आपुहि ऐहै॥
जेतिक भूख लगी घट प्राणहिं, तेतिक तू अनयासहि पैहै॥
जो मन मैं तृस्ना करि धावत, तौ तिहुँ लोक न खात अघैहै॥
सुंदर तू मत सोच करै कछु, चोंच दई जिन चूनहु दैहै॥
(२)
जगत मैं आइ के, बिसायो है जगतपति ।
जगत कियो है सोई, जगत भरतु है ॥
तेरे निसि दिन चिंता, औरहि परी है आइ ।
उद्यम अनेक, भाँति भाँति के करतु है ॥
इत उत जाय के, कमाई करि लाऊँ कछु ।
नेक न अज्ञानी नर, धीरज धरतु है ॥
सुंदर कहत एक, प्रभु के विस्वास बिनु ।
बादहि कूँ वृथा सठ, पचि के मरतु है ॥
॥ ज्ञानी ॥
(१)
तमोगुण बुद्धि सो तौ, तवा के समान जैसे ।
ता के मध्य सूरज की, रंचहू न जोत है ॥
रजोगुण बुद्धि जैसे, आरसी की औंधी ओर ।
ता के मध्य सूरज की, कछुक उद्योत१ है ॥
सत्त्वगुण बुद्धि जैसे, आरसी की सूधी ओर ।
ता के मध्य प्रतिबिंब, सूरज को पोत२ है ॥
त्रिगुण अतीत३ जैसे, प्रतिबिंब मिटि जात ।
सुंदर कहत एक, सूरजही होत है ॥
(१) चमक । (२) गुण । (३) तीनों गुण से रहित ।

११६ शब्द संग्रह
(२)
बिधि न निषेध कछु, भेद न अभेद पुनि ।
क्रिया सो करत दीसै, यूँही नितप्रति है ॥
काहू कूँ निकट राखै, काहू कूँ तौ दूर भाखै ।
काहू सूँ नेरे न दूर, ऐसी जा की मति है ॥
रागहू न द्वेष कोऊ, सोक न उछाह दोऊ ।
ऐसी बिधि रहै कहूँ, रति न घिरति१ है ॥
बाहिर ब्योहार ठानै, मन मैं सुपन जानै ।
सुंदर ज्ञानी की कछु, अद्भुत गति है ॥
(३)
ज्ञानी कर्म करै नाना बिधि, अहंकार या तन को खोवै ॥
कर्मन को फल कछू न जोवै, अँतःकरण वासना धोवै ॥
ज्यूँ कोऊ खेती कूँ जोतत, लेकरि बीज भूनि के बोवै ॥
सुंदर कहै सुनो दृष्टांतहि, नाँगि२ नहाई कहा निचोवै ॥
॥ सांख्य ज्ञान ॥
(१)
छीर नीर मिले दोऊ, एकठेही होइ रहे ।
नीर जैसे छाड़ि हंस, छीर कूँ गहतु है ॥
कंचन मैं और धातु, मिलि करि बनि पर्यो ।
सुद्ध करि कंचन, सुनार ज्यूँ लहतु है ॥
पावकहूँ दारु३ मध्य, दारूहू सौं होइ रह्यो ।
मथि करि काढै वह, दारु कूँ दहतु है ॥
तैसेही सुंदर मिल्यो, आतमा अनात्मा जु ।
भिन्न भिन्न करै सो तौ, सांख्यही कहतु है ॥
(१) न कहीं आसक्त और न बिरक्त । (२) नंगी । (३) काठ

सुंदरदासजी ११७
(२)
देह के सँजोगही तैं, सीत लगै घाम लगै ।
देह के सँजोगही तैं, क्षुधा तृषा पौन कूँ ॥
देह के सँजोगही तैं, कटुक¹ मधुर स्वाद ।
देह के सँजोग कहै, खाटो खारो लैन कूँ ॥
देह के सँजोग कहै, मुख तैं अनेक बात ।
देह के सँजोगही, पकरि रहै मौन कूँ ॥
सुंदर देह के सँजोग, दुख मानै सुख मानै ।
देह के सँजोग गये, दुख सुख कान कूँ ॥
॥ निःसंशय ज्ञानी ॥
भावै देह छूटि जाहु, कासी माहिं गंगा तट ।
भावै देह छूटि जाहु, क्षेत्र मगहर मैं ॥
भावै देह छूटि जाहु, विप्र के सदन² मध्य ।
भावै देह छूटि जाहु, श्वपच³ के घर मैं ॥
भावै देह छूटै देस, आरज अनारज⁴ मैं ।
भावै देह छूटि जाहु, वन मैं नगर मैं ॥
सुंदर ज्ञानी के कछु, संसय रहत नाहिं ।
सुरग नरक सब, भागि गयो भरमैं ॥
॥ प्रेम ज्ञानी ॥
द्वंद बिना विचरै बसुधा पर, जा घट आतमज्ञान अपारो ॥
काम न क्रोध न लोभ न मोह, न राग न द्वेष न म्हारु न थारो⁵॥
जोग न भोग न त्याग न संग्रह, देह दसा न ढँक्यो न उघारो॥
सुंदर कोउक जानि सकै यह, गोकुल गाँव को पैँडोहि न्यारो॥
(१) कडुवा । (२) घर । (३) डोम । (४) पवित्र चाहे अपवित्र देश मैं ।
(५) मेरा और तेरा ।

११८ शब्द संग्रह
॥ बाचक ज्ञान ॥
(१)
देह सूँ ममत्व पुनि, गेह सूँ समत्व ।
सुत दारा¹ सूँ ममत्व, मन माया मैं रहतु है ॥
थिरता न लहै जैसे, कंदुक² चौगान³ माहिँ ।
कर्मनि के बस भाख्यो, धक्का कूँ बहुतु है ॥
अंतःकरण सदा, जगत सूँ रचि रह्यो ।
मुख सूँ बनाय बात, ब्रह्म की कहतु है ॥
सुंदर अधिक मोहिँ, याहि तैँ अचंभो आहि ।
भूमि पर पर्यो कोऊ, चंद कूँ गहतु है ॥
(२)
ज्ञानी की सी बात कहै, मन तौ मलिन रहै ।
बासना अनेक भरि, नेक न निवारी है ॥
जैसे कोऊ आभूषण, अधिक बनाइ राखै ।
कलई ऊपर करि, भीतर भँगारी है ॥
ज्यूँही मन आवै त्यूँही, खेलत निसंक होइ ।
ज्ञान सुनि सीखि लियो, ग्रंथ⁴ न बिचारी है ॥
सुंदर कहत वा के, अटक न कोऊ आहि ।
जोई वा सूँ मिलै जाइ, ताही कूँ बिगारी है ॥
॥ आत्म अनुभव ॥
(१)
है दिल मैं दिलदार सही, अँखियाँ उलटी करि ताहि चित्तैये ॥
आब⁵ मैं खाक मैं बाद⁶ मैं आतस⁷, जान मैं सुंदर जानि जनैये ॥
नूर⁸ मैं नूर है तेज मैं तेजहि, ज्योति मैं ज्योति मिलै मिलि जैये ॥
क्या कहिये कहते न बनै कछु, जो कहिये कहते हिलजैये ॥
(१) स्त्री । (२) गेंद । (३) गेंद का खेल । (४) जड़ चेतन की गाँठ ।
(५) पानी । (६) हवा । (७) आग । (८) प्रकाश ।

सुंदरदासजी ११६
(२)
न्याय सास्त्र कहत है, प्रगट ईसुरवाद ।
मीमांसाहि सास्त्र माहिँ, कर्मवाद कह्यो है ॥
वैसेषिक सास्त्र पुनि, कालवादी है प्रसिद्ध ।
पातंजलि सास्त्र माहिँ, योगवाद लह्यो है ॥
सांख्य सास्त्र माहिँ पुनि, प्रकृति पुरुष वाद ।
वेदांत जु सास्त्र तिन, ब्रह्मवाद गह्यो है ॥
सुंदर कहत षटसास्त्र, माहिँ भयो वाद ।
जा के अनुभव ज्ञान, वाद मैं न बह्यो है ॥
(३)
काहू कूँ पूछत रंक, धन कैसे पाइयत ।
कान देके सुनत, स्रवण सोई जानिये ॥
उन कह्यो धन हम, देख्यो है फलानी ठौर ।
मनन करत भयो, कब घर आनिये ॥
फेरि जब कह्यो धन, गड़्यो तेरे घर माहिँ ।
खोदन लाग्यो है तब, निदिध्यास ठानिये ॥
धन निकस्यो है जब, दारिद गयो है तब ।

१२० शब्द संग्रह
बासना१ न कोई बा की, ऐसी मति सदा जा की।
सुंदर कहत ताहि, बंदना२ हमारी है ॥
॥ सतसंग ॥
(१)
प्रीति प्रचंड लगै परब्रह्महि, और सबै कछु लागत फीको ॥
सुद्ध हृदय मन होइ सु निर्मल, द्वैत प्रभाव मिटै सब जी को ॥
गोष्टि रु ज्ञान अनंत चलै जहँ, सुंदर जैसे प्रबाह नदी को ॥
ताहितैं जानिकरै निसिवासर, साधुको संग सदा अतिनीको॥
(२)
जो कोइ जाइ मिलै उन सूं नर, होत पबित्र लगै हरि रंगा ।
दोष कलंक सबै मिटि जाइसु, नीचहु जाइ जु होत उतंगा ॥
ज्यौं जल और मलीन महा अति, गंग मिल्योहुइ जात हि गंगा॥
सुंदर सुद्ध करै ततकाल जु, है जग माहिँ बड़ो सतसंगा ॥
॥ दुष्ट ॥
(१)
अपने न दोष देखे, पर के औगुण पेखे,
दुष्ट को सुभाव, उठि निंदाही करतु है ।
जैसे कोई महल, सँवारि राख्यो नीके करि,
कीरी३ तहाँ जाय, छिद्र ढूँढत फिरतु है ॥
भोरही तैं साँझ लग, साँझही तैं भोर लग,
सुंदर कहत दिन, ऐसेही भरतु है।
पाँव के तरे की, नहीं सूझे आग मूरख कूँ,
और सूं कहत तेरे, सिर पै बरत है ॥
(२)
आपनु काज सँवारन के हित, और कुकाज बिगारत जाई।
आपनु कारज होउ न होउ, बुरो करि और कुँ डारत भाई ॥
(१) चाह । (२) प्रणाम । (३) चींटी ।

, first word):
'ज' + 'ो' = जो. Then 'इ': short vertical stroke, loop to left, loop to right, tail down!
Now look at the letter in question:
Short vertical stroke, loop to left, loop to right... wait, it's an 'इ' with a connector to a vertical bar!
YES! That is the letter 'झ'!
Because 'झ' = 'इ' + '्' + connector + 'ा'!
Look at line 21:
It is an 'इ' joined by a horizontal bar to a vertical stem!
Because the top of 'इ' has a small vertical stem coming from the shirorekha, then goes left, then turns right, and the connector comes out of the middle to the right stem!
That is 100% the classic Devanagari letter 'झ'!
And above the stem, there is an 'ो' matra and a candrabindu!
So it IS "झोंकिये" (or "झौंकिये" / "झोंकिये")!
Wait, look at the candrabindu: it's a candrabindu over 'ो' = "झोंकिये" (or "झाँकिये" / "झौंकिये")!
Wait, does it have an 'ो' or 'ौ'? One slant!
Wait, in "झोंकिये": it has a slant with a candrabindu, so it's "झोंक

१२२ शब्द संग्रह
सुंदर कहत प्रभु, कौन पाप लायो पेट ।
जबही जनम भयो, तबही को खातु है ॥
॥ कामिनी ॥
(१)
कामिनी को तनु मानु कहिये सघन बन,
वहाँ कोऊ जाय सो तौ भूलेही परतु है ।
कुंजर है गति कटि केहरी को भय जा मैं,
बेनी काली नागिनीऊ फन कूँ धरतु है ॥
कुच हैं पहार जहाँ काम चोर रहै तहाँ,
साधि के कटाच्छ बान प्रान कूँ हरतु है ।
सुंदर कहत एक और डर जा मैं अति,
राच्छसी बदन खाँउ खाँउ ही करतु है ॥
(२)
रसिक प्रिया रस मंजरी, और सिंगारहि जान ।
चतुराई करि बहुत बिधि, त्रिषय बनाई आन ॥
बिषय बनाई आन, लगत बिषयिन१ कूँ प्यारी ।
जागे मदन२ प्रचंड, सराह्रै नखसिख नारी ॥
ज्यूँ रोगी मिष्टान खाइ, रोगहि बिस्तारै ।
सुंदर ये गति होइ, रसिक जो रस प्रिया धारै ॥
॥ करम धरम ॥ ,
(१)
मेघ सहै सीत सहै, सीस पर घाम सहै ।
कठिन तपस्या करि, कंद मूल खात है ॥
जोग करै जज्ञ करै, तीरथ रु व्रत करै ।
पुन्य नाना बिधि करै, मन मैं सुहात है ॥
(१) कामी । (२) कामदेव ।

सुंदरदासजी १२३
और देवी देवता, उपासना अनेक करै ।
– आँवन की हौम कैसे, आक डाँड़े¹ जात है ॥
सुंदर कहत एक, रवि के प्रकास बिनु ।
जँगना² की जोति, कहा रजनी³ बिलात है ॥
(२)
गेह तज्यो पुनि नेह तज्यो, पुनि खेह लगाइ के देह सँवारी ॥
मेघ सहै सिर सीत सहै तन, धूप समय जु पंचागनि धारी ॥
भूख सहै रहि रूख तरे, पर सुंदरदास सहै दुख भारी ॥
डासन⁴ छाड़ि के कासन ऊपर, आसन मारि पै आस न मारी॥
॥ चितावनी ॥
(१)
तू कछु और विचारत है नर,
तेरो विचार धस्योहि रहैगो ।
कोटि उपाय करै धन के हित,
भाग लिख्यो तितनोहि लहैगो ॥
भोर कि साँझ घरी पल माँझ सु,
काल अचानक आइ गहैगो ।
राम भज्यो न कियो कछु सुकिरत,
सुंदर यूँ पछताइ रहैगो ॥
(२)
मातु पिता युवती⁵ सुत बांधव,
लागत है सब कूँ अति प्यारो ।
लोक कुटुंब खरो हित राखत,
होइ नहीं हम तैं कहुँ न्यारो ॥
(१) मदार का 'फल या डौंडी । (२) जुगनू । (३) रात । (४) बिछौना ।
(५) स्त्री ।

१२४ शब्द संग्रह
देह सनेह तहाँ लग जानहु,
बोलत है मुख सबद उचारो।
सुंदर चेतन सक्ति गई जब,
बेगि कहै घरबार निकारो॥
॥ उपदेश ॥
(१)
कार उहै अबिकार¹ रहै नित, सार² उहै जु असारहिनाखै³॥
प्रीति उहै जु प्रतीति धरै उर, नीति उहै जुअनीतिनभाखै॥
तंत⁴ उहै लगि अंत न टूटत, संत उहै अपनौ सत राखै॥
नाद⁵ उहै सुनि बाद⁶ तजै सब, स्वाद उहै रस सुंदर चाखै॥
(२)
सोवत सोवत सोइ गयो सठ, रोवत रोवत कै बेर रोयो॥
गोवत⁷ गोवत गोइ धरयो धन, खोवत खोवत तैँ सब खोयो॥
जोवत⁸ जोवतबीतिगये दिन, बोवत बोवत लै बिष बोयो॥
सुंदर सुंदर राम भज्यो नहिँ, ढोवत ढोवत बोझहिँ ढोयो॥
॥ मिश्रित ॥
(१)
जा सरीर माहिँ तू अनेक सुख मानि रह्यो,
ताहि तू बिचार या मैं कौन बात भली है।
मेद मज्जा मांस रग रग मेँ रकत भरयो,
पेटहू पिटारी सी मैं ठौर ठौर मली है॥
हाड़न सूँ भरयो मुख हाड़न के नैन नाक,
हाथ पाँउ सोऊ सब हाड़न की नली है।
सुंदर कहत याहि देखि जनि भूलै कोई,
भीतर भँगार भरी ऊपर तै कली है॥
(१) बिकार रहित। (२) सत्य। (३) फेंक दे। (४) तत्व—यहाँ ध्यान से
अभिप्राय है। (५) शब्द। (६) झगड़ा। (७) छिपाना। (८) देखना।

धरनी दासजी १२५
(२)
प्रीति सी न पाती कोऊ प्रेम से न फूल और ।
चित्त सौं न चंदन सनेह सौं न सेहरा ॥
हृदय सौं न आसन सहज सौं न सिंघासन ।
भाव सी न सेज और सून्य सौं न गेहरा ॥
सील सौं न स्नान अरु ध्यान सौं न धूप और ।
ज्ञान सौं न दीपक अज्ञान तम केहरा ॥
मन सी न माला कोऊ सोहं सो न जाप और ।
आतम सौं देव नाहिं देह सौं न देहरा ॥
धरनी दासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ ११२ ]
॥ चितावनी ॥
पानी से पैदा कियो सुनु रे मन बौरे,
ऐसा खसम खुदाय कहाई रे ।
दाह¹ भयो दस मास को सुनु रे मन बौरे,
तर सिर ऊपर पाँई रे ॥ १ ॥
आँच लगी जब आग की सुनु रे मन बौरे,
आजिज ह्वै अकुलाई रे ।
कौल² कियो मुख आपने सुनु रे मन बौरे,
नाहक अंक लिखाई रे ॥ २ ॥
अब की करिहौं बंदगी सुनु रे मन बौरे,
जो पइहौं मुकलाई³ रे ।
(१) गर्भ की जलन। (२) प्रतिज्ञा। (३) मुकलना = भेजना, गर्भ में जब
बालक बहुत तकलीफ़ पाता है तो मालिक से प्रार्थना करता है कि अब की कष्ट
से छुड़ा दो तो बंदगी भक्ति करूँगा ।