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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 267 में से

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पृष्ठ 116

सुंदरदासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १०६ ]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
सो गुरुदेव लिपै न छिपै कछु,
सत्व रजो तम ताप निवारी ।
इंद्रिय देह मृषा¹ करि जानत,
सीतलता समता² उर धारी ॥
व्यापक ब्रह्म विचार अखंडित,
द्वैत उपाधि सबै जिन टारी ।
सबद सुनाय संदेह मिटावत,
सुंदर वा गुरु की बलिहारी ॥
(२)
गोविंद के किये जीव, जात है रसातल को ।
गुरु उपदेसे से तो, छूटै जम फंद तैं ॥
गोविंद के किये, जीव बस परे कर्मन के ।
गुरु के निवाजे से, फिरत है स्वच्छंद³ तैं ॥
गोविंद के किये, जीव बूडत भवसागर मैं ।
सुंदर कहत गुरु, काढै दुःख द्वंद⁴ तैं ।
और हू कहाँ लौं कछू, मुख तैं कहूँ बनाय ।
गुरु की तौ महिमा, अधिक है गोविंद तैं ॥
॥ अजपा जाप ॥
स्वासाँ स्वास राति दिन सोहं सोहं होइ जाप ।
याही माला बारंबार दृढ़ कै धरतु है ॥
(१) वृथा। (२) सम-दृष्टि। (३) स्वाधीन। (४) झगड़ा।