संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० शब्द संग्रह
बासना१ न कोई बा की, ऐसी मति सदा जा की।
सुंदर कहत ताहि, बंदना२ हमारी है ॥
॥ सतसंग ॥
(१)
प्रीति प्रचंड लगै परब्रह्महि, और सबै कछु लागत फीको ॥
सुद्ध हृदय मन होइ सु निर्मल, द्वैत प्रभाव मिटै सब जी को ॥
गोष्टि रु ज्ञान अनंत चलै जहँ, सुंदर जैसे प्रबाह नदी को ॥
ताहितैं जानिकरै निसिवासर, साधुको संग सदा अतिनीको॥
(२)
जो कोइ जाइ मिलै उन सूं नर, होत पबित्र लगै हरि रंगा ।
दोष कलंक सबै मिटि जाइसु, नीचहु जाइ जु होत उतंगा ॥
ज्यौं जल और मलीन महा अति, गंग मिल्योहुइ जात हि गंगा॥
सुंदर सुद्ध करै ततकाल जु, है जग माहिँ बड़ो सतसंगा ॥
॥ दुष्ट ॥
(१)
अपने न दोष देखे, पर के औगुण पेखे,
दुष्ट को सुभाव, उठि निंदाही करतु है ।
जैसे कोई महल, सँवारि राख्यो नीके करि,
कीरी३ तहाँ जाय, छिद्र ढूँढत फिरतु है ॥
भोरही तैं साँझ लग, साँझही तैं भोर लग,
सुंदर कहत दिन, ऐसेही भरतु है।
पाँव के तरे की, नहीं सूझे आग मूरख कूँ,
और सूं कहत तेरे, सिर पै बरत है ॥
(२)
आपनु काज सँवारन के हित, और कुकाज बिगारत जाई।
आपनु कारज होउ न होउ, बुरो करि और कुँ डारत भाई ॥
(१) चाह । (२) प्रणाम । (३) चींटी ।