संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 134, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंधरनी दासजी १२५
(२)
प्रीति सी न पाती कोऊ प्रेम से न फूल और ।
चित्त सौं न चंदन सनेह सौं न सेहरा ॥
हृदय सौं न आसन सहज सौं न सिंघासन ।
भाव सी न सेज और सून्य सौं न गेहरा ॥
सील सौं न स्नान अरु ध्यान सौं न धूप और ।
ज्ञान सौं न दीपक अज्ञान तम केहरा ॥
मन सी न माला कोऊ सोहं सो न जाप और ।
आतम सौं देव नाहिं देह सौं न देहरा ॥
धरनी दासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ ११२ ]
॥ चितावनी ॥
पानी से पैदा कियो सुनु रे मन बौरे,
ऐसा खसम खुदाय कहाई रे ।
दाह¹ भयो दस मास को सुनु रे मन बौरे,
तर सिर ऊपर पाँई रे ॥ १ ॥
आँच लगी जब आग की सुनु रे मन बौरे,
आजिज ह्वै अकुलाई रे ।
कौल² कियो मुख आपने सुनु रे मन बौरे,
नाहक अंक लिखाई रे ॥ २ ॥
अब की करिहौं बंदगी सुनु रे मन बौरे,
जो पइहौं मुकलाई³ रे ।
(१) गर्भ की जलन। (२) प्रतिज्ञा। (३) मुकलना = भेजना, गर्भ में जब
बालक बहुत तकलीफ़ पाता है तो मालिक से प्रार्थना करता है कि अब की कष्ट
से छुड़ा दो तो बंदगी भक्ति करूँगा ।