संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ शब्द संग्रह
कोऊ रात दिवस, बकतही रहत ऐसे ।
जैसी बिधि कूप मैं, बकत मानो भेक¹ है ॥
बिबिधि प्रकार करि, बोलत जगत सब ।
घट घट प्रतिमुख, बचन अनेक है ॥
सुंदर कहत ता तैं, बचन बिचारि लेहु ।
बचन तो वहै जा मैं, पाइये बिबेक है ॥
(२)
एकनि के बचन सुनत, अति सुख होइ ।
फूल से झरत हैं, अधिक मनभावने ॥
एकनि के बचन तौ, असि² मानौ बरसत ।
स्रवण के सुनत, लगत अलखावने ॥
एकनि के बचन, कटुक कहु बिष रूप ।
करत मरम छेद, दुक्ख उपजावने ॥
सुंदर कहत घट घट मैं बचन भेद ।
उत्तम मध्यम अरु, अधम सुहावने ॥
(३)
बोलिये तौ तब जब, बोलिबे की सुधि होइ ।
न तौ मुख मौन गहि, चुप होइ रहिये ॥
जोरिये तौ तब जब, जोरिबे की जानि परै ।
तुक छंद अरथ, अनूप जा मैं लहिये ॥
गाइये तौ तब जब, गाइबे को कंठ होइ ।
स्रवण के सुनतही, मन जाइ गहिये ॥
तुक-भंग छंद-भंग, अरथ मिलै न कछु ।
सुंदर कहत ऐसी, बाणी नहीं कहिये ॥
(१) मेंढक । (२) तलवार ।