संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 127, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें११८ शब्द संग्रह
॥ बाचक ज्ञान ॥
(१)
देह सूँ ममत्व पुनि, गेह सूँ समत्व ।
सुत दारा¹ सूँ ममत्व, मन माया मैं रहतु है ॥
थिरता न लहै जैसे, कंदुक² चौगान³ माहिँ ।
कर्मनि के बस भाख्यो, धक्का कूँ बहुतु है ॥
अंतःकरण सदा, जगत सूँ रचि रह्यो ।
मुख सूँ बनाय बात, ब्रह्म की कहतु है ॥
सुंदर अधिक मोहिँ, याहि तैँ अचंभो आहि ।
भूमि पर पर्यो कोऊ, चंद कूँ गहतु है ॥
(२)
ज्ञानी की सी बात कहै, मन तौ मलिन रहै ।
बासना अनेक भरि, नेक न निवारी है ॥
जैसे कोऊ आभूषण, अधिक बनाइ राखै ।
कलई ऊपर करि, भीतर भँगारी है ॥
ज्यूँही मन आवै त्यूँही, खेलत निसंक होइ ।
ज्ञान सुनि सीखि लियो, ग्रंथ⁴ न बिचारी है ॥
सुंदर कहत वा के, अटक न कोऊ आहि ।
जोई वा सूँ मिलै जाइ, ताही कूँ बिगारी है ॥
॥ आत्म अनुभव ॥
(१)
है दिल मैं दिलदार सही, अँखियाँ उलटी करि ताहि चित्तैये ॥
आब⁵ मैं खाक मैं बाद⁶ मैं आतस⁷, जान मैं सुंदर जानि जनैये ॥
नूर⁸ मैं नूर है तेज मैं तेजहि, ज्योति मैं ज्योति मिलै मिलि जैये ॥
क्या कहिये कहते न बनै कछु, जो कहिये कहते हिलजैये ॥
(१) स्त्री । (२) गेंद । (३) गेंद का खेल । (४) जड़ चेतन की गाँठ ।
(५) पानी । (६) हवा । (७) आग । (८) प्रकाश ।