संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ शब्द संग्रह
जैसे कोउ फेरी खात, फिरत सु देखै जग ।
तैसेही सुंदर सब, तेरोही अज्ञान जू ॥
अपनो ही भ्रम सो तौ, दूसरो दिखाई देत ।
आप कूँ विचारे कोऊ, देखिये न आन जू ॥
॥ मन ॥
(१)
पलही मैँ मरि जाय, पलही मैँ जीवतु है,
पलही मैँ पर हाथ, देखत बिकानो है ।
पलही मैँ फिरै, नवखंड हू ब्रह्मांड सब,
देख्यो अनदेख्यो सो तौ, या तैँ नहिँ छानो१ है ॥
जातो नहिँ जानियत, आवतो न दीसै कछु,
ऐसेसी बलाइ अब, ता सूँ पर्यो पानो२ है ।
सुंदर कहत या की, गति हू न लखि परै,
मन की प्रतीत कोऊ, करै सो दिवानो है ॥
(२)
घेरिये तौ घेरे हू, न आवत है मेरो पूत,
जोई परबोधिये, सो कान न धरतु है ।
नीति न अनीति देखै, सुभ न असुभ पेखै,
पल ही मैँ होती, अनहोती हू करतु है ॥
गुरु की न साधु की, न लोक वेदहू की संक,
काहू की न मानै, न तौ काहू तैँ डरतु है ।
सुंदर कहत ताहि, धीजिये३ सु कौन भाँति,
मन को सुभाव, कछु कह्यो न परतु है ॥
(३)
तो सोँ न कपूत कोऊ, कितहूँ न देखियत ।
तो सोँ न सपूत कोऊ, देखियत और है ॥
(१) छिपा । (२) पाला, वास्ता । (३) पतियाइये ।