संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुंदरदासजी १२३
और देवी देवता, उपासना अनेक करै ।
– आँवन की हौम कैसे, आक डाँड़े¹ जात है ॥
सुंदर कहत एक, रवि के प्रकास बिनु ।
जँगना² की जोति, कहा रजनी³ बिलात है ॥
(२)
गेह तज्यो पुनि नेह तज्यो, पुनि खेह लगाइ के देह सँवारी ॥
मेघ सहै सिर सीत सहै तन, धूप समय जु पंचागनि धारी ॥
भूख सहै रहि रूख तरे, पर सुंदरदास सहै दुख भारी ॥
डासन⁴ छाड़ि के कासन ऊपर, आसन मारि पै आस न मारी॥
॥ चितावनी ॥
(१)
तू कछु और विचारत है नर,
तेरो विचार धस्योहि रहैगो ।
कोटि उपाय करै धन के हित,
भाग लिख्यो तितनोहि लहैगो ॥
भोर कि साँझ घरी पल माँझ सु,
काल अचानक आइ गहैगो ।
राम भज्यो न कियो कछु सुकिरत,
सुंदर यूँ पछताइ रहैगो ॥
(२)
मातु पिता युवती⁵ सुत बांधव,
लागत है सब कूँ अति प्यारो ।
लोक कुटुंब खरो हित राखत,
होइ नहीं हम तैं कहुँ न्यारो ॥
(१) मदार का 'फल या डौंडी । (२) जुगनू । (३) रात । (४) बिछौना ।
(५) स्त्री ।