संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 133, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ शब्द संग्रह
देह सनेह तहाँ लग जानहु,
बोलत है मुख सबद उचारो।
सुंदर चेतन सक्ति गई जब,
बेगि कहै घरबार निकारो॥
॥ उपदेश ॥
(१)
कार उहै अबिकार¹ रहै नित, सार² उहै जु असारहिनाखै³॥
प्रीति उहै जु प्रतीति धरै उर, नीति उहै जुअनीतिनभाखै॥
तंत⁴ उहै लगि अंत न टूटत, संत उहै अपनौ सत राखै॥
नाद⁵ उहै सुनि बाद⁶ तजै सब, स्वाद उहै रस सुंदर चाखै॥
(२)
सोवत सोवत सोइ गयो सठ, रोवत रोवत कै बेर रोयो॥
गोवत⁷ गोवत गोइ धरयो धन, खोवत खोवत तैँ सब खोयो॥
जोवत⁸ जोवतबीतिगये दिन, बोवत बोवत लै बिष बोयो॥
सुंदर सुंदर राम भज्यो नहिँ, ढोवत ढोवत बोझहिँ ढोयो॥
॥ मिश्रित ॥
(१)
जा सरीर माहिँ तू अनेक सुख मानि रह्यो,
ताहि तू बिचार या मैं कौन बात भली है।
मेद मज्जा मांस रग रग मेँ रकत भरयो,
पेटहू पिटारी सी मैं ठौर ठौर मली है॥
हाड़न सूँ भरयो मुख हाड़न के नैन नाक,
हाथ पाँउ सोऊ सब हाड़न की नली है।
सुंदर कहत याहि देखि जनि भूलै कोई,
भीतर भँगार भरी ऊपर तै कली है॥
(१) बिकार रहित। (२) सत्य। (३) फेंक दे। (४) तत्व—यहाँ ध्यान से
अभिप्राय है। (५) शब्द। (६) झगड़ा। (७) छिपाना। (८) देखना।