संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुंदरसाखी ११३
तूही आप भूलै महा, नीचहू तैं नीच होइ ।
तूही आप जानै तौ, सकल सिर मौर है ॥
तूही आप भ्रमै तब, जगत भ्रमत देखै ।
तेरे स्थित भये सब, ठौर ही को ठौर है ॥
तूही जीवरूप तूही, ब्रह्म है अकासवत ।
सुंदर कहत मन, तेरी सब दौर है ॥
॥ विचार ॥
(१)
एकहि कूप तैं नीरहि सींचत, ईख अफीमहि अंब अनारा ॥
होत उहै जल स्वाद अनेकनि, मिष्ट कटूक¹ खटा अरु खारा ॥
त्यूँही उपाधि संजोग तैं आतम, दीसत आदि मिल्यो सविकारा ॥
काढ़ि लिये सु बिबेक विचार सुँ, सुंदर सुद्ध सरूपहि न्यारा ॥
(२)
देह ओर देखिये तौ, देह पंचभूतन को ।
ब्रह्मा अरु कीट लग, देहही प्रधान है ॥
प्राण ओर देखिये तौ, प्राण सबही के एक ।
छुधा पुनि तृषा दोऊ, व्यापत समान है ॥
मन ओर देखिये तौ, मन को सुभाव एक ।
संकल्प विकल्प करै, सदाही अज्ञान है ॥
आतम बिचार किये, आतमाही दीसै एक ।
सुंदर कहत कोऊ, दूसरो न आन है ॥
॥ बचन विवेक ॥
(१)
और तौ बचन ऐसे, बोलत हैं पसु जैसे ।
तिन के तौ बोलिबे मैं, ढंगहूँ न एक है ॥
(१) कडुवा ।
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