संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुंदरदासजी ११७
(२)
देह के सँजोगही तैं, सीत लगै घाम लगै ।
देह के सँजोगही तैं, क्षुधा तृषा पौन कूँ ॥
देह के सँजोगही तैं, कटुक¹ मधुर स्वाद ।
देह के सँजोग कहै, खाटो खारो लैन कूँ ॥
देह के सँजोग कहै, मुख तैं अनेक बात ।
देह के सँजोगही, पकरि रहै मौन कूँ ॥
सुंदर देह के सँजोग, दुख मानै सुख मानै ।
देह के सँजोग गये, दुख सुख कान कूँ ॥
॥ निःसंशय ज्ञानी ॥
भावै देह छूटि जाहु, कासी माहिं गंगा तट ।
भावै देह छूटि जाहु, क्षेत्र मगहर मैं ॥
भावै देह छूटि जाहु, विप्र के सदन² मध्य ।
भावै देह छूटि जाहु, श्वपच³ के घर मैं ॥
भावै देह छूटै देस, आरज अनारज⁴ मैं ।
भावै देह छूटि जाहु, वन मैं नगर मैं ॥
सुंदर ज्ञानी के कछु, संसय रहत नाहिं ।
सुरग नरक सब, भागि गयो भरमैं ॥
॥ प्रेम ज्ञानी ॥
द्वंद बिना विचरै बसुधा पर, जा घट आतमज्ञान अपारो ॥
काम न क्रोध न लोभ न मोह, न राग न द्वेष न म्हारु न थारो⁵॥
जोग न भोग न त्याग न संग्रह, देह दसा न ढँक्यो न उघारो॥
सुंदर कोउक जानि सकै यह, गोकुल गाँव को पैँडोहि न्यारो॥
(१) कडुवा । (२) घर । (३) डोम । (४) पवित्र चाहे अपवित्र देश मैं ।
(५) मेरा और तेरा ।