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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 267 में से

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पृष्ठ 125

११६ शब्द संग्रह
(२)
बिधि न निषेध कछु, भेद न अभेद पुनि ।
क्रिया सो करत दीसै, यूँही नितप्रति है ॥
काहू कूँ निकट राखै, काहू कूँ तौ दूर भाखै ।
काहू सूँ नेरे न दूर, ऐसी जा की मति है ॥
रागहू न द्वेष कोऊ, सोक न उछाह दोऊ ।
ऐसी बिधि रहै कहूँ, रति न घिरति१ है ॥
बाहिर ब्योहार ठानै, मन मैं सुपन जानै ।
सुंदर ज्ञानी की कछु, अद्भुत गति है ॥
(३)
ज्ञानी कर्म करै नाना बिधि, अहंकार या तन को खोवै ॥
कर्मन को फल कछू न जोवै, अँतःकरण वासना धोवै ॥
ज्यूँ कोऊ खेती कूँ जोतत, लेकरि बीज भूनि के बोवै ॥
सुंदर कहै सुनो दृष्टांतहि, नाँगि२ नहाई कहा निचोवै ॥
॥ सांख्य ज्ञान ॥
(१)
छीर नीर मिले दोऊ, एकठेही होइ रहे ।
नीर जैसे छाड़ि हंस, छीर कूँ गहतु है ॥
कंचन मैं और धातु, मिलि करि बनि पर्यो ।
सुद्ध करि कंचन, सुनार ज्यूँ लहतु है ॥
पावकहूँ दारु३ मध्य, दारूहू सौं होइ रह्यो ।
मथि करि काढै वह, दारु कूँ दहतु है ॥
तैसेही सुंदर मिल्यो, आतमा अनात्मा जु ।
भिन्न भिन्न करै सो तौ, सांख्यही कहतु है ॥
(१) न कहीं आसक्त और न बिरक्त । (२) नंगी । (३) काठ