संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ शब्द संग्रह
अपने मैं है साहिब हमरा, अजहूँ चेतु दिवानी ।
काहू जन के बस परि जैहै, भरत मरहुगी पानी ॥ २ ॥
तर ह्वै, चितै¹ लाज करु जन की, डारु हाथ की फाँसी ।
जन तैं तेरो जोर न लहिहै, रच्छपाल अबिनासी ॥३॥
कहै मलूका चुप करु ठगनी, औगुन राखु दुराई ।
जो जन उबरै राम नाम कहि, ता तैं कछु न बसाई ॥४॥
नाभाजी
इन का जीवन समय सत्रहवाँ शतक था और इन का देहान्त होना
सं० १७०० मैं इन के शिष्य प्रियादास जी ने लिखा है जिन्हों ने अपने गुरू की
आज्ञानुसार उन के मुख्य ग्रंथ भक्तमाल छंदबंद की टीका उनके देहान्त होने के
पीछे बनाई, परंतु मिश्र-बंधु विनोद मैं सं० १७२० के लगभग इन का मृत्यु-काल
सिद्ध किया गया है। इन की जाति के विषय मैं झगड़ा है, प्रायः लोग डोम
बतलाते हैं। इन के शिष्य प्रियादासजी ने अपनी टीका में इन्हें हनुमान-वंशी
लिखा है और माड़वारी भाषा में डोम शब्द का प्रयोजन हनुमान है। दूसरे
टीकाकार ने ऐसा लिखा है कि वैष्णवों की जाति पाँति वक्तव्य नहीं है। नाभाजी
अग्रदास के शिष्य और गुसाईँ तुलसीदासजी के बड़े मित्र थे ।
॥ शब्द ॥
नाभा नभ खेला कँवल केल रस सैला ॥ टेक ॥
दरपन नैन सैन मन माँजा, लाजा अलख अकेला ॥१॥
पल पर दल दल ऊपर दामिनि, जोत मैं होत उजेला ॥२॥
झंडा पार सार लख सूरन, सुन्नी सुन्न सुहेला ॥ ३ ॥
चढ़ गइ धाय जाय गढ़ ऊपर, सबद सुरत भया मेला ॥४॥
यह सब खेल अलेख अमेला, सिंध नीर नद मेला ॥ ५ ॥
जल जलधार सार पद जैसे, नहीं गुरू नहिं चेला ॥ ६ ॥
नाभा नैन सैन अंदर के, खुल गये निरख निहाला ॥७॥
संत उचिष्ट वार मन झेला, दुर्लभ दीन दुहेला ॥ ८ ॥
(१) नीची निगाह कर देख ।