संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ शब्द संग्रह
देह परे इंद्री परे अंतःकरण परे ।
एकही अखंड जाप ताप१ कूँ हरतु है ॥
काठ की रुद्राच्छ की रु सूतहू की माला और ।
इनके फिराये कछु कारज सरतु है ॥
सुंदर कहत ता तैं आतमा चैतन्य रूप ।
आप को भजन सो तो आपही करतु है ॥
॥ शूर ॥
(१)
पाँव रोपि रहै, रण माहिँ रजपूत कोऊ ।
हय गज गाजत, जुरत जहाँ दल है ॥
बाजत जुझाऊ सहनाई, सिंधु राग पुनि ।
सुनतहि कायर की, छूटि जात कल है ॥
झलकत बरछी, तिरछी तरवार बहै ।
मार मार करत, परत खलभल२ है ॥
ऐसे जुद्ध मैं अडिग्ग, सुंदर सुभट सोई ।
घर माहिँ सूरमा, कहावत सकल है ॥
(२)
असन बसन३ बहु, भूषण सकल अंग ।
संपति बिबिधि भाँति, भर्यो सब घर है ॥
श्रवण नगारो सुनि, छिनक मैं छाड़ि जात ।
ऐसे नहिँ जानै कछु, मेरो वहाँ घर है ॥
मन मैं उछाह, रण माहिँ टूक टूक होइ ।
निर्भय निसंक वा के, रंचहू न डर है ॥
सुंदर कहत कोउ, देह को ममत्व नाहिँ ।
सूरमा को देखियत, सीस बिनु धर है ॥
(१) तपन, दुख । (२) खलबल, घबराहट । (३) भोजन और वस्त्र ।