सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 267 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 117

१०८ शब्द संग्रह
देह परे इंद्री परे अंतःकरण परे ।
एकही अखंड जाप ताप१ कूँ हरतु है ॥
काठ की रुद्राच्छ की रु सूतहू की माला और ।
इनके फिराये कछु कारज सरतु है ॥
सुंदर कहत ता तैं आतमा चैतन्य रूप ।
आप को भजन सो तो आपही करतु है ॥
॥ शूर ॥
(१)
पाँव रोपि रहै, रण माहिँ रजपूत कोऊ ।
हय गज गाजत, जुरत जहाँ दल है ॥
बाजत जुझाऊ सहनाई, सिंधु राग पुनि ।
सुनतहि कायर की, छूटि जात कल है ॥
झलकत बरछी, तिरछी तरवार बहै ।
मार मार करत, परत खलभल२ है ॥
ऐसे जुद्ध मैं अडिग्ग, सुंदर सुभट सोई ।
घर माहिँ सूरमा, कहावत सकल है ॥
(२)
असन बसन३ बहु, भूषण सकल अंग ।
संपति बिबिधि भाँति, भर्यो सब घर है ॥
श्रवण नगारो सुनि, छिनक मैं छाड़ि जात ।
ऐसे नहिँ जानै कछु, मेरो वहाँ घर है ॥
मन मैं उछाह, रण माहिँ टूक टूक होइ ।
निर्भय निसंक वा के, रंचहू न डर है ॥
सुंदर कहत कोउ, देह को ममत्व नाहिँ ।
सूरमा को देखियत, सीस बिनु धर है ॥
(१) तपन, दुख । (२) खलबल, घबराहट । (३) भोजन और वस्त्र ।