संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० शब्द संग्रह
(२)
हम कूँ तौ रैन दिन, संक मन माँहिँ रहै ।
उनकी तौ बातनि मैं, ठीकहु न पाइये ॥
कबहूँ संदेसा सुनि, अधिक उछाह¹ होइ ।
कबहूँक रोइ रोइ, आँसुन बहाइये ॥
औरन के रस बस, होइ रहे प्यारे लाल ।
आवन की कहि कहि, हम कूँ सुनाइये ॥
सुंदर कहत ताहि, काटिये सु कौन भाँति ।
जोइ तरु आपने सु, हाथ तैं लगाइये ॥
॥ अद्वैत ॥
(१)
ब्रह्म निरंतर व्यापक अग्नि, अरूप अखंडित है सब माहीं ॥
ईसुर पावक रासि प्रचंड जु, संग उपाधि लिये बरताहीं ॥
जीव अनंत मसाल चिराग, सु दीप पतंग अनेक दिखाहीं॥
सुंदर द्वैत उपाधि मिटै जब, ईसुर जीव जुदे कछु नाहीं ॥
(२)
जैसे ईख रस की मिठाई, भाँति भाँति भई ।
फेरि करि गारे, ईख रसही लहतु है ॥
जैसे घृत थीज के, डरा सौं बँधि जात पुनि ।
फेर पिघले तैं वह, घृतही रहतु है ॥
जैसे पानी जमि के, पषाण हू सौं देखियत ।
सो पषाण फेरि पानी, होय के बहुतु है ॥
तैसेही सुंदर यह, जगत है ब्रह्ममय ।
ब्रह्म सो जगतमय, वेद सु कहतु है ॥
(१) आनन्द ।