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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 267 में से

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पृष्ठ 118

सुंदरदासजी १०६
॥ पतिव्रता ॥
(१)
जल को सनेही मीन, बिछुरत तजै प्रान ।
मणि बिनु अहि¹ जैसे, जीवत न लहिये ॥
स्वाँति बुंद को सनेही, प्रगट जगत माहिँ ।
एक साँप दूसरो सु, चातक हु कहिये ॥
रबि को सनेही पुनि, कमल सरोवर मैं ।
ससि को सनेही हू, चकोर जैसे रहिये ॥
तैसेही सुंदर एक, प्रभु सूँ सनेह जोरि ।
और कछु देखि, काहू ओर नहिँ चहिये ॥
(२)
एक सही सब के उर अंतर, ता प्रभु कूँ कहु काहि न गावै ।
संकट माहिँ सहाय करै पुनि, सो अपनो पति क्यूँ बिसरावै ॥
चार पदारथ और जहाँ लगि, आठहु सिद्धि नवौ निधि पावै।
सुंदर छार परौ तिन के मुख, जो हरि कूँ तजि आनकूँ ध्यावै ॥
॥ विरह उराहना² ॥
(१)
पीव को अँदेसो भारी, तो सूँ कहूँ सुन प्यारी ।
यारी³ तोरि गये सो तौ, अजहूँ न आये हैं ॥
मेरे तौ जीवन-प्रान, निसि दिन उहै ध्यान ।
मुख सूँ न कहूँ आन, नैन उर लाये हैं ॥
जब तैं गये बिछोहि, कल न परत मोहिँ ।
ता तैँ हूँ पूछत तोहि, किन बिरमाये⁴ है ॥
सुंदर बिरहिनी को, सोच सखी बार बार ।
हम कूँ बिसार अब, कान के कहाये हैं ॥
(१) साँप । (२) उलहना । (३) स्नेह । (४) रिझाकर रोक लेना ।