संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुंदरग्रंथावली १११
॥ जीवात्मा वा गुप्त ॥
स्रोत्र सुनैं दृग देखत हैं, रसना रस घ्राण सुगंध पियारो ॥
कोमलता त्वक¹ जानत है पुनि, बोलत है मुख सबद उचारो॥
पाणि² गहै पद गौन करै, मलमूत्र तजै उभयो³ अध-द्वारो ॥
जासु प्रकास प्रकासत हैं सब, सुंदर सोई रहै घट न्यारो ॥
॥ स्वरूप विस्मरण ॥
(१)
आप न देखत है अपनो मुख, दर्पण काट⁴ लग्यो अति थूला॥
ज्यूँ दृग देखत तैं रहि जात, भयो जबहीँ पुतरी परि फूला ॥
छाय अज्ञान रह्यो अभिअंतर, जानि सकै नहिँ आतम मूला॥
सुंदर यूँ उपजे मन के मल, ज्ञान बिना निज रूपहि भूला ॥
(२)
इंद्रिन कूँ प्रेरि पुनि, इंद्रिन के पीछे पर्यो ।
आपनी अविद्या करि, आप तनु गह्यो है ॥
जोइ जोइ देह कूँ, संकट आइ परै कछु ।
सोइ सोइ मानै आप, या तैँ दुख सह्यो है ॥
भ्रमत भ्रमत कहूँ, भ्रम को न आवै अंत ।
चिरकाल बीत्यो पै, स्वरूप कूँ न लह्यो है ॥
सुंदर कहत देखो, भ्रम की प्रबलताई ।
भूतन मैं भूत मिलि, भूत होइ रह्यो है ॥
॥ भ्रम ॥
जैसे स्वान काच के, सदन⁵ मध्य देखि और ।
भूँकि भूँकि मरत, करत अभिमान जू ॥
जैसे गज फटिक, सिला सूँ लरि तोरै दंत ।
जैसे सिंह कूप माहिँ, उछक भुलान जू ॥
(१) त्वचा । (२) हाथ । (३) दोनों । (४) मोरचा । (५) घर ।