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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 267 में से

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पृष्ठ 124

सुन्दरदासजी ११५
॥ विश्वास ॥
(१)
धीरज धारि विचार निरंतर, ताहि रच्यो सोइ आपुहि ऐहै॥
जेतिक भूख लगी घट प्राणहिं, तेतिक तू अनयासहि पैहै॥
जो मन मैं तृस्ना करि धावत, तौ तिहुँ लोक न खात अघैहै॥
सुंदर तू मत सोच करै कछु, चोंच दई जिन चूनहु दैहै॥
(२)
जगत मैं आइ के, बिसायो है जगतपति ।
जगत कियो है सोई, जगत भरतु है ॥
तेरे निसि दिन चिंता, औरहि परी है आइ ।
उद्यम अनेक, भाँति भाँति के करतु है ॥
इत उत जाय के, कमाई करि लाऊँ कछु ।
नेक न अज्ञानी नर, धीरज धरतु है ॥
सुंदर कहत एक, प्रभु के विस्वास बिनु ।
बादहि कूँ वृथा सठ, पचि के मरतु है ॥
॥ ज्ञानी ॥
(१)
तमोगुण बुद्धि सो तौ, तवा के समान जैसे ।
ता के मध्य सूरज की, रंचहू न जोत है ॥
रजोगुण बुद्धि जैसे, आरसी की औंधी ओर ।
ता के मध्य सूरज की, कछुक उद्योत१ है ॥
सत्त्वगुण बुद्धि जैसे, आरसी की सूधी ओर ।
ता के मध्य प्रतिबिंब, सूरज को पोत२ है ॥
त्रिगुण अतीत३ जैसे, प्रतिबिंब मिटि जात ।
सुंदर कहत एक, सूरजही होत है ॥
(१) चमक । (२) गुण । (३) तीनों गुण से रहित ।