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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

राग सारंग ६६
॥ उपदेश ॥
(१)
जिंदरा मेरे सुमिर सार, काम क्रोध मद तजि बिकार ॥टेक॥
तूँ जिनि भूले मन गँवार, सिर भार न लीजै मानि हार ॥१॥
सुणि समझायौ बारवार, अजहूँ न चेतै हो हुसियार ॥२॥
करि तैसैं भव तिरिये पार, दादू इव थैं यहि बिचार ॥३॥
(२)
डरिये रे डरिये, परमेसुर थैं डरिये रे ।
लेखा लेवै भरि भरि देवै, ता थैं बुरा न करिये रे ॥टेक॥
साचा लीजी साचा दीजी, साचा सौदा कीजो रे ।
साचा राखी झूठा नाखी, विष ना पीजो रे ॥ १ ॥
निर्मल गहिये निर्मल रहिये, निर्मल कहिये रे ।
निर्मल लीजी निर्मल दीजी, अनत न बहिये रे ॥ २ ॥
साह पठाया वनिज न आया, जिनि डहकावै रे ।
झूठ न भावै फेरि पठावै, कीया पावै रे ॥ ३ ॥
पंथ दुहेला जाइ अकेला, भार न लीजी रे ।
दादू मेला होइ सुहेला, सो कुछ कीजो रे ॥ ४ ॥
॥ मन ॥
(१)
मन चंचल मेरो कह्यौ न मानै, दसौँ दिसा दौरावै रे ।
आवत जात बार नहिं लागै, बहुत भाँति बौरावै रे ॥टेक॥
बेर बेर वरजत या मन कौँ, किंचित सीख न मानै रे ।
ऐसैं निकसि जात या तन थैं, जैसैं जीव न जानै रे ॥१॥
कोटिक जतन करत या मन कौँ, निहचल निमिष न होई रे ।
चंचल चपल चहूँ दिसि भरमै, कहा करै जन कोई रे ॥२॥
सदा सोच रहत घट भीतरि, मन थिर कैसैं कीजै रे ।
सहजैँ सहज साध की संगति, दादू हरि भजि लीजै रे ॥३॥

१०० दादू दयाल
(२)
मेरे तुम्हौं राखणहार, दूजा को नहीं ।
ये चंचल चहुँ दिसि जाइ, काल तहाँ तहाँ ॥ टेक ॥
मैं केते किये उपाइ, निहचल ना रहै ।
जहाँ बरजौं तहँ जाइ, मदमाता बहै ॥ १ ॥
जहाँ जाणै तहँ जाइ, तुम थैं ना डरै ।
ता स्यूँ कहा बसाइ, भावै त्यूँ करै ॥ २ ॥
सकल पुकारैं साध, मैं केता कह्या ।
गुर अंकुस मानै नाहिं, निरभै ह्वै रह्या ॥ ३ ॥
तुम बिन और न कोइ, इस मन को गहै ।
तूं राखै राखणहार, दादू तौ रहै ॥ ४ ॥
॥ जगत-मिथ्या ॥
मन रे तूँ देखै सो नाहीं, है सो अगम अगोचर माहीं ॥टेक
निस अँधियारी कछू न सूझै, संसै सरप दिखावा ।
ऐसैं अंध जगत नहिं जानै, जीव जेवड़ी¹ खावा ॥ १ ॥
मृग-जल देखि तहाँ मन धावै, दिन दिन झूठी आसा ।
जहँ जहँ जाइ तहाँ जल नाहीं, निहचै मरै पियासा ॥२॥
भरम बिलास बहुत बिधि कीन्हा, ज्यौं सुपिनैं सुख पावै ।
जागत झूठ तहाँ कुछ नाहीं, फिरि पीछैं पछितावै ॥३॥
जब लग सूता तब लग देखै, जागत भरम बिलाना ।
दादू अंति इहाँ कुछ नाहीं, है सो सोधि सयाना ॥ ४ ॥
॥ करम धरम ॥
मूल सींचि बघै² ज्यूँ बेला । सो तत तरवर रहै अकेला ॥टेक॥
देवी देखत फिरैं ज्यूँ भूले । खाइ हलाहल बिख कौँ फूले ।
सुख कौँ चाहै पड़ै गल पासी³। देखत हीरा हाथ थैं जासी ॥१॥
(१) रस्सी । (२) बढ़ै । (३) फाँसी ।

केहू पूजा रचि ध्यान लगावैं । देवल देखैं खबरि न पावैं ।
तोरैं पाती जुगति न जानी । इहि भ्रमि रहे भूलि अभिमानी ॥२
तीरथ बरत न पूजै१ आसा । बनखंडि जाहीं रहैं उदासा ।
यूँ तप करि करि देह जलावैं । भरमत डोलैं जनम गँवावैं ॥३
सतगुर मिलैं न संसा जाई । ये बंधन सब देइँ छुड़ाई ।
तब दादू परम गति पावै । सो निज मूरति माहिं लखावै ॥४
॥ कपट भक्ति ॥
हम पाया हम पाया रे भाई ।
भेष बनाइ ऐसी बनि आई ॥ टेक ॥
भीतर का यहु भेद न जानै ।
कहै सुहागनि ज्यूँ मन मानै ॥ १ ॥
अंतर पीव सौं परचा नाहीं ।
भई सुहागनि लोगन माहीं ॥ २ ॥
साँई सुपिनै कबहूँ न आवै ।
कहिया ऐसैं महल बुलावै ॥ ३ ॥
इन बातन मोहिं अचिरज आवै ।
पटम२ कियैं पिव कैसैं पावै ॥ ४ ॥
दादू सुहागनि ऐसैं कोई ।
आपा मेटि राम रत होई ॥ ५ ॥
॥ निंदक ॥
न्यंदक बाबा बीर हमारा । बिनहीं कौड़ै बहै विचारा३॥टेक
कर्म कोटि के कुसमल काटै । काज सँवारै बिनहीं साटै४ ॥१
आपण डूबै और कौं तारै । ऐसा प्रीतम पार उतारै ॥२॥
जुगि जुगि जीवौ न्यंदक मोरा । राम देव तुम करौ निहोरा ३
न्यंदक बपुरा पर-उपगारी। दादू न्यंद्या करै हमारी ॥४॥
(१) पूरन होय । (२) पाखंड । (३) बेचारा बिना पैसे [कौड़े] के काम करता
रहता है [बहै] । (४) बदला, मुआवज़ा ।

बाबा मलूकदास
────────
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ ६६]
॥ गुरुदेव ॥
हमरा सतगुरु बिरले जाने ।
सुई के नाके सुमेर चलावै, सो यह रूप बखानै ॥ १ ॥
की तो जानै दास कबीरा, की हरिनाकस पूता ।
की तो नामदेव औ नानक, की गोरख अवधूता ॥ २ ॥
हमरे गुरु की अदभुत लीला, ना कछु खाय न पीवै ।
ना वह सोवै ना वह जागै, ना वह मरै न जीवै ॥ ३ ॥
बिन तरवर फल फूल लगावै, सो तो वा का चेला ।
छिन मैं रूप अनेक धरत है, छिन मैं रहै अकेला ॥ ४ ॥
बिन दीपक उँजियारा देखै, ऐँड़ी समुँद थहावै ।
चींटी के पग कुंजर बाँधै, जा को गुरु लखावै ॥ ५ ॥
बिन पंखन उड़ि जाय अकासे, बिन पंखन उड़ि आवै ।
सोई सिष्य गुरू का प्यारा, सूखे नाव चलावै ॥ ६ ॥
बिन पायन सब जग फिरि आवै, सो मेरा गुरु भाई ।
कहै मलूक ता की बलिहारी, जिन यह जुगत बताई ॥७॥
॥ नाम ॥
नाम तुम्हारा निरमला, निरमोलक हीरा ।
तू साहिब समरथ्थ, हम मल मुत्र कै कीरा ॥ १ ॥
पाप न राखै देह मैं, जब सुमिरन करिये ।
एक अच्छर के कहत ही, भौसागर तरिये ॥ २ ॥
अधम-उधारन सब कहैं, प्रभु बिरद तुम्हारा ।
सुनि सरनागत आइया, तब पार उतारा ॥ ३ ॥

बाबा मलूकदास १०३
तुझ सा गरुवा औ धनी, जा मैं बड़ई समाई ।
जरत उवारे पांडवा, ताती बाव न लाई ॥ ४ ॥
कोटिक औगुन जन करै, प्रभु मनहिँ न आनै ।
कहत मलूकादास को, अपना करि जानै ॥ ५ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
तेरा मैं दोदार दिवाना ।
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूँ, सुन साहिब रहमाना ॥१॥
हुआ अलमस्त खबर नहिँ तन की, पीया प्रेम पियाला ।
ठाढ़ होउँ तो गिरि गिरि परता, तेरे रँग मतवाला ॥२॥
खड़ा रहूँ दरबार तुम्हारे, ज्यौँ घर का बंदाजादा¹ ।
नेकी की कुलाह² सिर दीये, गले पैरहन³ साजा ॥ ३ ॥
तौजी और निमाज न जानूँ, ना जानूँ धरि रोजा ।
बाँग जिकिर⁴ तबही से बिसरी, जब से यह दिल खोजा ॥४
कहैँ मलूक अब कजा⁵ न करिहौँ, दिलही सौँ दिल लाया ।
मक्का हज्ज हिये मैं देखा, पूरा मुरसिद पाया ॥५॥
(२)
दर्द-दिवाने बावरे, अलमस्त फकीरा ।
एक अकीदा⁶ लै रहे, ऐसे मन धीरा ॥ १ ॥
प्रेम पियाला पीवते, बिसरे सब साथी ।
आठ पहर योँ झूमते, ज्योँ माता हाथी ॥ २ ॥
उनकी नजर न आवते, कोइ राजा रंक ।
बंधन तोड़े मोह के, फिरते निहसंक ॥ ३ ॥
(१) गुलाम बच्चा । (२) टोपी । (३) मेखली । (४) सुमिरन । (५) छूटी हुई
नमाज़ पढ़ना । (६) प्रतीत ।

१०४ शब्द संग्रह
साहिब मिल साहिब भये, कछु रहि न तमाई१ ।
कहैं मलूक तिस घर गये, जहाँ पवन न जाई ॥ ४ ॥
॥ विनय ॥
(१)
अब तेरी सरन आयो राम ॥ १ ॥
जबै सुनिया साध के मुख, पतित-पावन नाम ॥ २ ॥
यही जान पुकार कीन्ही, अति सतायो काम ॥ ३ ॥
विषय सेती भयों आजिज, कह मलूक गुलाम ॥ ४ ॥
(२)
दीन-बंधु दीना-नाथ, मेरी तन हेरिये ॥ टेक ॥
भाई नाहिं बंधु नाहिं, कुटुम परिवार नाहिं ।
ऐसा कोई मित्र नाहिं, जाके ढिंग जाइये ॥ १ ॥
सोने की सलैया नाहिं, रूपे का रुपैया नाहिं ।
कौड़ी पैसा गाँठि नाहिं, जा से कछु लीजिये ॥ २ ॥
खेती नाहिं बारी नाहिं, बनिज व्यौपार नाहिं ।
ऐसा कोई साहु नाहिं, जा सौँ कछु माँगिये ॥ ३ ॥
कहत मलूकदास, छोड़ दे पराई आस ।
राम धनी पाय के, अब का की सरन जाइये ॥ ४ ॥
(३)
सवैया
दीन दयाल सुने जब तैं तब तैं, मन मैं कछु ऐसी बसी है ॥१।
तेरो कहाय के जाऊँ कहाँ, तुम्हरे हित की पट२ खाँचि कसी है
तेरोही आसरो एक मलूक, नहीं प्रभु सों कोउ दूजो जसी है३
ए हो मुरार पुकार कहौं अब, मेरी हँसी नहिं तेरी हँसी है४
(१) इच्छा, चाह। (२) पटका।

बाबा मलूकदास १०५
॥ उपदेश ॥
(१)
ना वह रीझै जप तप कीन्हे, ना आतम को जारे ।
ना वह रीझै धोती नेती, ना काया के पखारे ॥ १ ॥
दाया करै धरम मन राखै, घर मैं रहै उदासी ।
अपना सा दुख सब का जानै, ताहि मिलै अबिनासी ॥२॥
सहै कुसबद वाद हू त्यागै, छाड़ै गर्ब गुमाना ।
यही रीझ मेरे निरंकार की, कहत मलूक दिवाना ॥३॥
(२)
मन तैं इतने भरम गँवावो ।
चलत विदेस बिप्र जनि पूछो, दिन का दोष न लावो ॥१॥
संझा होय करो तुम भोजन, बिनु दीपक के बारे ।
जैन कहैं असुरन की बिरिया, मूढ़ दई के मारे ॥२॥
आप भले तो सबहि भले हैं, बुरा न काहू कहिये ।
जा के मन कछु बसै बुराई, ता सौं भागे रहिये ॥३॥
लोक बेद का पैंड़ा औरहि, इनकी कौन चलावै ।
आतम मारि पषानै पूजैं, हिरदे दया न आवै ॥४॥
रहो भरोसे एक राम के, सूरे का मत लीजै ।
संक्रट पड़े हरज नहिं मानो, जिय का लोभ न कीजै ॥५॥
किरिया करम अचार भरम है, यही जगत का फंदा ।
माया जाल मैं बाँधि अँड़ाया१, क्या जानै नर अंधा ॥६॥
यह संसार बड़ा भौसागर, ता को देखि सकाना२ ।
सरन गये तोहिं अब क्या डर है, कहत मलूक दिवाना ॥७॥
॥ माया ॥
हम से जनि लागै तू माया ।
थोरे सें फिर बहुत होयगी, सुनि पैहैं रघुराया ॥१॥
(१) गिराया । (२) डरा ।
१४

१०६ शब्द संग्रह
अपने मैं है साहिब हमरा, अजहूँ चेतु दिवानी ।
काहू जन के बस परि जैहै, भरत मरहुगी पानी ॥ २ ॥
तर ह्वै, चितै¹ लाज करु जन की, डारु हाथ की फाँसी ।
जन तैं तेरो जोर न लहिहै, रच्छपाल अबिनासी ॥३॥
कहै मलूका चुप करु ठगनी, औगुन राखु दुराई ।
जो जन उबरै राम नाम कहि, ता तैं कछु न बसाई ॥४॥
नाभाजी
इन का जीवन समय सत्रहवाँ शतक था और इन का देहान्त होना
सं० १७०० मैं इन के शिष्य प्रियादास जी ने लिखा है जिन्हों ने अपने गुरू की
आज्ञानुसार उन के मुख्य ग्रंथ भक्तमाल छंदबंद की टीका उनके देहान्त होने के
पीछे बनाई, परंतु मिश्र-बंधु विनोद मैं सं० १७२० के लगभग इन का मृत्यु-काल
सिद्ध किया गया है। इन की जाति के विषय मैं झगड़ा है, प्रायः लोग डोम
बतलाते हैं। इन के शिष्य प्रियादासजी ने अपनी टीका में इन्हें हनुमान-वंशी
लिखा है और माड़वारी भाषा में डोम शब्द का प्रयोजन हनुमान है। दूसरे
टीकाकार ने ऐसा लिखा है कि वैष्णवों की जाति पाँति वक्तव्य नहीं है। नाभाजी
अग्रदास के शिष्य और गुसाईँ तुलसीदासजी के बड़े मित्र थे ।
॥ शब्द ॥
नाभा नभ खेला कँवल केल रस सैला ॥ टेक ॥
दरपन नैन सैन मन माँजा, लाजा अलख अकेला ॥१॥
पल पर दल दल ऊपर दामिनि, जोत मैं होत उजेला ॥२॥
झंडा पार सार लख सूरन, सुन्नी सुन्न सुहेला ॥ ३ ॥
चढ़ गइ धाय जाय गढ़ ऊपर, सबद सुरत भया मेला ॥४॥
यह सब खेल अलेख अमेला, सिंध नीर नद मेला ॥ ५ ॥
जल जलधार सार पद जैसे, नहीं गुरू नहिं चेला ॥ ६ ॥
नाभा नैन सैन अंदर के, खुल गये निरख निहाला ॥७॥
संत उचिष्ट वार मन झेला, दुर्लभ दीन दुहेला ॥ ८ ॥
(१) नीची निगाह कर देख ।

सुंदरदासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १०६ ]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
सो गुरुदेव लिपै न छिपै कछु,
सत्व रजो तम ताप निवारी ।
इंद्रिय देह मृषा¹ करि जानत,
सीतलता समता² उर धारी ॥
व्यापक ब्रह्म विचार अखंडित,
द्वैत उपाधि सबै जिन टारी ।
सबद सुनाय संदेह मिटावत,
सुंदर वा गुरु की बलिहारी ॥
(२)
गोविंद के किये जीव, जात है रसातल को ।
गुरु उपदेसे से तो, छूटै जम फंद तैं ॥
गोविंद के किये, जीव बस परे कर्मन के ।
गुरु के निवाजे से, फिरत है स्वच्छंद³ तैं ॥
गोविंद के किये, जीव बूडत भवसागर मैं ।
सुंदर कहत गुरु, काढै दुःख द्वंद⁴ तैं ।
और हू कहाँ लौं कछू, मुख तैं कहूँ बनाय ।
गुरु की तौ महिमा, अधिक है गोविंद तैं ॥
॥ अजपा जाप ॥
स्वासाँ स्वास राति दिन सोहं सोहं होइ जाप ।
याही माला बारंबार दृढ़ कै धरतु है ॥
(१) वृथा। (२) सम-दृष्टि। (३) स्वाधीन। (४) झगड़ा।

१०८ शब्द संग्रह
देह परे इंद्री परे अंतःकरण परे ।
एकही अखंड जाप ताप१ कूँ हरतु है ॥
काठ की रुद्राच्छ की रु सूतहू की माला और ।
इनके फिराये कछु कारज सरतु है ॥
सुंदर कहत ता तैं आतमा चैतन्य रूप ।
आप को भजन सो तो आपही करतु है ॥
॥ शूर ॥
(१)
पाँव रोपि रहै, रण माहिँ रजपूत कोऊ ।
हय गज गाजत, जुरत जहाँ दल है ॥
बाजत जुझाऊ सहनाई, सिंधु राग पुनि ।
सुनतहि कायर की, छूटि जात कल है ॥
झलकत बरछी, तिरछी तरवार बहै ।
मार मार करत, परत खलभल२ है ॥
ऐसे जुद्ध मैं अडिग्ग, सुंदर सुभट सोई ।
घर माहिँ सूरमा, कहावत सकल है ॥
(२)
असन बसन३ बहु, भूषण सकल अंग ।
संपति बिबिधि भाँति, भर्यो सब घर है ॥
श्रवण नगारो सुनि, छिनक मैं छाड़ि जात ।
ऐसे नहिँ जानै कछु, मेरो वहाँ घर है ॥
मन मैं उछाह, रण माहिँ टूक टूक होइ ।
निर्भय निसंक वा के, रंचहू न डर है ॥
सुंदर कहत कोउ, देह को ममत्व नाहिँ ।
सूरमा को देखियत, सीस बिनु धर है ॥
(१) तपन, दुख । (२) खलबल, घबराहट । (३) भोजन और वस्त्र ।

सुंदरदासजी १०६
॥ पतिव्रता ॥
(१)
जल को सनेही मीन, बिछुरत तजै प्रान ।
मणि बिनु अहि¹ जैसे, जीवत न लहिये ॥
स्वाँति बुंद को सनेही, प्रगट जगत माहिँ ।
एक साँप दूसरो सु, चातक हु कहिये ॥
रबि को सनेही पुनि, कमल सरोवर मैं ।
ससि को सनेही हू, चकोर जैसे रहिये ॥
तैसेही सुंदर एक, प्रभु सूँ सनेह जोरि ।
और कछु देखि, काहू ओर नहिँ चहिये ॥
(२)
एक सही सब के उर अंतर, ता प्रभु कूँ कहु काहि न गावै ।
संकट माहिँ सहाय करै पुनि, सो अपनो पति क्यूँ बिसरावै ॥
चार पदारथ और जहाँ लगि, आठहु सिद्धि नवौ निधि पावै।
सुंदर छार परौ तिन के मुख, जो हरि कूँ तजि आनकूँ ध्यावै ॥
॥ विरह उराहना² ॥
(१)
पीव को अँदेसो भारी, तो सूँ कहूँ सुन प्यारी ।
यारी³ तोरि गये सो तौ, अजहूँ न आये हैं ॥
मेरे तौ जीवन-प्रान, निसि दिन उहै ध्यान ।
मुख सूँ न कहूँ आन, नैन उर लाये हैं ॥
जब तैं गये बिछोहि, कल न परत मोहिँ ।
ता तैँ हूँ पूछत तोहि, किन बिरमाये⁴ है ॥
सुंदर बिरहिनी को, सोच सखी बार बार ।
हम कूँ बिसार अब, कान के कहाये हैं ॥
(१) साँप । (२) उलहना । (३) स्नेह । (४) रिझाकर रोक लेना ।

११० शब्द संग्रह
(२)
हम कूँ तौ रैन दिन, संक मन माँहिँ रहै ।
उनकी तौ बातनि मैं, ठीकहु न पाइये ॥
कबहूँ संदेसा सुनि, अधिक उछाह¹ होइ ।
कबहूँक रोइ रोइ, आँसुन बहाइये ॥
औरन के रस बस, होइ रहे प्यारे लाल ।
आवन की कहि कहि, हम कूँ सुनाइये ॥
सुंदर कहत ताहि, काटिये सु कौन भाँति ।
जोइ तरु आपने सु, हाथ तैं लगाइये ॥
॥ अद्वैत ॥
(१)
ब्रह्म निरंतर व्यापक अग्नि, अरूप अखंडित है सब माहीं ॥
ईसुर पावक रासि प्रचंड जु, संग उपाधि लिये बरताहीं ॥
जीव अनंत मसाल चिराग, सु दीप पतंग अनेक दिखाहीं॥
सुंदर द्वैत उपाधि मिटै जब, ईसुर जीव जुदे कछु नाहीं ॥
(२)
जैसे ईख रस की मिठाई, भाँति भाँति भई ।
फेरि करि गारे, ईख रसही लहतु है ॥
जैसे घृत थीज के, डरा सौं बँधि जात पुनि ।
फेर पिघले तैं वह, घृतही रहतु है ॥
जैसे पानी जमि के, पषाण हू सौं देखियत ।
सो पषाण फेरि पानी, होय के बहुतु है ॥
तैसेही सुंदर यह, जगत है ब्रह्ममय ।
ब्रह्म सो जगतमय, वेद सु कहतु है ॥
(१) आनन्द ।

सुंदरग्रंथावली १११
॥ जीवात्मा वा गुप्त ॥
स्रोत्र सुनैं दृग देखत हैं, रसना रस घ्राण सुगंध पियारो ॥
कोमलता त्वक¹ जानत है पुनि, बोलत है मुख सबद उचारो॥
पाणि² गहै पद गौन करै, मलमूत्र तजै उभयो³ अध-द्वारो ॥
जासु प्रकास प्रकासत हैं सब, सुंदर सोई रहै घट न्यारो ॥
॥ स्वरूप विस्मरण ॥
(१)
आप न देखत है अपनो मुख, दर्पण काट⁴ लग्यो अति थूला॥
ज्यूँ दृग देखत तैं रहि जात, भयो जबहीँ पुतरी परि फूला ॥
छाय अज्ञान रह्यो अभिअंतर, जानि सकै नहिँ आतम मूला॥
सुंदर यूँ उपजे मन के मल, ज्ञान बिना निज रूपहि भूला ॥
(२)
इंद्रिन कूँ प्रेरि पुनि, इंद्रिन के पीछे पर्यो ।
आपनी अविद्या करि, आप तनु गह्यो है ॥
जोइ जोइ देह कूँ, संकट आइ परै कछु ।
सोइ सोइ मानै आप, या तैँ दुख सह्यो है ॥
भ्रमत भ्रमत कहूँ, भ्रम को न आवै अंत ।
चिरकाल बीत्यो पै, स्वरूप कूँ न लह्यो है ॥
सुंदर कहत देखो, भ्रम की प्रबलताई ।
भूतन मैं भूत मिलि, भूत होइ रह्यो है ॥
॥ भ्रम ॥
जैसे स्वान काच के, सदन⁵ मध्य देखि और ।
भूँकि भूँकि मरत, करत अभिमान जू ॥
जैसे गज फटिक, सिला सूँ लरि तोरै दंत ।
जैसे सिंह कूप माहिँ, उछक भुलान जू ॥
(१) त्वचा । (२) हाथ । (३) दोनों । (४) मोरचा । (५) घर ।

११२ शब्द संग्रह
जैसे कोउ फेरी खात, फिरत सु देखै जग ।
तैसेही सुंदर सब, तेरोही अज्ञान जू ॥
अपनो ही भ्रम सो तौ, दूसरो दिखाई देत ।
आप कूँ विचारे कोऊ, देखिये न आन जू ॥
॥ मन ॥
(१)
पलही मैँ मरि जाय, पलही मैँ जीवतु है,
पलही मैँ पर हाथ, देखत बिकानो है ।
पलही मैँ फिरै, नवखंड हू ब्रह्मांड सब,
देख्यो अनदेख्यो सो तौ, या तैँ नहिँ छानो१ है ॥
जातो नहिँ जानियत, आवतो न दीसै कछु,
ऐसेसी बलाइ अब, ता सूँ पर्यो पानो२ है ।
सुंदर कहत या की, गति हू न लखि परै,
मन की प्रतीत कोऊ, करै सो दिवानो है ॥
(२)
घेरिये तौ घेरे हू, न आवत है मेरो पूत,
जोई परबोधिये, सो कान न धरतु है ।
नीति न अनीति देखै, सुभ न असुभ पेखै,
पल ही मैँ होती, अनहोती हू करतु है ॥
गुरु की न साधु की, न लोक वेदहू की संक,
काहू की न मानै, न तौ काहू तैँ डरतु है ।
सुंदर कहत ताहि, धीजिये३ सु कौन भाँति,
मन को सुभाव, कछु कह्यो न परतु है ॥
(३)
तो सोँ न कपूत कोऊ, कितहूँ न देखियत ।
तो सोँ न सपूत कोऊ, देखियत और है ॥
(१) छिपा । (२) पाला, वास्ता । (३) पतियाइये ।

सुंदरसाखी ११३
तूही आप भूलै महा, नीचहू तैं नीच होइ ।
तूही आप जानै तौ, सकल सिर मौर है ॥
तूही आप भ्रमै तब, जगत भ्रमत देखै ।
तेरे स्थित भये सब, ठौर ही को ठौर है ॥
तूही जीवरूप तूही, ब्रह्म है अकासवत ।
सुंदर कहत मन, तेरी सब दौर है ॥
॥ विचार ॥
(१)
एकहि कूप तैं नीरहि सींचत, ईख अफीमहि अंब अनारा ॥
होत उहै जल स्वाद अनेकनि, मिष्ट कटूक¹ खटा अरु खारा ॥
त्यूँही उपाधि संजोग तैं आतम, दीसत आदि मिल्यो सविकारा ॥
काढ़ि लिये सु बिबेक विचार सुँ, सुंदर सुद्ध सरूपहि न्यारा ॥
(२)
देह ओर देखिये तौ, देह पंचभूतन को ।
ब्रह्मा अरु कीट लग, देहही प्रधान है ॥
प्राण ओर देखिये तौ, प्राण सबही के एक ।
छुधा पुनि तृषा दोऊ, व्यापत समान है ॥
मन ओर देखिये तौ, मन को सुभाव एक ।
संकल्प विकल्प करै, सदाही अज्ञान है ॥
आतम बिचार किये, आतमाही दीसै एक ।
सुंदर कहत कोऊ, दूसरो न आन है ॥
॥ बचन विवेक ॥
(१)
और तौ बचन ऐसे, बोलत हैं पसु जैसे ।
तिन के तौ बोलिबे मैं, ढंगहूँ न एक है ॥
(१) कडुवा ।
१५

११४ शब्द संग्रह
कोऊ रात दिवस, बकतही रहत ऐसे ।
जैसी बिधि कूप मैं, बकत मानो भेक¹ है ॥
बिबिधि प्रकार करि, बोलत जगत सब ।
घट घट प्रतिमुख, बचन अनेक है ॥
सुंदर कहत ता तैं, बचन बिचारि लेहु ।
बचन तो वहै जा मैं, पाइये बिबेक है ॥
(२)
एकनि के बचन सुनत, अति सुख होइ ।
फूल से झरत हैं, अधिक मनभावने ॥
एकनि के बचन तौ, असि² मानौ बरसत ।
स्रवण के सुनत, लगत अलखावने ॥
एकनि के बचन, कटुक कहु बिष रूप ।
करत मरम छेद, दुक्ख उपजावने ॥
सुंदर कहत घट घट मैं बचन भेद ।
उत्तम मध्यम अरु, अधम सुहावने ॥
(३)
बोलिये तौ तब जब, बोलिबे की सुधि होइ ।
न तौ मुख मौन गहि, चुप होइ रहिये ॥
जोरिये तौ तब जब, जोरिबे की जानि परै ।
तुक छंद अरथ, अनूप जा मैं लहिये ॥
गाइये तौ तब जब, गाइबे को कंठ होइ ।
स्रवण के सुनतही, मन जाइ गहिये ॥
तुक-भंग छंद-भंग, अरथ मिलै न कछु ।
सुंदर कहत ऐसी, बाणी नहीं कहिये ॥


(१) मेंढक । (२) तलवार ।

सुन्दरदासजी ११५
॥ विश्वास ॥
(१)
धीरज धारि विचार निरंतर, ताहि रच्यो सोइ आपुहि ऐहै॥
जेतिक भूख लगी घट प्राणहिं, तेतिक तू अनयासहि पैहै॥
जो मन मैं तृस्ना करि धावत, तौ तिहुँ लोक न खात अघैहै॥
सुंदर तू मत सोच करै कछु, चोंच दई जिन चूनहु दैहै॥
(२)
जगत मैं आइ के, बिसायो है जगतपति ।
जगत कियो है सोई, जगत भरतु है ॥
तेरे निसि दिन चिंता, औरहि परी है आइ ।
उद्यम अनेक, भाँति भाँति के करतु है ॥
इत उत जाय के, कमाई करि लाऊँ कछु ।
नेक न अज्ञानी नर, धीरज धरतु है ॥
सुंदर कहत एक, प्रभु के विस्वास बिनु ।
बादहि कूँ वृथा सठ, पचि के मरतु है ॥
॥ ज्ञानी ॥
(१)
तमोगुण बुद्धि सो तौ, तवा के समान जैसे ।
ता के मध्य सूरज की, रंचहू न जोत है ॥
रजोगुण बुद्धि जैसे, आरसी की औंधी ओर ।
ता के मध्य सूरज की, कछुक उद्योत१ है ॥
सत्त्वगुण बुद्धि जैसे, आरसी की सूधी ओर ।
ता के मध्य प्रतिबिंब, सूरज को पोत२ है ॥
त्रिगुण अतीत३ जैसे, प्रतिबिंब मिटि जात ।
सुंदर कहत एक, सूरजही होत है ॥
(१) चमक । (२) गुण । (३) तीनों गुण से रहित ।

११६ शब्द संग्रह
(२)
बिधि न निषेध कछु, भेद न अभेद पुनि ।
क्रिया सो करत दीसै, यूँही नितप्रति है ॥
काहू कूँ निकट राखै, काहू कूँ तौ दूर भाखै ।
काहू सूँ नेरे न दूर, ऐसी जा की मति है ॥
रागहू न द्वेष कोऊ, सोक न उछाह दोऊ ।
ऐसी बिधि रहै कहूँ, रति न घिरति१ है ॥
बाहिर ब्योहार ठानै, मन मैं सुपन जानै ।
सुंदर ज्ञानी की कछु, अद्भुत गति है ॥
(३)
ज्ञानी कर्म करै नाना बिधि, अहंकार या तन को खोवै ॥
कर्मन को फल कछू न जोवै, अँतःकरण वासना धोवै ॥
ज्यूँ कोऊ खेती कूँ जोतत, लेकरि बीज भूनि के बोवै ॥
सुंदर कहै सुनो दृष्टांतहि, नाँगि२ नहाई कहा निचोवै ॥
॥ सांख्य ज्ञान ॥
(१)
छीर नीर मिले दोऊ, एकठेही होइ रहे ।
नीर जैसे छाड़ि हंस, छीर कूँ गहतु है ॥
कंचन मैं और धातु, मिलि करि बनि पर्यो ।
सुद्ध करि कंचन, सुनार ज्यूँ लहतु है ॥
पावकहूँ दारु३ मध्य, दारूहू सौं होइ रह्यो ।
मथि करि काढै वह, दारु कूँ दहतु है ॥
तैसेही सुंदर मिल्यो, आतमा अनात्मा जु ।
भिन्न भिन्न करै सो तौ, सांख्यही कहतु है ॥
(१) न कहीं आसक्त और न बिरक्त । (२) नंगी । (३) काठ

सुंदरदासजी ११७
(२)
देह के सँजोगही तैं, सीत लगै घाम लगै ।
देह के सँजोगही तैं, क्षुधा तृषा पौन कूँ ॥
देह के सँजोगही तैं, कटुक¹ मधुर स्वाद ।
देह के सँजोग कहै, खाटो खारो लैन कूँ ॥
देह के सँजोग कहै, मुख तैं अनेक बात ।
देह के सँजोगही, पकरि रहै मौन कूँ ॥
सुंदर देह के सँजोग, दुख मानै सुख मानै ।
देह के सँजोग गये, दुख सुख कान कूँ ॥
॥ निःसंशय ज्ञानी ॥
भावै देह छूटि जाहु, कासी माहिं गंगा तट ।
भावै देह छूटि जाहु, क्षेत्र मगहर मैं ॥
भावै देह छूटि जाहु, विप्र के सदन² मध्य ।
भावै देह छूटि जाहु, श्वपच³ के घर मैं ॥
भावै देह छूटै देस, आरज अनारज⁴ मैं ।
भावै देह छूटि जाहु, वन मैं नगर मैं ॥
सुंदर ज्ञानी के कछु, संसय रहत नाहिं ।
सुरग नरक सब, भागि गयो भरमैं ॥
॥ प्रेम ज्ञानी ॥
द्वंद बिना विचरै बसुधा पर, जा घट आतमज्ञान अपारो ॥
काम न क्रोध न लोभ न मोह, न राग न द्वेष न म्हारु न थारो⁵॥
जोग न भोग न त्याग न संग्रह, देह दसा न ढँक्यो न उघारो॥
सुंदर कोउक जानि सकै यह, गोकुल गाँव को पैँडोहि न्यारो॥
(१) कडुवा । (२) घर । (३) डोम । (४) पवित्र चाहे अपवित्र देश मैं ।
(५) मेरा और तेरा ।

११८ शब्द संग्रह
॥ बाचक ज्ञान ॥
(१)
देह सूँ ममत्व पुनि, गेह सूँ समत्व ।
सुत दारा¹ सूँ ममत्व, मन माया मैं रहतु है ॥
थिरता न लहै जैसे, कंदुक² चौगान³ माहिँ ।
कर्मनि के बस भाख्यो, धक्का कूँ बहुतु है ॥
अंतःकरण सदा, जगत सूँ रचि रह्यो ।
मुख सूँ बनाय बात, ब्रह्म की कहतु है ॥
सुंदर अधिक मोहिँ, याहि तैँ अचंभो आहि ।
भूमि पर पर्यो कोऊ, चंद कूँ गहतु है ॥
(२)
ज्ञानी की सी बात कहै, मन तौ मलिन रहै ।
बासना अनेक भरि, नेक न निवारी है ॥
जैसे कोऊ आभूषण, अधिक बनाइ राखै ।
कलई ऊपर करि, भीतर भँगारी है ॥
ज्यूँही मन आवै त्यूँही, खेलत निसंक होइ ।
ज्ञान सुनि सीखि लियो, ग्रंथ⁴ न बिचारी है ॥
सुंदर कहत वा के, अटक न कोऊ आहि ।
जोई वा सूँ मिलै जाइ, ताही कूँ बिगारी है ॥
॥ आत्म अनुभव ॥
(१)
है दिल मैं दिलदार सही, अँखियाँ उलटी करि ताहि चित्तैये ॥
आब⁵ मैं खाक मैं बाद⁶ मैं आतस⁷, जान मैं सुंदर जानि जनैये ॥
नूर⁸ मैं नूर है तेज मैं तेजहि, ज्योति मैं ज्योति मिलै मिलि जैये ॥
क्या कहिये कहते न बनै कछु, जो कहिये कहते हिलजैये ॥
(१) स्त्री । (२) गेंद । (३) गेंद का खेल । (४) जड़ चेतन की गाँठ ।
(५) पानी । (६) हवा । (७) आग । (८) प्रकाश ।