संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाबा मलूकदास १०३
तुझ सा गरुवा औ धनी, जा मैं बड़ई समाई ।
जरत उवारे पांडवा, ताती बाव न लाई ॥ ४ ॥
कोटिक औगुन जन करै, प्रभु मनहिँ न आनै ।
कहत मलूकादास को, अपना करि जानै ॥ ५ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
तेरा मैं दोदार दिवाना ।
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूँ, सुन साहिब रहमाना ॥१॥
हुआ अलमस्त खबर नहिँ तन की, पीया प्रेम पियाला ।
ठाढ़ होउँ तो गिरि गिरि परता, तेरे रँग मतवाला ॥२॥
खड़ा रहूँ दरबार तुम्हारे, ज्यौँ घर का बंदाजादा¹ ।
नेकी की कुलाह² सिर दीये, गले पैरहन³ साजा ॥ ३ ॥
तौजी और निमाज न जानूँ, ना जानूँ धरि रोजा ।
बाँग जिकिर⁴ तबही से बिसरी, जब से यह दिल खोजा ॥४
कहैँ मलूक अब कजा⁵ न करिहौँ, दिलही सौँ दिल लाया ।
मक्का हज्ज हिये मैं देखा, पूरा मुरसिद पाया ॥५॥
(२)
दर्द-दिवाने बावरे, अलमस्त फकीरा ।
एक अकीदा⁶ लै रहे, ऐसे मन धीरा ॥ १ ॥
प्रेम पियाला पीवते, बिसरे सब साथी ।
आठ पहर योँ झूमते, ज्योँ माता हाथी ॥ २ ॥
उनकी नजर न आवते, कोइ राजा रंक ।
बंधन तोड़े मोह के, फिरते निहसंक ॥ ३ ॥
(१) गुलाम बच्चा । (२) टोपी । (३) मेखली । (४) सुमिरन । (५) छूटी हुई
नमाज़ पढ़ना । (६) प्रतीत ।