संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४ शब्द संग्रह
साहिब मिल साहिब भये, कछु रहि न तमाई१ ।
कहैं मलूक तिस घर गये, जहाँ पवन न जाई ॥ ४ ॥
॥ विनय ॥
(१)
अब तेरी सरन आयो राम ॥ १ ॥
जबै सुनिया साध के मुख, पतित-पावन नाम ॥ २ ॥
यही जान पुकार कीन्ही, अति सतायो काम ॥ ३ ॥
विषय सेती भयों आजिज, कह मलूक गुलाम ॥ ४ ॥
(२)
दीन-बंधु दीना-नाथ, मेरी तन हेरिये ॥ टेक ॥
भाई नाहिं बंधु नाहिं, कुटुम परिवार नाहिं ।
ऐसा कोई मित्र नाहिं, जाके ढिंग जाइये ॥ १ ॥
सोने की सलैया नाहिं, रूपे का रुपैया नाहिं ।
कौड़ी पैसा गाँठि नाहिं, जा से कछु लीजिये ॥ २ ॥
खेती नाहिं बारी नाहिं, बनिज व्यौपार नाहिं ।
ऐसा कोई साहु नाहिं, जा सौँ कछु माँगिये ॥ ३ ॥
कहत मलूकदास, छोड़ दे पराई आस ।
राम धनी पाय के, अब का की सरन जाइये ॥ ४ ॥
(३)
सवैया
दीन दयाल सुने जब तैं तब तैं, मन मैं कछु ऐसी बसी है ॥१।
तेरो कहाय के जाऊँ कहाँ, तुम्हरे हित की पट२ खाँचि कसी है
तेरोही आसरो एक मलूक, नहीं प्रभु सों कोउ दूजो जसी है३
ए हो मुरार पुकार कहौं अब, मेरी हँसी नहिं तेरी हँसी है४
(१) इच्छा, चाह। (२) पटका।