संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 114, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाबा मलूकदास १०५
॥ उपदेश ॥
(१)
ना वह रीझै जप तप कीन्हे, ना आतम को जारे ।
ना वह रीझै धोती नेती, ना काया के पखारे ॥ १ ॥
दाया करै धरम मन राखै, घर मैं रहै उदासी ।
अपना सा दुख सब का जानै, ताहि मिलै अबिनासी ॥२॥
सहै कुसबद वाद हू त्यागै, छाड़ै गर्ब गुमाना ।
यही रीझ मेरे निरंकार की, कहत मलूक दिवाना ॥३॥
(२)
मन तैं इतने भरम गँवावो ।
चलत विदेस बिप्र जनि पूछो, दिन का दोष न लावो ॥१॥
संझा होय करो तुम भोजन, बिनु दीपक के बारे ।
जैन कहैं असुरन की बिरिया, मूढ़ दई के मारे ॥२॥
आप भले तो सबहि भले हैं, बुरा न काहू कहिये ।
जा के मन कछु बसै बुराई, ता सौं भागे रहिये ॥३॥
लोक बेद का पैंड़ा औरहि, इनकी कौन चलावै ।
आतम मारि पषानै पूजैं, हिरदे दया न आवै ॥४॥
रहो भरोसे एक राम के, सूरे का मत लीजै ।
संक्रट पड़े हरज नहिं मानो, जिय का लोभ न कीजै ॥५॥
किरिया करम अचार भरम है, यही जगत का फंदा ।
माया जाल मैं बाँधि अँड़ाया१, क्या जानै नर अंधा ॥६॥
यह संसार बड़ा भौसागर, ता को देखि सकाना२ ।
सरन गये तोहिं अब क्या डर है, कहत मलूक दिवाना ॥७॥
॥ माया ॥
हम से जनि लागै तू माया ।
थोरे सें फिर बहुत होयगी, सुनि पैहैं रघुराया ॥१॥
(१) गिराया । (२) डरा ।
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