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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 332 में से

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पृष्ठ 103

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १०७
बौद्ध धर्म की विचार धारा से संत संप्रदाय का संबंध निरूपित हो जाने पर
यह देख लेना उचित होगा कि वैदिक साहित्य की परंपरा में वैष्णव धर्म का प्रभाव
संत काव्य पर कितनी मात्रा में अथवा किस रूप में पड़ा ।
विक्रम की चौदहवी और पन्द्रहवी शताब्दी में रामानंद का प्रभाव उत्तरी भारत
में व्यापक रूप से पड़ा । भक्ति का स्रोत जो दक्षिण में फूट पड़ा और उत्तर तक
प्रवाहित हुआ उसने समस्त उत्तरी भारत को आप्लावित कर धर्म के क्षेत्र में भक्ति की
ओर आकर्षित किया ।१ यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि भक्ति का जन-व्यापी प्रभाव
दक्षिण के अलवार संतों से ही ईसा की छठवीं शताब्दी में आरंभ हो चुका था । इनके
गीत बहुत ही लोकप्रिय हुए । सर्व साधारण जनता के लिए भी वेद-विहित याज्ञिक
अनुष्ठान की अपेक्षा भक्ति का यह रागात्मक रूप अधिक आकर्षक था ।
निर्गुण संप्रदाय के रूप निर्धारण में प्रेरक तत्व
निर्गुण संत मत के सिद्धांतों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि
इस पर भिन्न-भिन्न संप्रदायों और आचार्यों की छाप पड़ी हुई है । संतों ने इन संप्रदायों
की मुख्य-मुख्य तथा उपयोगी बातों को ग्रहण किया । संत मत पर निम्नलिखित
सम्प्रदायों का प्रभाव पड़ा है ।
अद्वैतवाद
संत साहित्य के पीछे जो दार्शनिक प्रेरणा रही है उसके संबंध में विद्वानों ने
प्रायः वेदांत और उपनिषदों में प्रतिपादित निर्गुण ब्रह्मवादी विचार धारा की ओर
संकेत किया है । संत साधक और उनके अग्रणी कबीर को लोगों ने यही समझा है कि
वे जीव, आत्मा, ब्रह्म और प्रकृति संबंधी अपनी मान्यताओं को स्थिर करने में मुख्य
रूप से प्राचीन हिन्दी ग्रन्थों और विशेष रूप से निर्गुण ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाले
ग्रन्थों और महात्माओं से अनुप्राणित हुए थे । प्राचीन वैदिक और उपनिषद् काल की
परंपरा तो निर्गुण ब्रह्म के प्रतिपादन के साथ ही अद्वैतवाद का प्रतिपादन समझा जाता
है । शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन संबंधी कुछ विशेष वचन जिन्हें महावाक्य२ कहा जाता
१. भक्ति द्राविड़ी ऊपजी लाये रामानंद ।
परगट कियो कबीर सप्त द्वीप नव खंड ॥
२. प्रज्ञान ब्रह्म । (ऐ० उपनिषद्)
तत्वमसि । (छांदोग्य उपनिषद् ६।८।७)
अहं ब्रह्मास्मि । (बृहदारण्यक उपनिषद् १।४।१०)
अयमात्मा ब्रह्म । (छांदोग्य उपनिषद् २)