सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 90, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६३
नामदेव का आंतरिक रूप
संत नामदेव एक सीधे-सादे, निष्कपट तथा परम भावुक भक्त थे। वे स्वभाव से
बहुत ही ऋजु थे। वे भ्रमणशील, बहुश्रुत तथा वाक्पटु थे।
(१) भावुकता : संत ज्ञानेश्वर ने स्थान-स्थान पर नामदेव के परम भावुक
होने का वर्णन किया है—
'तुम्हारा अंतःकरण भगवद्भक्ति में आर्द्र है।'१
'तुम पंढरीनाथ के प्रेम भाडारी अर्थात् खजांची हो।'२
'नामदेव तो साक्षात् प्रेम मूर्ति है।'३
नामदेव का मन अतीव संवेदनशील है। ज्ञानेश्वर के समाधिग्रहण के करुण
प्रसंग का वर्णन करते हुए उनका गला रुँध जाता है। वे कहते हैं—'चील आकाश में
उड़ गई और घोसले में आग लग जाने के कारण उसके बच्चे झुलस गये।'४
(२) ऋजुता : ऋजुता नामदेव की उल्लेखनीय विशेषता है। उनकी वृत्ति सरल,
निरागस तथा नम्र है। ज्ञानेश्वर को वे अपना परिचय इन शब्दों में देते हैं—'मैं दीन
तथा मूढ़ मति हूँ। मैं संतों के चरणों का दास हूँ।'५
ज्ञानेश्वर के साथ यात्रा पर जाने में अपनी विवशता बताते हुए वे कहते हैं—
'पंढरपुर के चौक का रंक होकर मैं महाद्वार की रक्षा करूँगा।'६
(३) ग्रंथाध्ययन : नामदेव ज्ञानेश्वर की भाँति व्युत्पन्न नहीं है। उन्होंने अध्यात्म
विषयक ग्रन्थों का विधिवत् अध्ययन भी नहीं किया था। उन्होंने सविनय कहा है—
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१. प्रेमाचा जिव्हाला तुझ्या हृदयो आला।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२२।
२. पंढरीरायाचा तूं प्रेम भाडारी।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२५।
३. हरिदासामाजी होसी तूं आगला। प्रेमाचा पुतला नामदेव।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १२३६।
४. नामा म्हणे देवा घार गेली उठोन। बाले दानादान पडियेली
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १०६७।
५. तरी मी एक दीन मूढ मतिहीन। चरणाचा रज रेणू संतांचिया।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६३१।
६. रंक होऊनिया पंढरी चौहटा। राखेन दारवंटा महाद्वारी।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६१५।