सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६५
एक ही ईश्वर घट घट और चराचर में समान रूप से व्याप्त है ।"¹
"उस सनेही राम के मिलते ही पारस के स्पर्श के समान सब कुछ कंचन हो
जाता है । फिर तो 'ठाकुर' व 'जन' तथा 'जन' व 'ठाकुर' एक हो जाते हैं । स्वयं
देव स्वयं मन्दिर व स्वयं पूजन बनकर जल व तरंग की भाँति एक आकार धारण कर
लेते हैं और उनकी भिन्नता केवल नाम मात्र की रह जाती है ।"²
'प्रत्येक जीव में भगवान् है । भगवान् के बिना अन्य कौन उसे प्रेरित कर
सकता है ? हाथी और चींटी एक ही मिट्टी के बने हैं । जड़ चेतन सब में भगवान्
समाया हुआ है । मुझे केवल उसी की चिंता करनी चाहिए । जीवन के निष्काम होने
पर भक्त और भगवान् में कोई अन्तर नही रह जाता । दोनो अद्वैत हो जाते हैं ।'³
इनकी भावुकता इन पदों में इतनी मात्रा में बढ़ी हुई दीख पड़ती है कि ये
अपने एक ही उद्गार को स्पष्ट करते समय अनेक उदाहरण देते भी नहीं अघाते ।
उदार व्यक्तित्व
प्रायः देखा जाता है कि भिन्न-भिन्न धार्मिक संप्रदायों में धार्मिक विचारों तथा
१. सभु गोविंदु है सभु गोविंदु है, गोविंद बिनु नहि कोई ।
जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जलतें भिन्न न कोई ॥
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला विचरत आन न होई ।
कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै बिचारी ।
घट घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥
— सं० ना० हि० प० पद १५० ।
२. बदहु किन होड माधऊ मोसिऊ
ठाकुरु ते जनु जन ते ठाकुरु खेलु परिउ है तोसिऊ ॥
आपन देउ देहुरा आपन आप लगावै पूजा
आपहि गावै आपहि नाचै आप बजावै तूरा
कहत नामदेऊ तू मेरे ठाकुर जनु ऊरा तू पूरा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६१ ।
३. सभे घट रामु बोले रामा बोले ।
एकल माटो कुंजर चींटी भाजन हैं बहु नाना रे ।
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि घटि रामु समाना रे ॥१॥
एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे ।
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुर को दासा रे ॥२॥