सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 91, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ें'मैं बहुश्रुत नही हूँ तथा ज्ञानशील भी नही हूँ।'१ फिर भी वे चिंतनशील थे।
(४) वाक् चातुर्य : निम्नलिखित प्रसंगो से उनका संभाषण कौशल्य प्रतीत
होता है—
(१) 'तीर्थावली' का ज्ञानेश्वर-नामदेव संवाद
(२) परसा-नामदेव संवाद
(३) नामदेव-गोणाई संवाद
अपनी शांत प्रवृत्ति तथा वाक् चातुर्य से नामदेव ने सर्वसाधारण के अंतःकरण
जीत लिए थे।
(५) भ्रमणशीलता :—नामदेव भ्रमणशील थे। 'नामदेव की यात्राएं' नामक
उप-शीर्षक के अन्तर्गत उनकी भ्रमणशीलता पर विचार किया गया है। नामदेव भागवत
धर्म के प्रभावशाली प्रचारक थे। उनमें एक प्रकार का (Missionary Spirit) था।
जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने पंजाब की यात्रा की।
हिन्दी रचनाओं के आधार पर नामदेव का व्यक्तित्व
हिन्दी रचनाओं के आधार पर नामदेव एक भावुक भक्त नही रहते। वे एक
विचारशील संत ज्ञात होते हैं। विसोबा खेचर से नगुण-निराकार का उपदेश पाकर
नामदेव में महान् परिवर्तन हुआ।
ब्रह्म की सर्व व्यापकता (सर्व खलु इदं ब्रह्म)
जो नामदेव पंढरपुर के विट्ठल और विट्ठल मंदिर को एक क्षण के लिए भी
छोड़ने को तैयार नही थे वे अब कहने लगे :—
'मंदिर मे देवता नही होता अतः मैं उसको फूल न चढ़ाऊँगा।'२
मै जिधर भी देखता हूँ उधर वही एक सर्वव्यापक और सर्वपूरक ईश्वर
दिखाई देता है। सारा विश्व गोविंद-मय है। तरंग, फेन और बुदबुदा जैसे जल से
भिन्न नही है वैसे ही यह प्रपंच (संसार) ब्रह्म की लीला है और उससे अभिन्न है।
नामदेव कहते हैं—रे मानव ! ईश्वर की सृष्टि को अपने हृदय में विचार कर देख।
१. नव्हे बहुश्रुत नव्हे ज्ञानशील।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२४।
२. पाति तोड़ि न पूजूं देवा। देवलि देव न होई।
नामा कहै मै हरि की सरना। पुनरपि जन्म न होई॥
—स० ना० हि० प० पद ६५।