सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८६
देखते थे । इन तीनों भाइयो पर नामदेव की अपार श्रद्धा को देखकर ही संभवतः जना-
बाई ने सोपानदेव को नामदेव की गुरु कहा होगा ।
नामदेव की यात्राएँ
एक भक्त के नाते नामदेव की कीर्ति दूर तक फैली हुई थी । उनकी कीर्ति सुन-
कर आलंदी के संत ज्ञानेश्वर उनके पास गये और यात्रा पर चलने का उनसे अनुरोध
किया । नामदेव पंढरपुर नहो छोड़ना चाहते थे परन्तु संत ज्ञानेश्वर के सहवास का
लाभ उठाने के लिए वे उनके साथ जाने के लिए तैयार हुए । उन्होंने उनके साथ उत्तर
भारत के तीर्थ स्थानों की यात्रा की । यह उनकी पहली यात्रा थी । 'तीर्थावली' के
अभंगों में नामदेव ने अपनी इस यात्रा का बड़ा ही हृदयग्राही वर्णन किया है ।
श्री देवीसिंह चौहान १ के अनुसार नामदेव की यह प्रथम यात्रा शके १२१६ के
आसपास हुई हो । उन्होंने अपने 'ज्ञानोबाची काशी यात्रा शके १२१६' शीर्षक लेख में
बताया है कि काशी के दशाश्वमेध घाट पर ज्ञानेश्वर मठ है । उसमें काले पाषाण के
चबूतरे पर सात फुट की ऊँचाई का एक स्तंभ है जो ज्ञानेश्वर की काशी यात्रा की
स्मृति में खड़ा किया गया है । इस स्तंभ पर संवत् १३५१ और उसके चार पाँच इंच
नीचे 'ज्ञानोबा' ऐसे अक्षर कँधे हुए हैं । संवत् १३५१ के समानांतर शके १२१६ आता
है । ज्ञानेश्वर के साथ नामदेव जब काशी-यात्रा पर गये थे तब वे यही ठहरे थे ।
'तीर्थावली' के अभङ्ग नामदेव-कृत होने में डॉ० शं० दा० पेंडसे को
संदेह है ।२
यात्रा से लौटने पर संत ज्ञानेश्वर ने शके १२१८ (ई० स० १२९६) में आलंदी
में समाधि ले ली । अपने गुरु-तुल्य परम मित्र के वियोग का नामदेव को अपार दुःख
हुआ । उनका मन अब पढरपुर से उचट गया । वे अकेले ही पंढरपुर से निकले और
सीधे पंजाब पहुँचे । यह उनकी दूसरी यात्रा थी । यदि वे किसी प्रसिद्ध तीर्थस्थान में
रहते तो उनको आशंका थी कि तीर्थ-यात्रा के लिए आये हुए महाराष्ट्रीय संत जन
उनको घर चलने के लिए कहेगे । अतः उन्होंने उनको पूर्णतया अज्ञात घुमान जैसा दूरस्थ
स्थान पसंद किया । यही पर वे अपने जीवन के अंत तक रहे और यही रहते हुए
उन्होंने अपने हिन्दी पदों की रचना की ।
उत्तर के विद्वानों का विचार है कि यद्यपि नामदेव का वास्तव्य प्रमुख रूप से
पंजाब में हुआ फिर भी उन्होंने दूर-दूर की यात्राएँ की—
१. इतिहास आणि संस्कृति ( त्रैमासिक जनवरी १९६६ )
२. ज्ञानदेव आणि नामदेव : डॉ० शं० दा० पेंडसे पृ० ३३५