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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 332 में से

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पृष्ठ 102

१०६ नामदेव की हिन्दी कविता
नैतिक जीवन को लेकर साधनात्मक प्रयोगों का बोलबाला था। साधक को अपनी
शुद्धता के लिए गुरु गोरखनाथ का अलौकिक व्यक्तित्व एक देवत्व का पर्याय मात्र रह
गया था।
गुरु गोरख का नाथ संप्रदाय जन भाषा में अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन कर
चुका था किंतु उसकी भाषा में दो बातों की कमी थी। पहली यह कि वह भाषा केवल
सिद्धांत-सम्मत थी, उसमें काव्यात्मकता का अभाव था और दूसरी यह कि नाथ
संप्रदाय एक सीमित संप्रदाय होने के कारण अपनी भाषा को व्यापक नहीं बना सका
था। इस प्रकार निर्गुण संप्रदाय की प्रतिष्ठा करते हुए जन-जीवन की स्वाभाविक
अनुभूतियों में सामान्य भाषा के माध्यम से संत काव्य हिन्दी के भक्ति काव्य का एक
महत्त्वपूर्ण अंग बन सका।¹
यहाँ संक्षेप में उन परिस्थितियों तथा प्रेरणाओं पर विचार कर लेना आवश्यक
है जिनका निर्गुण संप्रदाय का रूप निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
निर्गुण संप्रदाय का दृष्टिकोण उस बौद्ध धर्म के दृष्टिकोण से मिलता जुलता है,
जो शताब्दियों तक वैदिक धर्म से संघर्ष करता रहा। बौद्ध धर्म से महायान
का विकास हुआ, महायान से मंत्रयान और मंत्रयान से वज्रयान का, जो तांत्रिक
बौद्ध धर्म में परिणत हुआ। इसी वज्रयान की प्रतिक्रिया में नाथ संप्रदाय का विकास
हुआ और नाथ संप्रदाय के प्रेरणा-मूलक तत्वों को ग्रहण कर संत संप्रदाय अवतरित
हुआ। इस प्रकार बौद्धों के शून्यवाद से लेकर नाथ संप्रदाय की अवधूत भावना तक
संत काव्य में सभी विचार सरणियां पोषित होती रही।
बौद्ध धर्म से प्रेरित इस विचार धारा के विकास के कारण ही यह संभव हो
सका कि संत काव्य समस्त वैदिक परंपरा के कर्मकांडों का विरोध कर सका जो काला-
न्तर में वैष्णव धर्म में भक्ति के साधन थे। इसीलिए अवतार, मूर्ति, तीर्थ, व्रत, माला
आदि निर्गुण संप्रदाय के संतों को ग्राह्य नहीं हो सके जो कर्मकाण्ड के प्रतीक बने
हुए थे।
दूसरी ओर शून्य, काया-तीर्थ, सहज समाधि और योग जिसके अंतर्गत इड़ा,
पिंगला तथा सुषुम्ना नाड़ियां, षट् चक्र, सहस्र दल कमल, चंद्र और सूर्य तथा जीवन की
स्वाभाविक और अंतःकरण-जनित श्रद्धा और रागात्मिका वृत्ति की प्रधानता संत काव्य
में हो सकी। अतः यह स्पष्ट है कि संत काव्य अपने मौलिक विचारों की कोटि में
बौद्ध धर्म की परंपरा के अंतर्गत है तथा उसका सम्बन्ध बौद्ध धर्म के परवर्ती सम्प्रदायों
से होता हुआ प्रत्यक्ष रीति से नाथ संप्रदाय से है।
१. हिन्दी साहित्य (द्वितीय खण्ड) पृ० १८८।
—'संत काव्य' शीर्षक डॉ० रामकुमार वर्मा का लेख।