सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० नामदेव की हिन्दी कविता
(१) 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' (गुरुमुखी लिपि में) यह प्रति गुरुद्वारा प्रबन्धक
कमेटी अमृतसर द्वारा प्रकाशित हुई है। इसमें नामदेव के कुल ६१ पद है। इसमें आये
हुए पदो का पाठ अन्य प्राप्त हस्तलिखित प्रतियो से बहुत ही भिन्न है।
(२) 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' (नागरी लिपि में) यह प्रति सर्व हिन्द सिक्ख मिशन
अमृतसर द्वारा प्रकाशित हुई। यह गुरुमुखी सस्करण का नागरीकरण मात्र है। इसमें
भी नामदेव के ६१ पद हैं।
(३) (Sikh Religion) मेक्स आर्थर मेकालिफ़ द्वारा लिखित इस ग्रन्थ में
सम्पूर्ण ग्रन्थ साहब का अंग्रेजी अनुवाद है। इसके छठे भाग मे 'गुरु ग्रन्थ साहब' के ६१
पदो का भी अनुवाद है। यद्यपि मूल पद नही दिये गये है पर अनुवाद से पदा का परि-
चय मिल जाता है।
(४) 'पजाबातील नामदेव' डाक्टर पुरुषोत्तम जोशी।
श्री जोशी ने इस पुस्तक में 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' के ६१ पदो का मूल सहित
मराठी में अनुवाद दिया है। पदो का क्रम और पाठ 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' जैसा ही है।
(५) 'हिंदी को मराठी संतो की देन' आचार्य विनयमोहन शर्मा।
इस शोध प्रबन्ध में हिन्दी मे रचना करने वाले सभी मराठी संतो की रचनाओं के साथ
नामदेव के ६६ पदों का संग्रह है। इनमें से ६१ पद तो 'गुरु ग्रन्थ साहब' के ही है
तथा ८ और है।
(६) 'शिखांच्या आदि ग्रन्थांतील नामदेव'
लेखक अ० का० प्रियोलकर
इस पुस्तिका में 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' के ६१ पदों का मूल सहित श्री मेकालिफ
द्वारा किया हुआ अंग्रेजी अनुवाद तथा उनका मराठी भाषांतर दिया गया है।
इनके अतिरिक्त श्री वियोगी हरि द्वारा संकलित 'सत सुधा सार' में वेलवेडियर
प्रेस द्वारा प्रकाशित 'सत बानी सग्रह' भाग २ में तथा आचार्य परशुराम चतुर्वेदी द्वारा
सगृहीत 'सत काव्य सग्रह' में भी नामदेव के पद मिलते है।
इन पदों के अतिरिक्त 'श्री गुरु ग्रन्थ साहब' में नामदेव के नाम से निम्नलिखित
तीन साखियाँ मिलती है—
(१) नामा माइआ, कहे त्रिलोचन मीत।
काहे छोपहु छाइलह, राम न लावहु चीत ॥ २१२ ॥
(२) नामा कहे त्रिलोचना मुख ते रामु सम्हालि ।
हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि ॥ २१३ ॥
(३) ढूँढत डोलई अंध गति अरु चोन्दत नाही सूझ ।
कहो नामा कयो पाइअह बिनु भगतहु भगवंत ॥ २१४ ॥