सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ नामदेव की हिन्दी कविता
है स्पष्ट रूप से अद्वैतवाद और निर्गुण ब्रह्म के पर्याय को स्वीकार करते हैं। उपनिषदों
और वेदांत में स्पष्ट रूप से ब्रह्म की व्याख्या करते हुए उन लक्षणों का वर्णन किया
गया है जिन्हें हम निर्गुण ब्रह्म में मानते हैं।
संत कवियों ने शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित मायावाद, विवर्तवाद अथवा शुद्ध
ज्ञान वाद को नहीं ग्रहण किया वरन् उपनिषदों के स्वस्थ, यथार्थवादी और लोकरंजक
चिंतन को ग्रहण किया और प्रचारित किया जिसमें हृदय और बुद्धि, ज्ञान और कर्म का
समन्वय किया गया था।¹
इस्लाम या सूफी मत
सूफी संतों का आगमन तो ग्यारहवीं शताब्दी के आस पास से शुरू हो गया
था किंतु हिंदी साहित्य में सूफी मत का प्रतिपादन व्यापक रूप से संत साहित्य में ही
देखने को मिलता है। संतों पर सूफी मत का अधिक प्रभाव पड़ने का एक महत्वपूर्ण
कारण यह भी था कि इसमें बहुत से मुसलमान भी थे और यह स्वाभाविक ही है कि
उनका संपर्क और झुकाव सूफी मत की ओर अधिक हुआ हो। कबीर, दादू, बुल्लेशाह
यारी साहब आदि अनेक मुसलमानों ने संत परंपरा को ग्रहण किया और सूफी धर्म की
'प्रेम की पीर' से अपनी कविता को रस सिक्त और कोमल बनाया। संत साहित्य में
भाव पक्ष की जो कुछ भी सुन्दरता दीख पड़ती है उसका बहुत कुछ कारण सूफी संतों
का दर्द और प्रेम की मधुर और करुण व्यंजना है।
मुसलमान संतों के अतिरिक्त भी जो दूसरे संत थे, वे बहुधा जाति और परम्परा-
गत भाव के कारण धार्मिक और सांप्रदायिक रूढ़ियों से युक्त थे। उन पर भी सूफी धर्म
का रंग गहरा चढ़ा। मलूकदास भी इस प्रेम के रङ्ग में डूबे हुए कहते हैं कि वे गुलाम के
समान उस प्रियतम के दर्शन की लालसा में दरबार में खड़े हैं।²
संत साहित्य पर सूफी मत का प्रभाव तीन रूपों में देखने को मिलता है। प्रायः
सभी कवियों ने प्रेम की महत्ता पर बहुत विस्तार और उत्साह से प्रकाश डाला है।
उन्होंने बतलाया है कि प्रेम जप तप, तीर्थ और साधना सभी से बड़ा है। दूसरा रूप
१ इंडियन फिलासफी भाग २ डॉ० राधाकृष्णन, पृ० २२४-२५।
२ तेरा मैं दीदार दिवाना
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूँ तुम साहिब रहमाना।
हुआ अलमस्त खबर नहि तन की पिया प्रेम पियासा
ठाड़ होऊँ तो गिर गिर पड़ता तेरे रंग भरवासा॥
—मलूकदास की बानी (बेलवेडियर प्रेस) पृ० ७।