सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ नामदेव की हिन्दी कविता
सिद्धांतो के विषय में उदारता कम होती है। नामदेव इस नियम के अपवाद थे।
उन्होंने जब देख लिया कि सगुण-भक्ति बहुत उपयोगी नही है तो उन्होंने उसका त्याग
किया और निर्गुणोपासना में लगे।
'गंतव्य स्थान पर पहुँचने पर उन्होंने सीढ़ी का त्याग किया।'१
इस प्रकार के परिवर्तन से पता चलता है कि वे दुराग्रही अथवा पूर्वाग्रही नहीं
थे बल्कि एक विचारशील भक्त थे। प्रामाणिक और तर्कसंगत बात को स्वीकार करने
में उनको कोई हिचक नहीं थी। वे कट्टर नहीं बल्कि उदार मना थे। उनको जहाँ से
जो अच्छी चीजें मिलीं उनको उन्होंने ग्रहण किया। कबीर के शब्दों में—
साधू ऐसा चाहिये जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय ॥
वे सच्चे साधु थे उन्होंने सार को ग्रहण किया और थोथे को उड़ा दिया।
संत परम्परा में नामदेव का कार्य महान् है। संत मत की स्थापना उनके द्वारा
हुई। उनके द्वारा लगाई इस बेलि को कबीर ने सींचा, विकसित और पुष्ट किया। संत
पीपा ने निर्गुण पंथ तथा संत मत के सम्बन्ध में नामदेव और कबीर दोनों का महत्त्व
समझा। वे कहते हैं—
जे कलि नाम कबीर न होते ।
तो लोक, वेद अरु कलि जुग मिलि करि भगति रसातल देते ॥
हमसे पतित कहाँ क्या कहते कौन प्रतीति मन धरते ।
नाना वरन देखि सुनि सबनी बहुमारग अनुसरते ॥
सगुणी भगति रहित भगवंता बिरला कोई पावै ।
सोइ कृपा करि देहु कृपानिधि नाम कबीरा गावै ॥
अपनी भगति काज हरि आपै, निज जन आप पठाया ।
नाम कबीरा साँच प्रकास्या, तहाँ पीपै कछु पाया ॥
पीपा का उपर्युक्त कथन सचमुच बड़े महत्त्व का है। नामदेव और कबीर ही ऐसे
भक्त हुए जिन्होंने सत्य को प्रकाशित किया। निर्गुण भक्ति के लिए नामदेव और कबीर
का ही नाम लिया जाता है। चूँकि नामदेव कबीर के पूर्व हुए थे इसलिए उनका महत्त्व
कबीर से भी अधिक है।
१. पाया महल तब तजो निसरनी ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ५६।