सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव के समाधि स्थानों के बारे में अपना मंतव्य देते हुए डॉ० भगीरथ मिश्र
कहते हैं—
'उक्त स्थानों और घटनाओं में से किसी एक को भी सत्य मानने के लिए
ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। पर यह बात ठीक लगती है कि उन्होंने समाधि घुमान में
ली होगी । इसके लिए पहली बात यह है कि महाराष्ट्र में संत नामदेव के अंतिम काल
का विवरण नहीं प्राप्त होता । दूसरी बात यह है कि जब नामदेव अपने जीवन के अंतिम
दिनों में लगभग बीस वर्ष तक घुमान में रहे तो समाधि लेने के लिए पंढरपुर में आये
हो यह बात संगत नहीं लगती। अधिक संभव है कि नामदेव ने घुमान में ही समाधि
ली हो । उनका कोई शिष्य अस्थि या फूल लेकर पंढरपुर आया होगा और नामदेव की
भक्ति के अनुसार विट्ठल मंदिर के महाद्वार पर रख दिया होगा। उस स्थान पर बाद में
समाधि बनाई गई ।'¹
ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में डॉ० मिश्र का निष्कर्ष समीचीन जान
पड़ता है ।
नामदेव का व्यक्तित्व
किसी कवि अथवा लेखक का साहित्यिक व्यक्तित्व उसके लौकिक व्यक्तित्व के
जितना ही सत्य तथा महत्त्वपूर्ण होता है । नामदेव की मराठी तथा हिन्दी रचनाओं से
उनके इन दो व्यक्तित्वों का परिचय मिलता है । आत्मनिवेदनपरक शैली में लिखे उनके
अभंगों में उनके आचरण तथा व्यवहार का बड़ा ही मनोज्ञ चित्र अंकित हुआ है ।
नामदेव का बाह्य रूप
नामदेव की देहयष्टि, उनकी शक्ल-सूरत, उनकी पोशाक आदि के संबंध में
विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं होती । परंपरा से प्राप्त होने वाले उनके चित्र में
उनको घुटनों तक धोती, माथे पर पगड़ी, एक हाथ में वीणा तथा दूसरे में करताल
लेकर विट्ठल के सामने कीर्तन करते हुए चित्रित किया गया है—
जनाबाई ने नामदेव के बाह्य रूप का वर्णन इस प्रकार किया है—
'रस्सी की करधनी और चीथड़ों की लंगोटी पहने नामदेव चंद्रभागा के रेतीले
मैदान पर कीर्तन करते हैं ।'²
१. संत नामदेव की हिंदी पदावली, पृ० ३६ ।
२. सुंभाचा करदोरा रखटाची लंगोटी ।
नामा वालवंटी । कथा करी ॥ १ ॥
—नामदेवाचा गाथा पृ० ५६७, अभङ्ग २८१।