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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 332 में से

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निर्गुण संत काव्य-आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य
मध्ययुगीन धर्म साधना के क्रमिक विकास को देखते हुए यह तथ्य सहज ही
स्पष्ट हो जाता है कि उसकी अभिव्यक्ति पर उसके पूर्व प्रचलित अनेक विचार धाराओं
के प्रभाव हैं। साथ ही एक लोक सामान्य विद्रोही प्रवृत्ति के फल स्वरूप उस युग में
अनेक मौलिक उद्भावनाएँ भी हुई हैं । हिन्दी का निर्गुण संत काव्य इसका सबसे पुष्ट
प्रमाण है । डॉ० रामकुमार वर्मा का कथन है कि संत काव्य ने प्राचीन परंपराओं की
स्थूल रूप-रेखा ग्रहण कर उसमे जीवन-गत पवित्रता के आधार पर विश्व धर्म की
स्वाभाविक प्रेरणा का रंग भरा है ।१ यदि ऐसा कहा जाय कि संत काव्य ने जन
भाषा का आश्रय लेकर परवर्ती राम और कृष्ण की भक्ति के लिए काव्य का क्षेत्र
प्रशस्त किया तो कोई अतिशयोक्ति न होगी ।
डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का मत है कि जहाँ तक उनकी उपासना-पद्धति,
विषय, भाव, भाषा, अलंकार, छंद, पद आदि का संबंध है ये संत सौ फीसदी भारतीय
परंपरा में पड़ते हैं । उनके पारिभाषिक शब्द, उनकी रूढ़ि विरोधिता, उनकी खण्डनात्मक
वृत्ति और उनकी अवखड़ता आदि उनके पूर्ववर्ती साधकों की देन है । परन्तु उनमें
आत्मा उनकी अपनी है । उसमें भक्ति का रस है और वेदांत का ज्ञान है ।२
निर्गुण संत काव्य आध्यात्मिक प्रेरणा का काव्य है इसलिए उसमें अपने इस
मूल भाव के साथ ही लोक समन्वय और स्वदेशी-विदेशी के भेदभ व की प्रतिक्रिया अन्य
क्षेत्रों की तुलना में कम है । यद्यपि यह मुसलमानी प्रतिक्रिया नहीं है तथापि मानवता
के स्तर पर सूफियों की प्रेम पद्धति और एकेश्वर वाद की लोक सामान्य झलक उसमें
भी है किन्तु यह उसका मूल स्वर नहीं बन सका ।
वैष्णव मत के लोकव्यापी विस्तार से जिस समय संपूर्ण देश अभिभूत होकर
भगवान् की भक्ति में अपने आप को तिरोहित कर रहा था उस समय उत्तर भारत में
१. हिंदी साहित्य (द्वितीय खंड) 'संत काव्य', पृ० १८८ ।
२. हिंदी साहित्य की भूमिका ।
—डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ४२ ।