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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 332 में से

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पृष्ठ 85

८८ नामदेव की हिन्दी कविता
इस घटना ने नामदेव के जीवन में महान् परिवर्तन उपस्थित किया। उनको
दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। वे अब कहने लगे—'पाषाण की मूर्ति अपने भक्तों के साथ
वार्तालाप करती है, ऐसा कहने वाले तथा सुनने वाले दोनों मूर्ख हैं।' १
गुरु कृपा से नामदेव निर्गुणोपासक हो गये। जो नामदेव विठ्ठल की मूर्ति के
सामने नाचते गाते थकते न थे वे अब कहने लगे—'मे मंदिर की मूर्ति को फूल न
चढ़ाऊँगा क्योकि मंदिर में देवता नही है। परमात्मा की शरण में जाने से आवागौन के
फेर से मेरी मुक्ति हुई।' २
'मैं पत्तो तोड़कर मंदिर की मूर्ति की पूजा न करूँगा। वह पत्ते-पत्ते में है। वह
सर्वव्यापी है।' ३
इस अंतःसाक्ष्य के आधार पर प्रमाणित होता है कि नामदेव के दीक्षा-गुरु
विसोबा खेचर थे। इसमें संदेह नही।
कुछ विद्वान् संत ज्ञानेश्वर को नामदेव का गुरु मानते हैं क्योकि नामदेव ने उनका
नाम बड़ी श्रद्धा से लिया है परन्तु ज्ञानेश्वर उनके दीक्षा-गुरु नही थे। यह निश्चित है
कि ज्ञानेश्वर के सहवास के कारण नामदेव में बड़ा भारी परिवर्तन हुआ। स्वयं नामदेव
ने कहा है—'सत्संग से मुझमें आमूल परिवर्तन हुआ।' ४
नामदेव की समकालीन कवयित्री संत जनाबाई ने सोपानदेव को नामदेव का
गुरु का नाम बताया है। ५
सोपानदेव नामदेव के गुरु थे यह जनाबाई की श्रद्धा की वाणी है, उसमें तथ्य नही
है। नामदेव, ज्ञानेश्वर, निवृत्तिनाथ तथा सोपानदेव आदि को बड़े आदर की दृष्टि से
१. पाषाणचा देव बोलत भक्तांते सांगते ऐकते मूर्ख दोघे ॥
—पांच संत कवी, पृ० १४८।
२. पाती तोड़ि न पूजूं देवा। देवलि देव न होई॥
नामा कहै मैं हरि की सरना। मुनरपि जन्म न होई ॥१॥
सं० ना० हिं० प० पद ३५।
३. पाती तोड़ि न पाहन पूजौ। देवल देव न ध्याऊँगा।
पांति पांति परसोतम राता। ताकूँ मै न सताऊँगा ॥
सं० ना० हिं० प० पद ६६।
४. संत संगे माझी पालट झाली।
नामदेवाचा गाथा अभङ्ग ४५७, पृ० ३६६।
५. नामयाचा गुरु। तोहा सोपान सद्गुरु ॥
—श्री नामदेवाचा गाथा अ० २७५, पृ० ५६६