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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ७६
मिश्र¹ तथा मेकलिफ² भी यही मत रखते हैं।
(२) सोलापुर जिले की बार्शी के पास :—ऐसा भी एक मत प्रस्तुत किया
जाता है कि नरसी ब्राह्मणी सोलापुर जिले की बार्शी के पास है। गाथा में बार्शी का
उल्लेख दो बार आया है—
(१) बारसी भगवन्त तेरसी तिळया । विट्ठलु सोयरीया पांडुरंगा ॥
अभंग १७५३।
यह अभंग विष्णुदास नामा का है संत नामदेव का नही ।
(२) द्वादशीच्या गावी जाहला उपदेश । देवावीण ओस स्थल नाही ।
अभंग १३६१
इस अभंग से इतना ही पता चलता है कि बिसोबा खेचर ने नामदेव को बार्सी
के भगवंत के मंदिर मे उपदेश किया।
परन्तु सोलापुर जिले में नरसी अथवा नरसी ब्राह्मणी अथवा नरसी बामणी
नाम का गांव आज भी नही है और पहले होने का प्रमाण उपलब्ध नही होता ।
(३) मराठवाडा के परभणी जिले में :—कुछ वर्ष पहले तक अर्थात् सं०
१९२६ ई० तक नरसी ब्राह्मणी को जिला सातारा में माना जाता था। पर १९२६ में
पूना के भारत इतिहास संशोधक मंडल की त्रैमासिक पत्रिका मे श्री० केशवराव कोरटकर
का एक लेख छपा जिसमें बताया गया कि नरसी ब्राह्मणी गांव मराठवाडा के परभणी
जिले में है। तब से लगभग सभी विद्वान् परभणी जिले की नरसी ब्राह्मणी को नामदेव
का जन्मस्थान मानने लगे है। श्री पांगारकर, डॉ० शं० गो० तुलपुले, न्यायमूर्ति
केशवराव कोरटकर, डॉ० हे० वि० इनामदार आदि इसी मत के समर्थक है।
श्री पांगारकर के अनुसार 'नरसी बामणी मोगलाई में परभणी जिले मे है।'³
डॉ० शं० गो० तुलपुले भी इस विषय में श्री पांगारकर से सहमत है—'उनका
(नामदेव का) पिता दामा शेट शिंपी मूलतः परभणी प्रांत के नरसी बामणी गाँव का
रहने वाला था।'⁴
१. 'बम्बई अहाते के सातारा जिलान्तर्गत नरसी बमनी ग्राम में नामदेव का जन्म
हुआ।'
—संत नामदेव और हिन्दी पद साहित्य, पृ० ६० ।
2. 'Namdev was the son of Damasheti, a tailor who resided at
Narsi Bamani, a village near Karad'.
—Sikh Religion Vol. VI, p. 17.
३. मराठी वाङ्मयाचा इतिहास (खंड पहला) पृ० ५५५ ।
४. पाँच संत कवी, पृ० १३७ ।

८० नामदेव की हिन्दी कविता
न्यायमूर्ति केशवराव कोरटकर के अनुसार 'नरसी पुरानी हैदराबाद रियासत के
(आज के महाराष्ट्र राज्य के) परभणी जिले के हिंगोली तालुके में है। ब्राह्मणी नाम का
गाँव वहाँ नहीं है। अलबत्ता बामणी नामक एक गाँव है जो नरसी से दस कोस पर है।
यह भी इसी परभणी जिले में है। ये दोनों गाँव परस्पर कैसे संबद्ध हुए यह कहा नहीं
जा सकता। औंढ्या नागनाथ का मंदिर नरसी से पाँच कोस पर है। नामदेव-चरित्र में
ऐसा उल्लेख पाया जाता है कि नामदेव प्रतिदिन नागनाथ के दर्शन के लिए जाया करते
थे। नामदेव का नागनाथ के दर्शन के लिए प्रतिदिन नरसी से औंढ्या जाना सम्भव है
परन्तु नरसी को यदि हम बार्शी के पास मानें तो नामदेव का नित्य नागनाथ के दर्शन
के लिए जाना युक्ति-संगत नहीं लगता क्योंकि बार्शी से औंढ्या नागनाथ ४० कोस अथवा
उससे भी अधिक दूरी पर है। मेरा अपना गाँव कसबा कोरट है जो औंढा से तीन कोस
पर है। मेरे गाँव ही में नहीं तो हमारे इलाके में सभी इसी नरसी को नामदेव की नरसी
समझते हैं।'¹
डॉ० हे० वि० इनामदार² श्री० केशवराव कोरटकर के मत का समर्थन कर
नरसी को मराठवाड़ा के परभणी जिले में ही मानते हैं। वे निम्नलिखित तर्क उपस्थित
कर नरसी को वराड के पास मानने वालों के मत का खण्डन करते हैं--
(१) दामा शेट का विट्ठल का उपासक होने का गाथा में³ उल्लेख है परन्तु
उनके नरसिंह के भक्त होने का कहीं निर्देश नहीं पाया जाता। प्रस्तुत अभंग प्रक्षिप्त है।
उसी में नामदेव की डकैती का भी उल्लेख है।
(२) नरसिंह का मंदिर नरसिंगपूर में है और केशवराज की मूर्ति तांबवे में है।
(३) श्री पाटसकर के अनुसार नरसिंगपूर के पास नदी तट पर जो समाधि है
वह सिद्धेश्वर महाराज के बड़े बेटे की है। वह समाधि नामदेव के पूर्वजों की नहीं है।
नरसी का मराठवाड़े में होने का एक और प्रमाण
महाराष्ट्र शासन के प्रकाशन विभाग ने 'महाराष्ट्र के जिले · परभणी' नामक एक
पुस्तक बम्बई से प्रकाशित की है। इसमें औंढ्या नागनाथ, नरसी और बामणी इन तीन
गाँवों का स्वतन्त्र रीति से उल्लेख किया गया है।
१. 'नामदेवाची नरसी', पृ० १२०-१२१ ।
—भारत इतिहास संशोधक मंडल, त्रैमासिक पत्रिका, वर्ष ७ वाँ, अंक १-४ ।
२. संत नामदेव डॉ० हे० वि० इनामदार, पृ० ३० ।
३. नरसी ब्राह्मणीचा दामा शेट शिपी ।
केशीराज रूपी मग्न असे ।
—आवटे प्रत, अभंग १२४५ ।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८१
इन तथ्यों के परीक्षण पर डॉ० इनामदार इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि 'कराड
के निकट का, कृष्णातट पर का आज का बड़े नरसिंहपूर अथवा कोले नरसिंहपूर ही
नामदेव की नरसी ब्राह्मणी है, यह मत स्वीकार नही किया जा सकता ।'१ वे स्पष्ट
शब्दों में अपना निर्णय घोषित करते हैं कि परभणी जिले की नरसी बामणी ही नामदेव
की नरसी है ।
डॉ० आनन्द प्रकाश दीक्षित के अनुसार नरसी के मराठवाड़ा के परभणी जिले
में होने के पक्ष में डॉ० इनामदार ने जो तर्क दिये हैं वे समाधानकारक नही हैं । वे
लिखते है—'डॉ० इनामदार के परभणी के पक्ष में दिये तर्क उतने सार्थक प्रतीत नहीं
होते । डॉ० इनामदार, बचपन में ५-७ वर्ष की आयु तक तो नामदेव को पंढरपुर में ही
मानते हैं और जिस अभङ्ग का सहारा लेकर परभणी के पक्ष का समर्थन करते है उसे
स्वयं अन्यत्र प्रक्षिप्त और अप्रामाणिक कह चुके हैं ।'··· न वे इस बात पर प्रकाश डालते
है कि बालपन की वह कौन-सी अवस्था थी जिसमें नामदेव पंढरपुर छोड़कर औंढ्या के
नागनाथ में अनुरक्त हो गये और नित्य पांच कोश उनका दर्शन करने जाने लगे । साथ
ही इस अप्रामाणिक अभङ्ग की प्रारम्भिक पंक्ति 'नरसी ब्राह्मणीचा दामा शेट शिंपी ।
केशवराज रूपी माग असे ।' को अन्यत्र अस्वीकार करते हुए भी वे औंढ्या और केशव-
राज मंदिरो की स्थिति का परभणी के पक्ष में समर्थन करने लगते है । वस्तुतः उनके
कथन आत्मविरोधी हैं ।'२
डॉ० दीक्षित का विचार है कि औंढ्या नागनाथ और विसोबा खेचर सम्बन्धी
सारा कथानक नामदेव के बालपन का नही उनकी बड़ी आयु का है । केवल इसी आधार
पर वे नरसी बमनी को परभणी के अन्तर्गत मानने के लिए तैयार नहीं है ।
डॉ० इनामदार ने नरसी में नामदेव की समाधि होने का जो तर्क उपस्थित
किया है उसके सम्बन्ध में भी डॉ० आनन्दप्रकाश का मत दृष्टव्य है—'रहा यह कि वहाँ
नामदेव की समाधि भी है तो उसके सम्बन्ध में हमारा निवेदन है कि यों तो कराड के
पास की नरसी बमनी में उनके पूर्वज की समाधि भी है और इससे उनका मूलस्थान
वह अधिक सिद्ध हो सकता है । दूसरे, समाधिस्थान अनिवार्यतः किसी का जन्मस्थान या
या मूलस्थान नही होता । विशेषतः सन्तो की समाधि तो लोग कही भी बना लेते हैं ।
सन्त जन्मे कही और हो और मृत्यु का वरण कही और का हो । हो सकता है इसी

१. संत नामदेव. डॉ० ह० वि० इनामदार, पृ० २७ ।
२. नामदेव का कृतित्व : डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित, पृ० ११२ ।
'राष्ट्रवाणी' का संत नामदेव विशेषांक, अक्तूबर, १९७० ।
६

, then ०. That MUST be 1970! A magazine issue in "October 1970" (अक्तूबर १९७०)! And footnote 2: सन् १९५२(1952)! And line 27:(९) गोडाई! That digit IS ९! In this particular typeface, ९has that specific shape! It is the digit ९! So: Line 27 is(९) गोडाई : विठा की पत्नीLine 30 is—'राष्ट्रवाणी' का संत नामदेव विशेषांक, अक्तूबर १९७० ।Line 31 is२. श्री नामदेव चरित्र (पुनर्मुद्रण) सन् १९५२, पृ० २७ ।Wait, let's look at६in line 24 vs९in line 27: In line 24:(६) नारा- wait, how is ६ drawn? Look at line 24:(६)- it has a curl at the top-left, going down and looping at the bottom. Now look at९` in line 27, line 30, line 31:
Wait, they are identical glyphs! Why would 1970 and 1952 be written with that?
Because the typesetter's font has that glyph for ९, or the typesetter literally used the ६

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएं ८३
(११) येसाई : गोदा की पत्नी
(१२) महादा : नामदेव का चौथा बेटा
(१३) साखराई : महादा की पत्नी
(१४) लिंबाई : नामदेव की बेटी
(१५) जनाबाई : नामदेव के घर की दासी ।
जन्म
नामदेव के जन्म के सम्बन्ध में बहुत सी अलौकिक कथाएं महाराष्ट्र तथा उत्तर
भारत में प्रचलित हैं । महाराष्ट्रीय संतों के चरित्र-लेखक महीपति के अनुसार नामदेव
की उत्पत्ति सीप से हुई ।¹
प्रियादास के अनुसार नामदेव एक विधवा के गर्भ से उत्पन्न हुए ।²
नामदेव की गाथा का एक प्रसिद्ध अभङ्ग भी सत्य का विपर्यास करने वाला है ।
'परमात्मा ने शुक्ति (सीप) रूपी कमल दिया और कहा कि नौवां मास प्रारम्भ होने पर
वह विकसित होगा ।'³
क्या नामदेव अयोनिज थे ?
महीपति ने नामदेव को जो अयोनिज बताया है वह केवल उनकी महत्ता बढ़ाने
के लिए । प्रियादास का कथन तो आज के वैज्ञानिक युग में अवैज्ञानिक-सा लगता है ।
यह भी भक्त और भगवान् की महिमा दिखाने के लिए कहा गया है ।
वास्तव में नामदेव अयोनि-संभव नहीं थे । स्वाभाविक रीति से ही अपनी माता
के उदर से उनका जन्म हुआ । स्वयं वे कहते हैं—
'मेरी माता ने मुझे जन्म दिया ।'⁴
छीपे के घर मेरा जन्म हुआ ।'५
१. भक्त विजय (निर्णयसागर प्रति, १९५०) अध्याय चौथा ।
२. भक्तमाल (सटीक) : प्रियादास प्रणीत, पृ० ३२५ ।
३. देवाने दिधले शुक्ति का कमल । म्हणे उकनेल नववे मासी ॥ अ० १२४५ ।
४. प्रसवली माता मज मलमूत्री ।
—गाथा पंचक, अ० १२५४ ।
५. छीपे के घर जनमु दैला ।
—पंजाबातील नामदेव, पृ० ८६ ।

८४ नामदेव की हिन्दी कविता
गोणाई कहती है कि 'नव मास तक मैने गर्भ का बोझ ढोया ।'१
जाति तथा व्यवसाय
प्राचीन वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत हर एक व्यक्ति का व्यवसाय उसकी जाति पर
ही निर्भर होता था। अतः नामदेव अपना पैतृक व्यवसाय अर्थात् 'शिंपी काम' (दर्जी
का पेशा) करते थे। उनके जाति तथा व्यवसाय से 'शिंपी' (दर्जी) होने का उल्लेख
उनके गाथा के अभंगों मे पाया जाता है—
'दर्जी के कुल मे मेरा जन्म हुआ ।'२
गोणाई को आपत्ति है कि 'नामदेव अपने पैतृक व्यवसाय की ओर ध्यान
नही देता ।'३
'मेरा मन गज है और जिह्वा कैंची। दोनो की सहायता से मैं यम का बन्धन
काटता हूँ। मैं कपड़ा रंगने और सिलने का काम करता हूँ ।'४
बाल्य काल
नामदेव के बाल्यकाल के संबंध में कई चमत्कारपूर्ण तथा असाधारण आख्यायिकाएं
प्रचलित हैं। जनार्दन रामचंद्र५ उन्हें उद्धव का अवतार मानते हैं। गार्सा द तासी६
उनको विष्णु का तथा नरहरि मालू७ सनत्कुमार का अवतार मानते हैं। एक अलौकिक
घटना नामदेव के चरित्र के साथ जुड़ी हुई है। वह यह कि आठ वर्ष की आयु में
१. नव मास वरी म्या वाहिलासी ऊदरी ।
—गाथा पंचक, अ० १२६५ ।
२. शिंपियाचे कुली जन्म मज झाला ।
—अ० १२४३ ।
३. शिवण्या टिपण्या त्वां घातले पाणी ।
न पहासी परतोनि घराकडे ॥
—सकल संत गाथा, अ० १२६६ ।
४. मन मेरो गजु जिह्वा मेरी काती ।
मपि मपि काटऊ जम की फाँसी ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पृ० १८ ।
५. कवि चरित्र, पृ० १५२ ।
६. हिंदुई साहित्य का इतिहास, पृ० १३१ ।
७. भक्त कथामृत (मराठी) नरहरि मालू

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८५
उन्होंने अपने हाथ से विट्ठल को दूध पिलाया था और नैवेद्य भी खिलाया था। उनका
मन गृहस्थी में बिलकुल नहीं लगता था।
क्या बाल भक्त नामदेव डाकू थे ?
नामदेव की सांप्रदायिक गाथा में कई अभंग प्रक्षिप्त हैं। इनमें से छप्पन चरणो
के एक अभंग 'नरसी ब्राह्मणीचा दामा शेट शिंपी'१ के कारण नामदेव के विषय में
गलत-फहमी फैली हुई है।
इस अभंग को हम ती भागों में विभाजित कर सकते हैं—
(१) जन्म और बाल्य काल चरण १ से १६।
(२) युवावस्था चरण १७ से ३०।
दुर्भाग्य से नामदेव कुसंगति में पड़ गये और डकैती करने लगे।२
(३) उपरति चरण ३१ से ५६।
नामदेव को अपनी करतूत पर ग्लानि हुई और वे पंढरपुर चले गये।
नामदेव के जीवन की उपर्युक्त घटना के विषय में नामदेव-साहित्य के अध्येता
अपने मत इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं—
श्री भावे यथा श्री आजगांवकर के अनुसार यह अभंग प्रामाणिक है। श्री
भावे ने नामदेव की डकैती को पुष्टि देने वाले नामदेव की पत्नी राजाई के नाम से
प्रसिद्ध दो अभङ्ग उद्धृत किये है।३ श्री आजगांवकर ने नामदेव के डाकू बनने की
घटना का सविस्तार वर्णन किया है।४
डॉ० रानडे ने नामदेव के डाकू होने के बारे में संदेह प्रदर्शित किया है।५
श्री पाटस्कर के अनुसार छप्पन चरणों का यह अभङ्ग रचने वाला कोई अन्य
चरित्रकार है, नामदेव नही।६
श्री रं० कृ० भालुंकर७ तथा डॉ० शं० गो० तुलपुले८ के अनुसार यह अभङ्ग


१. नरसी ब्राह्मणीचा दामा शेट शिंपी।
केशिराज रूपी मग्न असे। अ० १२४५
२. प्राक्तनाचे योगे भरलासे ओहटा। पाडितसे वाटा चौरा संगे। —वही
३. महाराष्ट्र सारस्वत (पुरवणी सह) शके १८७६, पृ० १६५-१६८।
४. श्री नामदेव महाराज आणि त्यांचे समकालीन संत, पृ० २१-२४।
५. संत वचनामृत (प्रस्तावना) पृ० १६।
६. बाल भक्त नामदेव दरोडेखोर होते काय ? पृ० २०।
७. श्री नामदेव चरित्र (पुनर्मुद्रण) प्रस्तावना, पृ० ५७।
८. पाँच संत कवी (१९६२ का संस्करण) पृ० १३६।

८६ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव महाराज का नही है ।
मेकालिफ ने इस घटना का अनुमोदन किया है ।१
छप्पन चरणो के प्रस्तुत अभङ्ग में प्रामाणिक अंश कितना और प्रक्षिप्त
कितना इस विषय मे प्रा० वा० ब० पटवर्धन को संदेह है । उनका सूचित करना है
कि किसी ने चार पाँच अभङ्ग एकत्रित कर उसका कर्तृत्व नामदेव के नाम पर थपा
दिया ।२
गुरु
नामदेव ने किसको अपना गुरु माना था इस विषय में पर्याप्त मतभेद हैं । अपनी
आत्मकथा में नामदेव ने अपने पारमार्थिक जीवन की तीन घटनाओ का सविस्तार
वर्णन किया है—
(१) नामदेव की विट्ठल भक्ति का परिवार के लोगो द्वारा विरोध
(२) संत ज्ञानेश्वर से उनकी पहली भेंट
(३) विसोबा खेचर से प्राप्त गुरु उपदेश
ज्ञानेश्वर से नामदेव की पहली भेंट शके १२१३ के आस पास हुई हो । तब
नामदेव पढरपुर के पांडुरंग के सगुणोपासक भक्त थे । उनकी भक्ति अंध थी । इस भेंट
के अवसर पर संत गोरोबा ने मुक्ताबाई के कहने पर नामदेव की परीक्षा ली और
कहा कि 'निगुरा' होने के कारण यह घट कच्चा है ।
उपर्युक्त घटना का नामदेव के हृदय पर बड़ा आघात हुआ । पंढरपुर पहुँच कर
उन्होने विट्ठल के सामने अपनी आंतरिक व्यथा व्यक्त की । विट्ठल ने कहा—'तुम गुरु
की शरण में जाओ 'तुम्हारा भवपाश टूट जायगा ।'३
नामदेव गुरु की खोज में निकले और औंढ़ा नागनाथ पहुँचे । उन्होंने देखा कि
खेचर मंदिर के शिवलिंग पर पैर रखकर लेटे हैं । नामदेव जिधर उनके पैर उठाकर
१. दि सिख रिलीजन (छठा भाग) पृ० २० ।
2 'It is difficult to say how much of the abnormally long abhang
extending over fifty six lines is genuine history and how much
later addition'
-Prof .W. B Patwardhan's article in Fergusson College
Magazine Vol III, No 4 Jan 1913.
३. जाई नाम्या जाई गुरुसी शरण । तुटे भव बंधन तुझे वेगी ॥
—अभङ्ग १३६७ ।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८७
रखते उधर शिवलिंग घूम जाता। नामदेव विसोबा खेचर के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए
और उन्होंने खेचरजी को गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया।१
खेचरजी ने नामदेव को ब्रह्म के लिए विवेक एवं संसार से विरक्ति का भाव
धारण करने को कहा।२
'खेचर ने नामदेव के सिर पर हाथ रखा और कान में 'तत्वमसि' महावाक्य
का उपदेश दिया, जिससे नामदेव को विदेहावस्था प्राप्त हुई। देखिये भाव-विभोर होकर
खेचर ने नामदेव को कैसा अद्भुत उपदेश दिया।'३
नामदेव ने खेचरजी के प्रति अपनी कृतज्ञता इन शब्दों में व्यक्त की—'सद्गुरु
ने मुझ पर कृपा की और आत्म-स्वरूप मुझे दिखाया। उन्होंने उसकी प्राप्ति का साधन
भी मुझे दिया। उन्होंने मेरा ज्ञान-चक्षु खोल दिया। उनकी कृपा से मुझे ईश्वर प्राप्ति
का मार्ग मिला। मैं उनसे उऋण नहीं हो सकता। अब मैं उनके चरण न छोड़ूँगा।'४
'गुरु ने अपने उपदेशों से मेरा जन्म सफल कर दिया। मेरा दुःख नष्ट हो
गया और मैं अपने अन्तर्तम में ब्रह्म-सुख की अनुभूति कर उठा हूँ। गुरु की कृपा से
ब्रह्म-ज्ञान रूपी अंजन प्राप्त हो गया है।'५
१. खेचर भूचर तुलसी माला गुर परसादी पाइआ।
—गुरु ग्रन्थ साहब, खालसा प्रति, पद ३१।
२. विवेक वैराग्य शोधूनिया पाहे। जेणे तुज होय ब्रह्म प्राप्ति।
—अभङ्ग १३७४।
३. श्रवणी सांगितली मात। मस्तकी ठेवियेला हात।
पदपिंड विवर्जित केला नामा ॥१॥
—नामदेवाचा गाथा, पृ० ३१३, अभङ्ग १३८।
४. सद्गुरु नायकें पूर्ण कृपा केली। निज वस्तु दाविली माझी मज।
माझें सुख मज दाखविले डोळा। दिधली प्रेम कळा नाम मुद्रा ॥
डोलियाचा डोळा उघडिला जेणे। लेवविले लेणें आनंदाचे।
नामा म्हणे निकी सापडली सोय। न बिसंवे पाय खेचराचे ॥१॥
—सकल संत गाथा, अभंग १३६०।
५. सफल जनमु मोकउ गुर कीना।
दुख बिसारी सुख अंतरि लीना ॥ १ ॥
गिआन अंजनु मोकउ गुरि दीना।
राम नाम बिनु जीवनु मन हीना ॥ २ : ।
—संत ना० हिं० प० पद २०४।

८८ नामदेव की हिन्दी कविता
इस घटना ने नामदेव के जीवन में महान् परिवर्तन उपस्थित किया। उनको
दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। वे अब कहने लगे—'पाषाण की मूर्ति अपने भक्तों के साथ
वार्तालाप करती है, ऐसा कहने वाले तथा सुनने वाले दोनों मूर्ख हैं।' १
गुरु कृपा से नामदेव निर्गुणोपासक हो गये। जो नामदेव विठ्ठल की मूर्ति के
सामने नाचते गाते थकते न थे वे अब कहने लगे—'मे मंदिर की मूर्ति को फूल न
चढ़ाऊँगा क्योकि मंदिर में देवता नही है। परमात्मा की शरण में जाने से आवागौन के
फेर से मेरी मुक्ति हुई।' २
'मैं पत्तो तोड़कर मंदिर की मूर्ति की पूजा न करूँगा। वह पत्ते-पत्ते में है। वह
सर्वव्यापी है।' ३
इस अंतःसाक्ष्य के आधार पर प्रमाणित होता है कि नामदेव के दीक्षा-गुरु
विसोबा खेचर थे। इसमें संदेह नही।
कुछ विद्वान् संत ज्ञानेश्वर को नामदेव का गुरु मानते हैं क्योकि नामदेव ने उनका
नाम बड़ी श्रद्धा से लिया है परन्तु ज्ञानेश्वर उनके दीक्षा-गुरु नही थे। यह निश्चित है
कि ज्ञानेश्वर के सहवास के कारण नामदेव में बड़ा भारी परिवर्तन हुआ। स्वयं नामदेव
ने कहा है—'सत्संग से मुझमें आमूल परिवर्तन हुआ।' ४
नामदेव की समकालीन कवयित्री संत जनाबाई ने सोपानदेव को नामदेव का
गुरु का नाम बताया है। ५
सोपानदेव नामदेव के गुरु थे यह जनाबाई की श्रद्धा की वाणी है, उसमें तथ्य नही
है। नामदेव, ज्ञानेश्वर, निवृत्तिनाथ तथा सोपानदेव आदि को बड़े आदर की दृष्टि से
१. पाषाणचा देव बोलत भक्तांते सांगते ऐकते मूर्ख दोघे ॥
—पांच संत कवी, पृ० १४८।
२. पाती तोड़ि न पूजूं देवा। देवलि देव न होई॥
नामा कहै मैं हरि की सरना। मुनरपि जन्म न होई ॥१॥
सं० ना० हिं० प० पद ३५।
३. पाती तोड़ि न पाहन पूजौ। देवल देव न ध्याऊँगा।
पांति पांति परसोतम राता। ताकूँ मै न सताऊँगा ॥
सं० ना० हिं० प० पद ६६।
४. संत संगे माझी पालट झाली।
नामदेवाचा गाथा अभङ्ग ४५७, पृ० ३६६।
५. नामयाचा गुरु। तोहा सोपान सद्गुरु ॥
—श्री नामदेवाचा गाथा अ० २७५, पृ० ५६६

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८६
देखते थे । इन तीनों भाइयो पर नामदेव की अपार श्रद्धा को देखकर ही संभवतः जना-
बाई ने सोपानदेव को नामदेव की गुरु कहा होगा ।
नामदेव की यात्राएँ
एक भक्त के नाते नामदेव की कीर्ति दूर तक फैली हुई थी । उनकी कीर्ति सुन-
कर आलंदी के संत ज्ञानेश्वर उनके पास गये और यात्रा पर चलने का उनसे अनुरोध
किया । नामदेव पंढरपुर नहो छोड़ना चाहते थे परन्तु संत ज्ञानेश्वर के सहवास का
लाभ उठाने के लिए वे उनके साथ जाने के लिए तैयार हुए । उन्होंने उनके साथ उत्तर
भारत के तीर्थ स्थानों की यात्रा की । यह उनकी पहली यात्रा थी । 'तीर्थावली' के
अभंगों में नामदेव ने अपनी इस यात्रा का बड़ा ही हृदयग्राही वर्णन किया है ।
श्री देवीसिंह चौहान १ के अनुसार नामदेव की यह प्रथम यात्रा शके १२१६ के
आसपास हुई हो । उन्होंने अपने 'ज्ञानोबाची काशी यात्रा शके १२१६' शीर्षक लेख में
बताया है कि काशी के दशाश्वमेध घाट पर ज्ञानेश्वर मठ है । उसमें काले पाषाण के
चबूतरे पर सात फुट की ऊँचाई का एक स्तंभ है जो ज्ञानेश्वर की काशी यात्रा की
स्मृति में खड़ा किया गया है । इस स्तंभ पर संवत् १३५१ और उसके चार पाँच इंच
नीचे 'ज्ञानोबा' ऐसे अक्षर कँधे हुए हैं । संवत् १३५१ के समानांतर शके १२१६ आता
है । ज्ञानेश्वर के साथ नामदेव जब काशी-यात्रा पर गये थे तब वे यही ठहरे थे ।
'तीर्थावली' के अभङ्ग नामदेव-कृत होने में डॉ० शं० दा० पेंडसे को
संदेह है ।२
यात्रा से लौटने पर संत ज्ञानेश्वर ने शके १२१८ (ई० स० १२९६) में आलंदी
में समाधि ले ली । अपने गुरु-तुल्य परम मित्र के वियोग का नामदेव को अपार दुःख
हुआ । उनका मन अब पढरपुर से उचट गया । वे अकेले ही पंढरपुर से निकले और
सीधे पंजाब पहुँचे । यह उनकी दूसरी यात्रा थी । यदि वे किसी प्रसिद्ध तीर्थस्थान में
रहते तो उनको आशंका थी कि तीर्थ-यात्रा के लिए आये हुए महाराष्ट्रीय संत जन
उनको घर चलने के लिए कहेगे । अतः उन्होंने उनको पूर्णतया अज्ञात घुमान जैसा दूरस्थ
स्थान पसंद किया । यही पर वे अपने जीवन के अंत तक रहे और यही रहते हुए
उन्होंने अपने हिन्दी पदों की रचना की ।
उत्तर के विद्वानों का विचार है कि यद्यपि नामदेव का वास्तव्य प्रमुख रूप से
पंजाब में हुआ फिर भी उन्होंने दूर-दूर की यात्राएँ की—
१. इतिहास आणि संस्कृति ( त्रैमासिक जनवरी १९६६ )
२. ज्ञानदेव आणि नामदेव : डॉ० शं० दा० पेंडसे पृ० ३३५

६० नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव भ्रमणशील व्यक्ति थे ।¹
'तुम्हारे दर्शन की उत्कंठा लगी हुई है चित्त एक स्थान पर रहता नही ।'²
नामदेव ने बद्रिकाश्रम की यात्रा भी की थी ।³
"At the age of fifty he (Namdev) became indifferent to the
world He travelled through the four quarters of India."⁴
"He left home and started on his second pilgrimage which
extended to the holy shrines in Northern India and ultimately
to the Punjab which was destined to be his resting place for
ever."⁵
नामदेव की समाधि
सर्व साधारण मनुष्य की तरह उम्र पूरी होने पर स्वाभाविक रीति से नामदेव
की मृत्यु हुई ऐसा किसी ने नही कहा । नामदेव-भक्तों का विश्वास है कि जिस प्रकार
संत ज्ञानेश्वर ने समाधि ली उसी प्रकार नामदेव भी समाधिस्थ हुए ।
पंजाब में नामदेव की समाधि के बारे में एक विचित्र कथा प्रचलित है—
नामदेव अपना भौतिक शरीर घुमान मे छोड़कर सुरत-स्वरूप पंढरपुर चले गये और
वहाँ समाधिस्थ हुए । घुमान के मंदिर में उनके शरीर पर चादर डाल दी गयी थी ।
उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि यह भेद किसी को ज्ञात न हो । तीन दिन के पश्चात्
शिष्यों ने देखा कि वे पहले ही काल-वश हो चुके हैं । उन्होंने उनकी अंत्य क्रिया की
और समाधि भी बनवाई ।⁶
तीन स्थानों पर नामदेव की समाधियाँ बताई जाती है । उनके बारे में विद्वानों
के मत इस प्रकार हैं—
घुमान की समाधि
'घुमान में नामदेव की समाधि का भव्य मंदिर है ।'⁷
१. परिचयी साहित्य : डॉ० त्रिलोकीनारायण दीक्षित पृ० ८६
२. भेटीची आवडी उत्कंठित चित्त । न राहे निवात एके ठायी ।
सकल संत गाथा, अभङ्ग १५३६
3. Selections from Hindi Literature p. 112
—by Lala Sitaram
4 Shri Swami Nemdev : by Bansidhar Shastri p. 124.
5. Shri Swami Namdev : by Bhagat Ram p. 14-16.
६. जनम साखी
७. श्री नामदेव चरित्र (पुनर्मुद्रण) प्रस्तावना रं० कृ० भाळुंकर पृ० १०१ ।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६१
'A Shrine is dedicated to his memory and is still in use at
Dhoman in Gurdaspur district.'¹
'His samadhi (tomb) was built in the same Mandir at Dhoman
by his disciples. The existing temple at Dhoman known as the
Mandir of Shri Swami Namdev is one of the most beautiful
Shrines in the punjab.'²
नरसी की समाधि
नरसी मराठवाड़ा के परभणी जिले में है। गाँव से दो फर्लाङ्ग की दूरी पर
कपाधू नदी के किनारे नामदेव की समाधि है। वहाँ एक छोटा-सा मंदिर भी है।
फाल्गुन वद्य ११ को वहाँ मेला लगता है। स्वयं श्री कोरटकर को अपनी जानकारी
के विश्वसनीय होने में संदेह है।³
पंढरपुर की समाधि
नामदेव के शिष्य परिसा भागवत के एक अभंग४ द्वारा सन् १३५० ई० में
पंढरपुर में ही नामदेव की समाधि लेने की बात पुष्ट होती है।
प्रिन्सिपल दांडेकर के अनुसार नामदेव की समाधि पंढरपुर में महाद्वार के पास
है। उन्होंने आषाढ वद्य १३ शके १२७२ को समाधि ली। नामदेव ने अपने एक अभंग
में अपने आपको सीढ़ी का पत्थर कहा है। इस सीढ़ी के पत्थर को संतों के चरणों का
स्पर्श होने से उनका उद्धार होगा।५ श्री दांडेकर का विचार है कि नामदेव ने सपरि-
वार समाधि ली। उनकी पुत्र वधू लाडाई गर्भवती होने के कारण मायके गई थी। वह
अकेली पीछे रह गई।६

  1. An outline of the Religious Literature of India : by J. N.
    Farquhar p. 299
  2. Shri Swami Namdev : by Bhagat Ram p. 11,
    ३. नामदेवाची नरसी—केशवराव कोरटकर —भ० इ० सं० मंडल त्रैमासिक पत्रिका
    शके १८४८ अंक १-४।
    ४. आषाढ शुक्ल एकादशी। नामा विनवी विठुलासी।
    आज्ञा व्हावी हो मजसी। समाधि विश्रांति जागी॥
    ५. नामा म्हणे आम्ही पायरीचे चिरे। संत पाय हिरे देनी वरी॥
    श्री नामदेवाचा गाथा, पृ० ३८१ अभङ्ग ५३३।
    ६. महाराष्ट्रीय संत : वाङ्मय व जीवन, शं० वा० दांडेकर।

९२ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव के समाधि स्थानों के बारे में अपना मंतव्य देते हुए डॉ० भगीरथ मिश्र
कहते हैं—
'उक्त स्थानों और घटनाओं में से किसी एक को भी सत्य मानने के लिए
ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। पर यह बात ठीक लगती है कि उन्होंने समाधि घुमान में
ली होगी । इसके लिए पहली बात यह है कि महाराष्ट्र में संत नामदेव के अंतिम काल
का विवरण नहीं प्राप्त होता । दूसरी बात यह है कि जब नामदेव अपने जीवन के अंतिम
दिनों में लगभग बीस वर्ष तक घुमान में रहे तो समाधि लेने के लिए पंढरपुर में आये
हो यह बात संगत नहीं लगती। अधिक संभव है कि नामदेव ने घुमान में ही समाधि
ली हो । उनका कोई शिष्य अस्थि या फूल लेकर पंढरपुर आया होगा और नामदेव की
भक्ति के अनुसार विट्ठल मंदिर के महाद्वार पर रख दिया होगा। उस स्थान पर बाद में
समाधि बनाई गई ।'¹
ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में डॉ० मिश्र का निष्कर्ष समीचीन जान
पड़ता है ।
नामदेव का व्यक्तित्व
किसी कवि अथवा लेखक का साहित्यिक व्यक्तित्व उसके लौकिक व्यक्तित्व के
जितना ही सत्य तथा महत्त्वपूर्ण होता है । नामदेव की मराठी तथा हिन्दी रचनाओं से
उनके इन दो व्यक्तित्वों का परिचय मिलता है । आत्मनिवेदनपरक शैली में लिखे उनके
अभंगों में उनके आचरण तथा व्यवहार का बड़ा ही मनोज्ञ चित्र अंकित हुआ है ।
नामदेव का बाह्य रूप
नामदेव की देहयष्टि, उनकी शक्ल-सूरत, उनकी पोशाक आदि के संबंध में
विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं होती । परंपरा से प्राप्त होने वाले उनके चित्र में
उनको घुटनों तक धोती, माथे पर पगड़ी, एक हाथ में वीणा तथा दूसरे में करताल
लेकर विट्ठल के सामने कीर्तन करते हुए चित्रित किया गया है—
जनाबाई ने नामदेव के बाह्य रूप का वर्णन इस प्रकार किया है—
'रस्सी की करधनी और चीथड़ों की लंगोटी पहने नामदेव चंद्रभागा के रेतीले
मैदान पर कीर्तन करते हैं ।'²
१. संत नामदेव की हिंदी पदावली, पृ० ३६ ।
२. सुंभाचा करदोरा रखटाची लंगोटी ।
नामा वालवंटी । कथा करी ॥ १ ॥
—नामदेवाचा गाथा पृ० ५६७, अभङ्ग २८१।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६३
नामदेव का आंतरिक रूप
संत नामदेव एक सीधे-सादे, निष्कपट तथा परम भावुक भक्त थे। वे स्वभाव से
बहुत ही ऋजु थे। वे भ्रमणशील, बहुश्रुत तथा वाक्पटु थे।
(१) भावुकता : संत ज्ञानेश्वर ने स्थान-स्थान पर नामदेव के परम भावुक
होने का वर्णन किया है—
'तुम्हारा अंतःकरण भगवद्भक्ति में आर्द्र है।'१
'तुम पंढरीनाथ के प्रेम भाडारी अर्थात् खजांची हो।'२
'नामदेव तो साक्षात् प्रेम मूर्ति है।'३
नामदेव का मन अतीव संवेदनशील है। ज्ञानेश्वर के समाधिग्रहण के करुण
प्रसंग का वर्णन करते हुए उनका गला रुँध जाता है। वे कहते हैं—'चील आकाश में
उड़ गई और घोसले में आग लग जाने के कारण उसके बच्चे झुलस गये।'४
(२) ऋजुता : ऋजुता नामदेव की उल्लेखनीय विशेषता है। उनकी वृत्ति सरल,
निरागस तथा नम्र है। ज्ञानेश्वर को वे अपना परिचय इन शब्दों में देते हैं—'मैं दीन
तथा मूढ़ मति हूँ। मैं संतों के चरणों का दास हूँ।'५
ज्ञानेश्वर के साथ यात्रा पर जाने में अपनी विवशता बताते हुए वे कहते हैं—
'पंढरपुर के चौक का रंक होकर मैं महाद्वार की रक्षा करूँगा।'६
(३) ग्रंथाध्ययन : नामदेव ज्ञानेश्वर की भाँति व्युत्पन्न नहीं है। उन्होंने अध्यात्म
विषयक ग्रन्थों का विधिवत् अध्ययन भी नहीं किया था। उन्होंने सविनय कहा है—
――――――
१. प्रेमाचा जिव्हाला तुझ्या हृदयो आला।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२२।
२. पंढरीरायाचा तूं प्रेम भाडारी।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२५।
३. हरिदासामाजी होसी तूं आगला। प्रेमाचा पुतला नामदेव।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १२३६।
४. नामा म्हणे देवा घार गेली उठोन। बाले दानादान पडियेली
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १०६७।
५. तरी मी एक दीन मूढ मतिहीन। चरणाचा रज रेणू संतांचिया।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६३१।
६. रंक होऊनिया पंढरी चौहटा। राखेन दारवंटा महाद्वारी।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६१५।

'मैं बहुश्रुत नही हूँ तथा ज्ञानशील भी नही हूँ।'१ फिर भी वे चिंतनशील थे।
(४) वाक् चातुर्य : निम्नलिखित प्रसंगो से उनका संभाषण कौशल्य प्रतीत
होता है—
(१) 'तीर्थावली' का ज्ञानेश्वर-नामदेव संवाद
(२) परसा-नामदेव संवाद
(३) नामदेव-गोणाई संवाद
अपनी शांत प्रवृत्ति तथा वाक् चातुर्य से नामदेव ने सर्वसाधारण के अंतःकरण
जीत लिए थे।
(५) भ्रमणशीलता :—नामदेव भ्रमणशील थे। 'नामदेव की यात्राएं' नामक
उप-शीर्षक के अन्तर्गत उनकी भ्रमणशीलता पर विचार किया गया है। नामदेव भागवत
धर्म के प्रभावशाली प्रचारक थे। उनमें एक प्रकार का (Missionary Spirit) था।
जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने पंजाब की यात्रा की।
हिन्दी रचनाओं के आधार पर नामदेव का व्यक्तित्व
हिन्दी रचनाओं के आधार पर नामदेव एक भावुक भक्त नही रहते। वे एक
विचारशील संत ज्ञात होते हैं। विसोबा खेचर से नगुण-निराकार का उपदेश पाकर
नामदेव में महान् परिवर्तन हुआ।
ब्रह्म की सर्व व्यापकता (सर्व खलु इदं ब्रह्म)
जो नामदेव पंढरपुर के विट्ठल और विट्ठल मंदिर को एक क्षण के लिए भी
छोड़ने को तैयार नही थे वे अब कहने लगे :—
'मंदिर मे देवता नही होता अतः मैं उसको फूल न चढ़ाऊँगा।'२
मै जिधर भी देखता हूँ उधर वही एक सर्वव्यापक और सर्वपूरक ईश्वर
दिखाई देता है। सारा विश्व गोविंद-मय है। तरंग, फेन और बुदबुदा जैसे जल से
भिन्न नही है वैसे ही यह प्रपंच (संसार) ब्रह्म की लीला है और उससे अभिन्न है।
नामदेव कहते हैं—रे मानव ! ईश्वर की सृष्टि को अपने हृदय में विचार कर देख।
१. नव्हे बहुश्रुत नव्हे ज्ञानशील।
—सकल संत गाथा, अभङ्ग ६२४।
२. पाति तोड़ि न पूजूं देवा। देवलि देव न होई।
नामा कहै मै हरि की सरना। पुनरपि जन्म न होई॥
—स० ना० हि० प० पद ६५।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६५
एक ही ईश्वर घट घट और चराचर में समान रूप से व्याप्त है ।"¹
"उस सनेही राम के मिलते ही पारस के स्पर्श के समान सब कुछ कंचन हो
जाता है । फिर तो 'ठाकुर' व 'जन' तथा 'जन' व 'ठाकुर' एक हो जाते हैं । स्वयं
देव स्वयं मन्दिर व स्वयं पूजन बनकर जल व तरंग की भाँति एक आकार धारण कर
लेते हैं और उनकी भिन्नता केवल नाम मात्र की रह जाती है ।"²
'प्रत्येक जीव में भगवान् है । भगवान् के बिना अन्य कौन उसे प्रेरित कर
सकता है ? हाथी और चींटी एक ही मिट्टी के बने हैं । जड़ चेतन सब में भगवान्
समाया हुआ है । मुझे केवल उसी की चिंता करनी चाहिए । जीवन के निष्काम होने
पर भक्त और भगवान् में कोई अन्तर नही रह जाता । दोनो अद्वैत हो जाते हैं ।'³
इनकी भावुकता इन पदों में इतनी मात्रा में बढ़ी हुई दीख पड़ती है कि ये
अपने एक ही उद्गार को स्पष्ट करते समय अनेक उदाहरण देते भी नहीं अघाते ।
उदार व्यक्तित्व
प्रायः देखा जाता है कि भिन्न-भिन्न धार्मिक संप्रदायों में धार्मिक विचारों तथा
१. सभु गोविंदु है सभु गोविंदु है, गोविंद बिनु नहि कोई ।
जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जलतें भिन्न न कोई ॥
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला विचरत आन न होई ।
कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै बिचारी ।
घट घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥
— सं० ना० हि० प० पद १५० ।
२. बदहु किन होड माधऊ मोसिऊ
ठाकुरु ते जनु जन ते ठाकुरु खेलु परिउ है तोसिऊ ॥
आपन देउ देहुरा आपन आप लगावै पूजा
आपहि गावै आपहि नाचै आप बजावै तूरा
कहत नामदेऊ तू मेरे ठाकुर जनु ऊरा तू पूरा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १६१ ।
३. सभे घट रामु बोले रामा बोले ।
एकल माटो कुंजर चींटी भाजन हैं बहु नाना रे ।
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि घटि रामु समाना रे ॥१॥
एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे ।
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुर को दासा रे ॥२॥

६६ नामदेव की हिन्दी कविता
सिद्धांतो के विषय में उदारता कम होती है। नामदेव इस नियम के अपवाद थे।
उन्होंने जब देख लिया कि सगुण-भक्ति बहुत उपयोगी नही है तो उन्होंने उसका त्याग
किया और निर्गुणोपासना में लगे।
'गंतव्य स्थान पर पहुँचने पर उन्होंने सीढ़ी का त्याग किया।'१
इस प्रकार के परिवर्तन से पता चलता है कि वे दुराग्रही अथवा पूर्वाग्रही नहीं
थे बल्कि एक विचारशील भक्त थे। प्रामाणिक और तर्कसंगत बात को स्वीकार करने
में उनको कोई हिचक नहीं थी। वे कट्टर नहीं बल्कि उदार मना थे। उनको जहाँ से
जो अच्छी चीजें मिलीं उनको उन्होंने ग्रहण किया। कबीर के शब्दों में—
साधू ऐसा चाहिये जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय ॥
वे सच्चे साधु थे उन्होंने सार को ग्रहण किया और थोथे को उड़ा दिया।
संत परम्परा में नामदेव का कार्य महान् है। संत मत की स्थापना उनके द्वारा
हुई। उनके द्वारा लगाई इस बेलि को कबीर ने सींचा, विकसित और पुष्ट किया। संत
पीपा ने निर्गुण पंथ तथा संत मत के सम्बन्ध में नामदेव और कबीर दोनों का महत्त्व
समझा। वे कहते हैं—
जे कलि नाम कबीर न होते ।
तो लोक, वेद अरु कलि जुग मिलि करि भगति रसातल देते ॥
हमसे पतित कहाँ क्या कहते कौन प्रतीति मन धरते ।
नाना वरन देखि सुनि सबनी बहुमारग अनुसरते ॥
सगुणी भगति रहित भगवंता बिरला कोई पावै ।
सोइ कृपा करि देहु कृपानिधि नाम कबीरा गावै ॥
अपनी भगति काज हरि आपै, निज जन आप पठाया ।
नाम कबीरा साँच प्रकास्या, तहाँ पीपै कछु पाया ॥
पीपा का उपर्युक्त कथन सचमुच बड़े महत्त्व का है। नामदेव और कबीर ही ऐसे
भक्त हुए जिन्होंने सत्य को प्रकाशित किया। निर्गुण भक्ति के लिए नामदेव और कबीर
का ही नाम लिया जाता है। चूँकि नामदेव कबीर के पूर्व हुए थे इसलिए उनका महत्त्व
कबीर से भी अधिक है।
१. पाया महल तब तजो निसरनी ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ५६।

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६७
रचनाएँ
कहा जाता है कि नामदेव ने शत कोटि अभंग बनाने की प्रतिज्ञा की थी।१
इससे लगता है कि इनकी रचनाएँ बहुत अधिक होगी। इनके 'शत कोटि' का अर्थ प्रचुर
मात्रा मे लेना ही समीचीन है। आज नामदेव के अभंगो के पाँच छपे हुए गाथा उपलब्ध
है जिनमें लगभग ढाई हजार अभंग इनके नाम पर मिलते है परन्तु नामदेव के नाम से
प्रचलित सभी अभंग नामदेव के नही है। छपे हुए गाथाओ में ऐसे भी पद पाये जाते है
• जिनमे कबीर और कमाल का उल्लेख है जो नामदेव के बाद के है। जैसे 'कबीरा धूम
मचाई' आदि।
इन पाँच गाथाओ में जो ढाई हजार के लगभग अभंग मिलते हैं उनमें से छः
सात सौ अभङ्ग ही मूलतः नामदेव के होगे, शेष सभी प्रक्षिप्त हे। डॉ० तुलपुले के अनु-
सार नामदेव की गाथा मे विष्णुदास नामा के अभङ्गो की प्रचुर मात्रा में जो खिचड़ी
हुई है उसमें से नामदेव के अभङ्ग अलग करने की कोई अचूक तरकीब नही है।२ डॉ०
भगीरथ मिश्र भी डॉ० तुलपुले के मत का समर्थन करते है।३
मराठी गाथा की प्रतियाँ
(१) नामदेवाची आणि त्यांच्या कुटुम्बातील व समकालीन साधूंच्या अभंगांची
गाथा : इसके संकलन-कर्ता हैं श्री तुकाराम तात्या पडत। यह गाथा 'तत्त्व विवेचक प्रेस'
बम्बई से सन् १८६० ई० में प्रकाशित हुई। जैसा कि शीर्षक से ही विदित होता है
इसमें नामदेव, उनके परिवार और तत्कालीन अन्य संतों के मराठी अभङ्ग हैं। इसके
पृ० ६४५ से ६७७ तक 'हिन्दुस्तानी भाषेत अभङ्ग' शीर्षक के अन्तर्गत नामदेव के १०६
हिन्दी पद (पद सख्या २३४५ से २४५० तक) है।
(२) 'नामदेवाची गाथा' (आवृत्ति दूसरी) रा० श्री० गोधलेकर जगद्धितेच्छु
छापाखाना, पुणे सन् १८६६.
(३) 'श्री नामदेवाचा गाथा'। इसके संकलन कर्ता ह० भ० प० विष्णु नरसिंह
जोग है। यह गाथा शक १८४७ में पूना के चित्रशाला प्रेस से प्रकाशित हुई। नामदेव
के नाम से प्राप्त होने वाले सभी मराठी पदों का यह अच्छा सग्रह है। इसके चौथे भाग
१. शत कोटी तुझे करीन अभङ्ग। म्हणे पांडुरंग ऐक नाम्या॥
श्री नामदेवाचा गाथा, पृ० ३१७, अभङ्ग १६२।
२. पाँच संत कवी : डॉ० शं० गो० तुलपुले, पृ० १३८-१३६।
३. संत नामदेव की हिंदी पदावली
—डॉ० भगीरथ मिश्र, पृ० ४०।
७

६८ नामदेव की हिन्दी कविता
में पृ० ४१५ से ४७३ तक 'हिंदुस्तानी पदें' शीर्षक के अन्तर्गत १०२ पद हिन्दी के हैं।
(४) 'श्री नामदेव महाराज यांच्या अभंगाची गाथा' (जनाबाई, नारा, गोंदा,
विठा, परिसा भागवत, गोणाई, राजाई, लाडाई, बाळुबाई तथा निंबाई के अभंगों के
साथ) इसका सम्पादन श्री त्र्यंबक हरी आवटे ने किया है और शक १८३० में यह गाथा
इंदिरा प्रकाशन पूना से प्रकाशित हुई है। इस गाथा में नामदेव के मराठी अभंगों के
अतिरिक्त उनके परिवार तथा समकालीन कुछ अन्य संतों के अभंग भी दिये हैं। गाथा
के आठवें भाग में पृ० ६७८ से ७०० तक (पद संख्या २३२५ से २४२६ तक)
'हिंदुस्तानी पदें' शीर्षक में १०२ हिन्दी पद हैं। रागों के नाम इसमें नहीं हैं।
(५) 'श्री नामदेवरायांची सार्थ गाथा'
इसके संकलन कर्ता, टिप्पणीकार और प्रकाशक हैं श्री प्रल्हाद सीताराम सुबन्ध।
इस गाथा में मूल अभंगों के साथ मराठी अर्थ भी है। अब तक इसके छह भाग प्रकाशित
हो चुके हैं। गाथा के पाँचवें भाग में नामदेव के ६१ हिन्दी पद हैं। ये सभी पद 'श्री
गुरु ग्रंथ साहब' के ही हैं।
नामदेव के मराठी अभंगों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है—
(१) बाल क्रीड़ा (२) श्री कृष्ण लीला
(३) पंढरी महात्म्य (४) नाम महात्म्य
(५) संत महिमा (६) कलि काल के प्रभाव का वर्णन
(७) निवृत्तिनाथ, सोपानदेव, ज्ञानदेव तथा मुक्ताबाई आदि के समाधि लेने के
प्रसंग के अभंग।
हिंदी की रचनाएँ
अपने जीवन के उत्तरार्ध में उत्तर भारत की यात्रा करते हुए नामदेव ने हिन्दी
में कुछ पदों की रचना की। वास्तविक बात यह है कि संत नामदेव की रचनाओं का
अभी तक हिन्दी संसार को पता ही नहीं था। ग्रन्थ साहब के ६१ पद ही अभी तक
नामदेव की सम्पूर्ण हिन्दी रचना समझी जाती थी। आचार्य विनयमोहन शर्मा ने अपनी
पुस्तक 'हिन्दी को मराठी संतों की देन' में ११ और पद दिये हैं जो ग्रन्थ साहब से भिन्न
हैं। इसके अतिरिक्त संत नामदेव की गाथा में १०३ हिन्दुस्तानी पद हैं जिनमें कुछ ग्रंथ
साहब के हैं और कुछ और दूसरे। किन्तु नामदेव की हिन्दी रचनाएँ इतनी ही नहीं हैं।
इस संदर्भ में डॉ० राजनारायण मौर्य का मत दृष्टव्य है—"मुझे विभिन्न प्रका-
शित और हस्तलिखित प्रतियों से कुल ३०० पद नामदेव के प्राप्त हुए हैं। हस्तलिखित
प्रतियाँ काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, सेंट्रल पब्लिक लायब्रेरी पटियाला,
बाबा नामदेवजी का गुरुद्वारा घुमान (गुरदासपुर) पंढरपुर, पूना विश्वविद्यालय आदि