सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८७
रखते उधर शिवलिंग घूम जाता। नामदेव विसोबा खेचर के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए
और उन्होंने खेचरजी को गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया।१
खेचरजी ने नामदेव को ब्रह्म के लिए विवेक एवं संसार से विरक्ति का भाव
धारण करने को कहा।२
'खेचर ने नामदेव के सिर पर हाथ रखा और कान में 'तत्वमसि' महावाक्य
का उपदेश दिया, जिससे नामदेव को विदेहावस्था प्राप्त हुई। देखिये भाव-विभोर होकर
खेचर ने नामदेव को कैसा अद्भुत उपदेश दिया।'३
नामदेव ने खेचरजी के प्रति अपनी कृतज्ञता इन शब्दों में व्यक्त की—'सद्गुरु
ने मुझ पर कृपा की और आत्म-स्वरूप मुझे दिखाया। उन्होंने उसकी प्राप्ति का साधन
भी मुझे दिया। उन्होंने मेरा ज्ञान-चक्षु खोल दिया। उनकी कृपा से मुझे ईश्वर प्राप्ति
का मार्ग मिला। मैं उनसे उऋण नहीं हो सकता। अब मैं उनके चरण न छोड़ूँगा।'४
'गुरु ने अपने उपदेशों से मेरा जन्म सफल कर दिया। मेरा दुःख नष्ट हो
गया और मैं अपने अन्तर्तम में ब्रह्म-सुख की अनुभूति कर उठा हूँ। गुरु की कृपा से
ब्रह्म-ज्ञान रूपी अंजन प्राप्त हो गया है।'५
१. खेचर भूचर तुलसी माला गुर परसादी पाइआ।
—गुरु ग्रन्थ साहब, खालसा प्रति, पद ३१।
२. विवेक वैराग्य शोधूनिया पाहे। जेणे तुज होय ब्रह्म प्राप्ति।
—अभङ्ग १३७४।
३. श्रवणी सांगितली मात। मस्तकी ठेवियेला हात।
पदपिंड विवर्जित केला नामा ॥१॥
—नामदेवाचा गाथा, पृ० ३१३, अभङ्ग १३८।
४. सद्गुरु नायकें पूर्ण कृपा केली। निज वस्तु दाविली माझी मज।
माझें सुख मज दाखविले डोळा। दिधली प्रेम कळा नाम मुद्रा ॥
डोलियाचा डोळा उघडिला जेणे। लेवविले लेणें आनंदाचे।
नामा म्हणे निकी सापडली सोय। न बिसंवे पाय खेचराचे ॥१॥
—सकल संत गाथा, अभंग १३६०।
५. सफल जनमु मोकउ गुर कीना।
दुख बिसारी सुख अंतरि लीना ॥ १ ॥
गिआन अंजनु मोकउ गुरि दीना।
राम नाम बिनु जीवनु मन हीना ॥ २ : ।
—संत ना० हिं० प० पद २०४।