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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 332 में से

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पृष्ठ 78

संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ८१
इन तथ्यों के परीक्षण पर डॉ० इनामदार इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि 'कराड
के निकट का, कृष्णातट पर का आज का बड़े नरसिंहपूर अथवा कोले नरसिंहपूर ही
नामदेव की नरसी ब्राह्मणी है, यह मत स्वीकार नही किया जा सकता ।'१ वे स्पष्ट
शब्दों में अपना निर्णय घोषित करते हैं कि परभणी जिले की नरसी बामणी ही नामदेव
की नरसी है ।
डॉ० आनन्द प्रकाश दीक्षित के अनुसार नरसी के मराठवाड़ा के परभणी जिले
में होने के पक्ष में डॉ० इनामदार ने जो तर्क दिये हैं वे समाधानकारक नही हैं । वे
लिखते है—'डॉ० इनामदार के परभणी के पक्ष में दिये तर्क उतने सार्थक प्रतीत नहीं
होते । डॉ० इनामदार, बचपन में ५-७ वर्ष की आयु तक तो नामदेव को पंढरपुर में ही
मानते हैं और जिस अभङ्ग का सहारा लेकर परभणी के पक्ष का समर्थन करते है उसे
स्वयं अन्यत्र प्रक्षिप्त और अप्रामाणिक कह चुके हैं ।'··· न वे इस बात पर प्रकाश डालते
है कि बालपन की वह कौन-सी अवस्था थी जिसमें नामदेव पंढरपुर छोड़कर औंढ्या के
नागनाथ में अनुरक्त हो गये और नित्य पांच कोश उनका दर्शन करने जाने लगे । साथ
ही इस अप्रामाणिक अभङ्ग की प्रारम्भिक पंक्ति 'नरसी ब्राह्मणीचा दामा शेट शिंपी ।
केशवराज रूपी माग असे ।' को अन्यत्र अस्वीकार करते हुए भी वे औंढ्या और केशव-
राज मंदिरो की स्थिति का परभणी के पक्ष में समर्थन करने लगते है । वस्तुतः उनके
कथन आत्मविरोधी हैं ।'२
डॉ० दीक्षित का विचार है कि औंढ्या नागनाथ और विसोबा खेचर सम्बन्धी
सारा कथानक नामदेव के बालपन का नही उनकी बड़ी आयु का है । केवल इसी आधार
पर वे नरसी बमनी को परभणी के अन्तर्गत मानने के लिए तैयार नहीं है ।
डॉ० इनामदार ने नरसी में नामदेव की समाधि होने का जो तर्क उपस्थित
किया है उसके सम्बन्ध में भी डॉ० आनन्दप्रकाश का मत दृष्टव्य है—'रहा यह कि वहाँ
नामदेव की समाधि भी है तो उसके सम्बन्ध में हमारा निवेदन है कि यों तो कराड के
पास की नरसी बमनी में उनके पूर्वज की समाधि भी है और इससे उनका मूलस्थान
वह अधिक सिद्ध हो सकता है । दूसरे, समाधिस्थान अनिवार्यतः किसी का जन्मस्थान या
या मूलस्थान नही होता । विशेषतः सन्तो की समाधि तो लोग कही भी बना लेते हैं ।
सन्त जन्मे कही और हो और मृत्यु का वरण कही और का हो । हो सकता है इसी

१. संत नामदेव. डॉ० ह० वि० इनामदार, पृ० २७ ।
२. नामदेव का कृतित्व : डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित, पृ० ११२ ।
'राष्ट्रवाणी' का संत नामदेव विशेषांक, अक्तूबर, १९७० ।
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