सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ें८६ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव महाराज का नही है ।
मेकालिफ ने इस घटना का अनुमोदन किया है ।१
छप्पन चरणो के प्रस्तुत अभङ्ग में प्रामाणिक अंश कितना और प्रक्षिप्त
कितना इस विषय मे प्रा० वा० ब० पटवर्धन को संदेह है । उनका सूचित करना है
कि किसी ने चार पाँच अभङ्ग एकत्रित कर उसका कर्तृत्व नामदेव के नाम पर थपा
दिया ।२
गुरु
नामदेव ने किसको अपना गुरु माना था इस विषय में पर्याप्त मतभेद हैं । अपनी
आत्मकथा में नामदेव ने अपने पारमार्थिक जीवन की तीन घटनाओ का सविस्तार
वर्णन किया है—
(१) नामदेव की विट्ठल भक्ति का परिवार के लोगो द्वारा विरोध
(२) संत ज्ञानेश्वर से उनकी पहली भेंट
(३) विसोबा खेचर से प्राप्त गुरु उपदेश
ज्ञानेश्वर से नामदेव की पहली भेंट शके १२१३ के आस पास हुई हो । तब
नामदेव पढरपुर के पांडुरंग के सगुणोपासक भक्त थे । उनकी भक्ति अंध थी । इस भेंट
के अवसर पर संत गोरोबा ने मुक्ताबाई के कहने पर नामदेव की परीक्षा ली और
कहा कि 'निगुरा' होने के कारण यह घट कच्चा है ।
उपर्युक्त घटना का नामदेव के हृदय पर बड़ा आघात हुआ । पंढरपुर पहुँच कर
उन्होने विट्ठल के सामने अपनी आंतरिक व्यथा व्यक्त की । विट्ठल ने कहा—'तुम गुरु
की शरण में जाओ 'तुम्हारा भवपाश टूट जायगा ।'३
नामदेव गुरु की खोज में निकले और औंढ़ा नागनाथ पहुँचे । उन्होंने देखा कि
खेचर मंदिर के शिवलिंग पर पैर रखकर लेटे हैं । नामदेव जिधर उनके पैर उठाकर
१. दि सिख रिलीजन (छठा भाग) पृ० २० ।
2 'It is difficult to say how much of the abnormally long abhang
extending over fifty six lines is genuine history and how much
later addition'
-Prof .W. B Patwardhan's article in Fergusson College
Magazine Vol III, No 4 Jan 1913.
३. जाई नाम्या जाई गुरुसी शरण । तुटे भव बंधन तुझे वेगी ॥
—अभङ्ग १३६७ ।