सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६१
गुरु ग्रन्थ साहब के पद महाराष्ट्रीय तथा ज्ञानदेव कालीन नामदेव के ही है। वे
अपने जीवन के उत्तर काल में पंजाब गये और वही लगभग २० वर्ष तक रहे। वास्तव
में बात यह है कि अपने परम मित्र ज्ञानेश्वर के समाधि लेने के पश्चात् पंढरपुर से
उनका मन उचट गया और कुछ दिनो के पश्चात् वे पंजाब की ओर चले गये। वहाँ
गुरदासपुर जिले के धोमान ग्राम में रह कर भजन-कीर्तन करते रहे। उनके समाधि-
स्थान के बारे मे दो मत हैं। पंजाबी परंपरा के अनुसार उन्होंने घोमान में ही समाधि
ली। पर नामदेव के शिष्य परिसा भागवत के एक अभंग¹ के अनुसार सन् १३५० ई०
में पंढरपुर में ही उनके समाधि लेने की बात पुष्ट होती है। आज भी घोमान में बाबा
नामदेवजी का गुरु द्वारा है और उनके अनुयायियों की संख्या भी बहुत बड़ी है।
महाराष्ट्रीय संत नामदेव और गुरु ग्रन्थ के नामदेव एक ही है, इस सम्बन्ध में
निम्नलिखित बातें विचारणीय है। सबसे पहली बात यह है कि नामदेव के जन्म स्थान
और वंश के सम्बन्ध में दोनों परम्पराओ में साम्य है। नामदेव के जीवन सम्बन्धी जो
घटनाएं तथा उनके चमत्कार महाराष्ट्र में प्रचलित है अथवा उनके अभंगो मे मिलते है,
वही घटनाएं और चमत्कार पंजाबी परम्परा मे भी प्रचलित हैं और हिन्दी के पदों में
भी प्राप्त हैं। मृत गाय को जिलाने, विट्ठल को दूध पिलाने, मन्दिर का द्वार फिराने
आदि की घटनाएं दोनों रचनाओ में समान रूप में प्राप्त होती हैं। पंजाबी परंपरा के
अनुसार गुरु ग्रन्थ के नामदेव भिन्न नही बल्कि महाराष्ट्रीय संत नामदेव ही है।²
दूसरी बात यह है कि हिन्दी पदो और मराठी अभंगों मे विट्ठल शब्द के उपयोग
के साथ साथ केशव, माधव, राम, गोविन्द, हरि आदि शब्दों का समान रूप से व्यवहार
हुआ है। हिन्दी के कवियो ने विट्ठल का प्रयोग कही नही किया है। विट्ठल महाराष्ट्र
के देवता है और सन्त नामदेव उन्हो के भक्त थे। इसलिए प्रधान रूप से विट्ठल शब्द
का प्रयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त हिन्दी तथा मराठी पदो का वर्ण्य-विषय एक न होते
हुए भी सामान्य बातें—ईश्वर की सर्वव्यापकता, नाम और गुरु का महिमा वर्णन,
बाह्याडम्बरों की व्यर्थता तथा प्रह्लाद, ध्रुव, अजामिल आदि प्राचीन भक्तो के कथा सन्दर्भ
लगभग एक से ही हैं।
पंजाबी और महाराष्ट्रीय संत नामदेव के एक होने का सबसे बड़ा प्रमाण है
१. आषाढ़ शुक्ल एकादशी । नामा विनवी विठ्ठलासी ।
आज्ञा व्हावी हो मजसी । समाधि विश्रांति लागी ॥
—सकल संत गाथा
२. (अ) हिन्दी को मराठी संतो की देन, पृ० १०६ ।
(ब) भगत नामदेव जी जनम साखी : ज्ञानी करतार सिंह ।
६२ नामदेव की हिन्दी कविता
मराठी के कुछ विशिष्ट शब्दों का प्रयोग । यदि प्रत्यय आदि को हम पुरानी हिन्दी का
ही एक रूप मान लें तो भी हम विशिष्ट मराठी शब्दों को, जो प्राचीन काल में विशिष्ट
अर्थ में ही प्रयुक्त होते थे, या आज होते हैं, किसी भी प्रकार हिन्दी का नहीं मान
सकते । 'गुरु ग्रन्थ साहब' में आई हुई एक पंक्ति है :—
पाप पुंनि जाके डांगिया द्वारे चित्र गुपुत लेखिया ।
धरमराय पोली प्रतिहार ऐसो राजा श्रीगोपाल ॥
( पाप पुण्य जिसके चौकीदार ( डांगिया ) है, द्वार पर चित्रगुप्त लेखक हैं,
धर्मराज जिसकी ड्योढ़ी पर प्रतिहार है, ऐसा राजा वह श्रीगोपाल है । )
'डांगिया' मराठी एक विशिष्ट है, जो विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त होता है । पंढरपुर
के विट्ठल मन्दिर के दरवाजे पर दोनों तरफ जो जय विजय के प्रतिहारी खड़े हैं, उन्हें
'डांगिया' कहा जाता है ।
उसी पद में दूसरी पंक्ति है—
'जाचे घरा दिग दसा सराइवा बैकुंठसो चित्रसारी ।'
( जिस घर में दसो दिशाएँ समाप्त होती हैं और बैकुंठ के समान जिसकी
चित्रशाला है । )
'सराइचा' शब्द मराठी के 'सरणे' क्रिया से बना है, जिसका अर्थ होता है
समाप्त होना ।१ एक और विशिष्ट शब्द देखिए—
'आनिले कसरि सुगडि समसरि, बाल गोविंद हि पोलि रचौं ।'
( सुगड़ भर कर केसर ले आया ताकि बाल गोविन्द को चंदन लगा सकूँ । )
'सुगड़ि' शब्द मराठी के 'सुगड़' शब्द का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है, मिट्टी का
छोटा बर्तन । इस प्रकार ओलपे ओलखे (पहचानना), दीवड़ा (दीपक), सम्बर-सम्भर
( सौ ) आदि शब्द भी हैं । मराठी के इन विशिष्ट शब्दों का प्रयोग यह प्रमाणित
करता है कि गुरु ग्रन्थ साहब के नामदेव और ज्ञानेश्वरकालीन महाराष्ट्रीय नामदेव एक
ही हैं ।
यद्यपि दोनों नामदेवों के एक होने का ऐतिहासिक उल्लेख कही प्राप्त नहीं होता
किन्तु परम्परागत किंवदन्तियाँ भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं । जो बात किसी व्यक्ति के
संबंध में शताब्दियों तक चलती आती है उसमें थोड़ा बहुत सत्य का अंश अवश्य होता
है । नामदेव का महाराष्ट्र से पंजाब में जाना प्रचलित तो है ही किन्तु एक और बात
से इसकी सत्यता नि संदिग्ध बन जाती है । नामदेव के प्रारंभिक जीवन के संबंध में
१. महाराष्ट्र शब्दकोश ( चौथा विभाग ) पृ० १४२१ ।
२. महाराष्ट्र शब्दकोश ( सातवाँ विभाग ) पृ० ३०४२ ।
संत नामदेव की हिन्दी कविता ६३
तत्कालीन संतो और उत्तरकालीन संतो ने भी पर्याप्त मात्रा में लिया है। नामदेव के
बचपन से लेकर ज्ञानेश्वर की समाधि और उसके बाद एक तीर्थयात्रा का उल्लेख तो
मिलता ही है। ज्ञानेश्वर की समाधि (ई० सं० १२६४) के समय नामदेव (जन्म ई०
स० १२७०) २६ वर्ष के थे। उसके बाद वे तीर्थयात्रा के लिए गये। उसके बाद के
जीवन में नामदेव कहाँ रहे, क्या करते रहे, क्या चमत्कार किये आदि किसी भी एक
घटना का उल्लेख मराठी साहित्य और इतिहास में नही मिलता। मराठी का सारा संत
साहित्य भी नामदेव के उत्तरकालीन जीवन के बारे में बिलकुल मौन है। इस बात को
देखकर मुझे ऐसा लगता है कि नामदेव अपने जीवन के उत्तरकाल में महाराष्ट्र के
बाहर रहे। संभवत. इस काल में थे पंजाब में रहे हो। इसीलिए उनके उत्तरकालीन
जीवन का उल्लेख महाराष्ट्र में कही भी नही मिलता।
नामदेव रचित हिन्दी पदों के वर्ण्य विषय की बात अवश्य ही विचारणीय है।
वस्तुतः नामदेव ने जब बिसोबा खेचर से दीक्षा ली तभी उनमे एक प्रकार का परिवर्तन
आ गया जिसका संकेत मराठी अभंगों में १ भी कही-कही मिल जाता है। उसके बाद
उन्हे ईश्वर की सर्वव्यापकता का ज्ञान हुआ और धीरे-धीरे पंढरी के विट्ठल के प्रति उनका
मोह कम होने लगा। ज्ञानेश्वर की समाधि के पश्चात् शक १२५२ के आस पास वे जब
दूसरी बार तीर्थयात्रा के लिए गये थे तब उन्हे ईश्वर के विश्वरूप का ज्ञान हुआ और
वे सभी जगह विट्ठल को देखने लगे ।२ उत्तर भारत में उस समय नाथो और सिद्धो का
बड़ा प्रभाव था जिससे नामदेव बच नही सके। उन्होंने महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक
की साधना और भक्ति देखी थी अतः उनकी अनुभूति में एक परिपक्वता आ गई थी।
हिन्दी पदों में अनुभूति की यही परिपक्वता व्यक्त हुई है। कथन शैली, भाषा, छंद आदि
सब उत्तर भारत की परंपरा का है। उन्होंने तत्कालीन उत्तर भारत की साधना पद्धति
को आधार बनाकर भक्ति का प्रचार किया। इन बातो से स्पष्ट है कि मराठी अभंगो
का रचयिता नामदेव तथा हिन्दी पदों का रचयिता नामदेव दोनो एक ही हैं। अन्तर
१. सतसंगे माझा पालट झाला।
पाहता विठुला रूप तुझें ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १६६८ ।
२. पाषाणाचा देव बोलत भलताते ।
सांगते ऐकते मूर्ख दोघे ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १३६१ ।
ईभे बीठलु ऊभे बीठलु, बीठल बिनु संसारु नही।
थान थनंतरि नामा प्रणवे पूरि रहिउ तू सरब मही ॥
—पंजाबातील नामदेव, पृ० ८३ ।
६४ नामदेव की हिन्दी कविता
केवल इतना ही है कि मराठी अभंग उनके जीवन की किशोरावस्था में रचे गये, जिनमें
भक्ति की विह्वलता और वर्णनात्मकता है। हिन्दी पद जीवन के उत्तरकाल में रचे गये
जिनमें अनुभूति की परिपक्वता है।
जन्म काल
नामदेव का 'अयोनि-संभव होना—डॉ० इनामदार¹ 'भक्तमाल' में वर्णित कथा
तथा विष्णुदास नामाकृत 'आदि' प्रकरण के अभङ्ग में आई हुई पंक्तियों के आधार पर
नामदेव को 'अयोनि-संभव' मानने के पक्ष में नहीं है। इस संबंध में वे स्वर्गीय म० गो०
घारटक्के² के मत के समर्थक हैं तथा सीपी शब्द का अर्थ शुक्तिका मानकर नामदेव को
अयोनिज मानने वालों का खण्डन करते हैं। नामदेव गाथा, जनाबाई तथा विठाके अभंगों
के आधार पर भी उन्होंने नामदेव के नैसर्गिक जन्म की पुष्टि की है। इस प्रवाद के
पीछे अयोनिज व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों से श्रेष्ठ घोषित करने की भावना को भी वे
कोई महत्त्व नहीं देते और ईश्वर-प्राप्ति से पूर्व सभी को अपूर्ण और अशुद्ध मानकर
इसका प्रतिवाद करते हैं। डॉ० भगीरथ मिश्र³ भी महीपति के कथन को केवल महत्ता-
प्रदर्शन के लिए किया गया तथा प्रियादास के कथन को अवैज्ञानिक मानते हैं।
नामदेव-चरित्र के प्राचीन स्रोत-गाथा—
नामदेव का जन्म काल निश्चित करने के लिए आज जो भी साधन उपलब्ध हैं
उनमें नामदेव के अभंगों की गाथा प्रमुख है। इस गाथा का 'नामदेव चरित्र' शीर्षक
प्रकरण नामदेव-विरचित होने में संदेह किया जाता है !⁴
'नामदेव-चरित्र' के निम्नलिखित अभंग के अनुसार नामदेव का जन्म रविवार
कार्तिक शुक्ल एकादशी शक ११९२ (तद्नुसार २६ अक्टूबर सन् १२७० ई०) को
हुआ था—
माझे जन्म पत्र बाबाजी ब्राह्मणे। लिहिले त्याची खूण सांगेन ऐका ॥
अधिक व्याण्णव गणित अकरा शतें। उगवता आदित्य रोहिणीसी ॥
शुक्ल एकादशी कार्तिकी रविवार। प्रभव संवत्सर शालिवाहन शके ॥
आवटे प्रत, अभंग १२५४
१. संत नामदेव : डॉ. हे. वि. इनामदार, पृ० १५।
२. विष्णुदास नामा कृत नामदेवांची 'आदि' 'लोकशिक्षण' (मराठी पत्रिका) मई
१९४०, पृ० ८१५।
३. संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पृ० ३३।
४. श्री नामदेव महाराज आणि त्यांचे समकालीन संत - ज. र. आजगांवकर, पृ० २।
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६५
इस अभंग में आये 'प्रभव' तथा 'प्रमोद' संवत्सरो के पाठ के संबंध मे काफी
ऊहापोह हुआ है । यद्यपि इस अभंग के नामदेव-कृत होने मे शंका की जाती है फिर
भी, यह भी सही है कि नामदेव की जन्म-तिथि निश्चित करने के लिये अन्य कोई
प्रमाण साधन के रूप में प्राप्त नही होता ।
डॉ० हे० वि० इनामदार के अनुसार 'इस अभंग में शालिवाहन शक ११९२ में
'प्रभव' संवत्सर का जो निर्देश किया गया है वह गलत है । उसके स्थान पर 'प्रमोद'
संवत्सर का उल्लेख आवश्यक था ।'१
श्री० शं० पु० जोशी ने शके ११८५ को नामदेव का जन्म शक मान कर एक
जन्म कुंडली दी है । यह कुंडली श्री० प्र० रा० मुंगे द्वारा तैयार की गई है । श्री जोशी
लिखते है—'उपर्युक्त अभंग में शक और संवत्सर का परस्पर मेल नही बैठता । शक
११८५ में 'प्रमोद' संवत्सर आता है । अतः कातिक शुक्ल एकादशी शक ११८५ को
नामदेव का जन्म काल मानकर उनकी कुंडली तैयार की गई है ।'२
अनंतदास कृत 'नामदेव की परिचयी':
'परिचयी' ग्रंथो से संतो के जीवन पर नया प्रकाश पड़ता है । इस दृष्टि से
अनंतदास कृत 'नामदेव की परिचयी' महत्वपूर्ण है । इस परिचयी का रचनाकाल सं०
१६४५ वि० है । बड़े खेद की बात है कि अनंतदास ने जहाँ नामदेव की मननशीलता,
उनका आध्यात्मिक उत्कर्ष और सहनशीलता के विषय मे इतना लिखा वहाँ उनकी
जन्मतिथि के विषय में कुछ भी नही कहा । अतः नामदेव की जन्मतिथि निश्चित करने
में यह परिचयी विशेष सहायता नहीं करती क्योकि इसमें नामदेव के जन्म और जन्म
काल का बिलकुल उल्लेख नही मिलता ।
नाभादास कृत 'भक्तमाल':
'भक्तमाल' के रचना-काल में पूर्ण मतैक्य नहीं है । डॉ० दीनदयालु गुप्त ने
इसका रचना काल संवत् १६८० वि० माना है ।३ नाभादास ने एक छप्पय में नामदेव
विषयक पाँच आश्चर्यजनक घटनाओं का वर्णन किया है परंतु उसमें नामदेव के जन्म
शक का कही उल्लेख नही है ।
प्रियादास ने भी 'भक्तमाल' की अपनी टीका में नामदेव का जन्मकाल नही
दिया है ।
१. संत नामदेवः डॉ० हे० वि० इनामदार पृ० ३०
२. पंजाबातील नामदेव पृ० १५
३. अष्टछाप और वल्लभ संप्रदाय ( पूर्वार्द्ध ) पृ० १०६ ।
५
६६ नामदेव की हिन्दी कविता
भक्तमाला राम रसिकावली में नामदेव की वे ही सब कथायें हैं जो प्रियादास
की 'भक्तमाल' की टीका में हैं। इसमें कोई नवीनता नहीं है।
ज्ञानेश्वर और नामदेव का समकालीनत्वः
ज्ञानेश्वर और नामदेव के समकालीनत्व के संबंध में निम्नलिखित मत प्रस्तुत
किये जाते हैं :-
(१) श्री० भारद्वाज तथा श्री भिंगारकर के परस्परविरोधी मत
'ज्ञानेश्वरी' तथा 'अमृतानुभव' के रचयिता ज्ञानदेव तथा अभंगो के रचयिता
ज्ञानदेव दो भिन्न व्यक्ति हैं तथा उनमें डेढ़ सौ, दो सौ साल का अंतर है। अपने इस मत
का श्री शिवरामबुवा एकनाथ भारदे उर्फ 'भारद्वाज' ने बड़े अभिनिवेश के साथ प्रति-
पादन किया ।¹ उन्होंने 'माझें जन्म पत्र बाबाजी ब्राह्मणें' अभंग के 'अधिक ब्याण्णव
गणित अकरा शतें' के स्थान पर 'अधिक नऊ गणित तेरा शते' ऐसा एक नया काल्प-
निक पाठ सुझाकर नामदेव का जन्मकाल शक १३०६ निश्चित किया । मराठी संत
साहित्य के अनेक अध्येताओ ने उनकी इस स्थापना का खण्डन किया । इनमें प्रमुख हैं
श्री धोपतोबुवा भिंगारकर² तथा पं० पांडुरंग शर्मा ।³ इन दोनो के अनुसार एक ही
ज्ञानेश्वर ने ज्ञानेश्वरी तथा स्फुट अभंगो की रचना की और संत नामदेव संत ज्ञानेश्वर
के समकालीन थे ।
१. 'ज्ञानदेव व नामदेव समकालीन होते काय ?': 'भारद्वाज'—'सुधारक' (मराठी पत्र)
( ५-१२-१८६८)
२. श्री महासाधु ज्ञानेश्वर महाराज याचा काल निर्णय व संक्षिप्त चरित्र : धोपतोबुवा
भिंगारकर, पृ० ३-४ ।
३. (अ) 'नामदेवाचा निर्णय' : श्री० पांडुरंग शर्मा
—भारत इतिहास संशोधक मण्डल (त्रैमासिक पत्रिका) वर्ष ५ वां, अंक १-४,
शक १८४६, पृ० ३०-५८ ।
(ब) 'वारकऱ्याच्या वसाहती'
—भा० इ० सं० मंडल त्रैमासिक पत्रिका, पृ० ३-१८ । वर्षं छठा, अंक
१-४, शक १८४७ ।
(क) ज्ञानदेव व नामदेव समकालीन होते काय ?
—'चित्रमयजगत्' (मराठी पत्रिका) पुणे, अगस्त १६२२ ।
(ख) Historical Position of Namdev P. 335-41
—Annals of the B. O. R. I. (Poona) 1926-27.
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६७
प्रा० वासुदेव बलवंत पटवर्धन ने नामदेव के अभंगों की भाषा को अर्वाचीन
बताकर भाषा विज्ञान के आधार पर नामदेव का काल ज्ञानेश्वर के पश्चात् एक शतक
अर्थात् १४ वीं शताब्दी माना है। वे लिखते हैं :—
‘The fact remains that whatever the vocabulary,
the grammar of the language of Nama’s work as it is
presented in the various Gathas, is far too modern to
admit of Nama’s being a contemporary of Dnyane-
shwar.’ १
डॉ० रा. गो. भांडारकर का मत
डॉ० भांडारकर के अनुसार नामदेव का काल ज्ञानेश्वर के काल के पश्चात्
कम से कम सौ वर्ष बाद का हो। वे सुभाते हैं कि 'नामदेव के हिंदी पदो की भाषा
तेरहवी शताब्दी के हिंदी कवि चंद की भाषा की अपेक्षा अर्वाचीन प्रतीत होती है।
उनके मराठी के अभंगों की भाषा का स्वरूप भी अर्वाचीन होने के कारण तथा उनके
गुरु बिसोबा खेचर का मूर्ति-पूजा विरोध मुसलमानो के मत के साथ साम्य रखने के
कारण नामदेव का काल मुसलमानो के शासन के प्रारंभ अर्थात् चौदहवी शताब्दी के
आसपास हो। वे लिखते हैं :—
‘The date assigned to the birth of Namdeo is Saka 1192 that
is 1270 A. D This makes him a contemporary of Jnandev, the
author of Jnandevi, which was finished in 1290 A. D. But the
Marathi of the latter work is decidedly archaic, while that of
Namdev’s writings has a considerably more modern appear-
ance. Nabhaji in naming the successors of Vishnuswamin
places Jnandev first and Namdev afterwards . a more direct
evidence for the fact that Namdev flourished after Moham-
madans had established themselves in the Maratha country,
is afford- ed by his mention in a song of the destruction of
the idols by the Turks. Namdev, therefore, probably lived
about or after the end of the 14 th Century.’ २
- ‘Influence of Saints of the Prakrit Bhakti School in the Forma-
tion and Growth of Prakrit Language.’
—Wilson Philological Lectures, Bombay, 1917. - Vaishnavism Shaivism and Other
Minor Religious Systems (1913) p. 97.
६८ नामदेव की हिन्दी कविता
डॉ० भांडारकर ने अपने मत की पुष्टि में निम्नलिखित प्रमाण दिये हैं—
(१) ज्ञानेश्वर की भाषा की तुलना में नामदेव की भाषा अर्वाचीन लगती है।
(२) यदि नामदेव का जन्म-काल ११६२-१२०२ माना जाय तो १३ वीं
शताब्दी के हिन्दी कवि चन्द की भाषा पुरानी प्रतीत होती है। उसकी अपेक्षा नामदेव
के हिंदी पदों की भाषा अर्वाचीन लगती है।
(३) नाभादास ने विष्णुस्वामी की जो परंपरा दी है उसमें ज्ञानेश्वर का नाम
प्रथम और नामदेव का बाद में दिया है।
(४) नामदेव के गुरु विसोबा खेचर मूर्ति-पूजा के विरोधी थे। उन्होंने कहा
है—'पाषाण की प्रतिमा कभी बोलती नहीं।' १ इस्लाम भी मूर्ति-पूजा का विरोधी है।
मुसलमानों का शासन १४ वीं शताब्दी में दक्षिण में दृढमूल हुआ। अतः विसोबा खेचर
का काल भी यही हो।
(५) मराठवाड़े में मुसलमानों के प्रवेश अर्थात् १४ वीं शताब्दी का अंत ही
नामदेव का काल हो। यह उनके अभंग की निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट होता है—
ऐसे देव हहि फोडिले तुरकीं।
घातले उदकीं बोभातिना ॥
(तुर्कों ने इस प्रकार मूर्ति-भंजन किया।)
अब डॉ० भांडारकर के इन तर्कों पर क्रमशः विचार करेंगे—
(१) भाषा का अर्वाचीनत्व
लोग नामदेव के मराठी अभंगों की भाषा की नवीनता (अर्वाचीनता) की
दृष्टि से उनका आविर्भाव काल ज्ञानदेव से सौ वर्ष बाद का मानते हैं। परन्तु आधुनिक
भाषाएँ उतनी नवीन नहीं हैं जितनी बहुधा समझी जाती हैं।
ज्ञानदेव नामदेव के समकालीन अवश्य थे परंतु उनकी भाषा की प्राचीनता का
यह कारण नहीं है कि उस समय तक आधुनिक मराठी का आविर्भाव नहीं हुआ था
बल्कि यह कि व्युत्पन्न होने के कारण परंपरागत साहित्यिक भाषा पर उनका अधिकार
था जिसे लिखने में साधारण पढ़े-लिखे होने के कारण नामदेव असमर्थ थे। स्वयं ज्ञान-
देव ने सीधी-सादी मराठी में अभंग रचना की थी।
नामदेव की भाषा की अर्वाचीनता के संबंध में डॉ० रा० द० रानडे का मत
दृष्टव्य है—
१. पाषाणाचा देव बोलेचिना कभी।
—सकल संत गाथा, अभंग १३६१
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ६६
"The fact that there is a difference of language between Jnane-
shwari and the Abhangs of Namdev is not an arguement to
prove any difference of time between the two great saints.
The originals of Namdev’s Abhangs are not presreved. They
have undergone successive change, as they were recited and
have been handed over from mouth to mouth All these
facts account for the modern-ness of Namdeva's style "¹
(२) हिंदी कवि चंद और संत नामदेव—डॉ० भांडारकर नामदेव की हिंदी को
अर्वाचीन तथा १३ वीं शताब्दी के हिंदी कवि चंद की भाषा को पुरानी बताते हैं। इस
संदर्भ में यह ध्यान में रखना होगा कि एक मराठी भाषी संत ( नामदेव ) ने हिंदी में
रचना की है। उनकी भाषा अर्वाचीन न होकर मराठी-सदृश है। प्रत्युत चंद की
मातृभाषा हिंदी होने से उसकी हिंदी शुद्ध हिंदी है वह प्राचीन नहीं।
एक ही कालखण्ड के परंतु विभिन्न मातृभाषी दो कवियों की भाषा शैली की
तुलना समीचीन नहीं जान पड़ती है।
(३) विष्णु स्वामी की परंपरा—विष्णु स्वामी पंथ की परंपरा देते
हुए नाभादास ने अपने 'भक्तमाल' में ज्ञानेश्वर के पश्चात् नामदेव का उल्लेख किया
है। डॉ० भांडारकर ने इसे इन दोनों के समकालीन न होने का प्रमाण प्रस्तुत किया है।
परंतु 'भक्तमाल' में इस प्रकार का कोई उल्लेख नहीं है।² अलबत्ता प्रियादास विरचित
'भक्तमाल' की रसबोधिनी टीका में 'भये उभे शिष्य नामदेव धी त्रिलोचनजू' ऐसा
उल्लेख है जो ज्ञानेश्वर को संबोधित कर किया गया है। प्रियादास को यही कहना
अभिप्रेत है कि नामदेव ज्ञानेश्वर के शिष्य थे। ऐसी परिस्थिति में यह सिद्ध होता है कि
ज्ञानेश्वर तथा नामदेव समकालीन थे।
(४) विसोबा खेचर का मूर्ति-पूजा विरोध—'पाषाण की प्रतिमा बोलती नहीं'
यह बात कम से कम हिंदू धर्म के लिए तो नवीन नहीं थी। इसके लिए विसोबा को
इस्लाम की शरण में जाने की आवश्यकता न थी। एक बात और यह कि मुसलमानों
का शासन दक्षिण में शक १२४० में अविरोध दृढ़मूल हुआ। इसके लिए १४वीं शताब्दी
तक ठहरने की आवश्यकता न थी।
(५) तुर्कों का निर्देश—नामदेव ने मूर्तिभंजन के संदर्भ में तुर्कों का उल्लेख किया
- Mysticism in Maharashtra : R. D. Ranade P. 184.
२. श्री नामदेव चरित्र , पृ० ३८
प्रस्तावना व समीक्षण—रं० ह० मायंगकर
है। डॉ० भांडारकर का कथन है कि The Mohamedans were often
called Turkas i e Turkas by the Hindus in the early times ' परंतु
तुर्कों ने यह मूर्ति भंजन दक्षिण में ही किया ऐसा नामदेव ने नहीं कहा है। संभव है कि शके
१२१२ में नामदेव ने ज्ञानेश्वर के साथ जो तीर्थयात्रा की उस समय की उत्तर भारत की
परिस्थिति की ओर उन्होंने संकेत किया हो। दक्षिण में रहते हुए भी उत्तर में मुसलमानों
के आक्रमणों का इस अभंग में वर्णन करने की संभावना है।
कुछ अंग्रेज ग्रंथकारो जैसे डा० निकाल मैकिनकाल १ आदि ने डॉ० भांडार-
कर द्वारा निर्धारित नामदेव के जन्म काल को ही ग्राह्य माना है अत उनके मत के
परीक्षण की आवश्यकता नहीं।
डॉ० जे० एन० फ़र्कुहर २ ने नामदेव का काल ई० स० १४३० के आस पास
निर्धारित कर उसके आधार पर रामानंद का काल निश्चित किया है।
डा० मोहनसिंह का मत
डा० मोहनसिंह 'दीवाना ३ ने नामदेव का काल सन् १३६० और १४५० ई०
के बीच माना है। इसका आधार उन्होंने नामदेव का मृत गाय जिलानेवाला पद४
माना है, जिसके नामदेव रचित होने में डॉ० राजनारायण मौर्य को संदेह है। ५
डॉ० मोहनसिंह ने फीरोजशाह बह्मनी को ही वह सुलतान माना है जिस ने
नामदेव को मृत गाय जिलाने की आज्ञा दी थी। वह दक्षिण में था और उसका काल
सन् १३६७ से १४२२ ई० के मध्य का है। अन्य फीरोज सुलतान फीरोजशाह खिलजी
( राज्यकाल सन् १२८२ ई० से १२६६ तक ) के साथ नामदेव के काल का
मेल नहीं बैठता और फिरोजशाह तुगलक ( राज्यकाल सन् १३५१ ई० से १३८८ ई०
तक ) के साथ स्थान का मेल नहीं बैठता क्योंकि फीरोजशाह न तो दक्षिण में आया
था और न संत नामदेव दिल्ली ही गये थे। इसी आधार पर डा० मोहनसिंह ने नाम-
1 Psalms of Maratha Saints ( 1919 )
2 Historical Position of Ramanand
—J R A S of Great Britain & Ireland April 1920
३ भक्त शिरोमणि नामदेव की नई जीवनी नई पदावली, पृ० ३
४ सुलतानु पूछै सुनु वे नामा। देखऊ राम तुम्हारे कामा ॥
—गुरु ग्रंथसाहब नामदेव के हिंदी पद, ४७ वाँ
५ हिंदुस्तानी ( जनवरी-मार्च १६६२ ) पृ० ११२
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ७१
देव का काल खींचकर आगे बढ़ा दिया है। उन्होंने एक और तर्क दिया है। वह है
संत नामदेव का रामानंद का शिष्य होना । वे रामानन्द का जन्म सन् १४२० और
३० ई० के बीच तथा कबीर का सन् १४५० और ६० के बीच मानते हैं।
डॉ० मोहनसिंह के इन दोनों तर्कों में कोई तथ्य नही है। इसका तो कही
उल्लेख भी नही है कि रामानन्द नामदेव के गुरु थे। मराठी और हिंदी साहित्य में भी
यह प्रचलित है कि संत ज्ञानेश्वर के पिता के गुरु रामानन्द थे । किन्तु श्री भावे¹ के
मत से उनके गुरु श्रीपाद स्वामी थे । रामानन्द का काल आज भी निश्चित नही है पर
इतना अवश्य निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे संत नामदेव के गुरु नही हो
सकते ।
आचार्य विनयमोहन शर्मा को इस घटना के घटित होने में ही संदेह है। यदि
इस पर विश्वास करें तो यह पद प्रक्षिप्त मानना पड़ेगा । उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपना
मत इस प्रकार व्यक्त किया है— 'यदि किसी सुलतान के दरबार में यह घटना घटी
होती तो वह अवश्य ही लेखबद्ध हुई होती । हो सकता है यह घटनावाला 'पद' भग-
वान विठ्ठल के नाम का चमत्कार प्रदर्शित करने के लिए रचा गया हो । उपर्युक्त
कारणों से नामदेव का फीरोजशाह वहमनी के समय रहना सिद्ध नही होता ।'²
इस घटना के आधार पर नामदेव के काल को सौ वर्ष आगे ले जाना किसी
तरह तर्क-संगत नही कहा जा सकता ।
मेकालिफ का मत
मेकालिफ ने नामदेव के असंग 'मार्के जन्मपत्र बाबाजी ब्राह्मणों' का आधार
लेकर शके ११९२ (तदनुसार स० १२७० ई०) को नामदेव का जन्म-शक माना है—
‘Namdeo was born on Sunday, the 11th day of the light half of
the month of Kartik in the Shaka year 1192 i, e. 1270 A. D.’³
जनम साखी
सं० १८६८ ई० में बाबा पूरणदास की लिखी 'जनम साखी श्री स्वामी नाम-
देव जी की, में वामदेव की बाल विधवा कन्या लक्षावती की कथा आई है। इस कथा में
कहा गया है कि अपनी १२ वर्ष की अवस्था में ही पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा से उसके
पेट से जो बालक पैदा हुआ वही नामदेव है । इस बालक का जन्म रविवार फाल्गुन
१. महाराष्ट्र सारस्वतः वि० ल० भावे, पृ० १३३ ।
२. हिंदी को मराठी संतों की देन पृ० ३०
3. Sikh Religion Vol. VI : Mcauliffe
बद्य पंचमी संवत् १४२० (सं० १३६३ ई०) को हुआ—
बद्य पंचमी संवत् १४२० (सं० १३६३ ई०) को हुआ— संमत चौदा से अरु बीस। चरत कीआ एह धी जगदीस।
फाग मास आगमन करतूती। रितु राज अनूप सुहाई। तिय पंचमी पाई बडाई।
रव दिन एक महुरत आईआ। बामकुमारी बालक पाईआ। बाबा पूरणदास की 'जनम साखी' के इस उद्धरण से फाल्गुन, वसंत पंचमी,
रविवार संवत् १४२० को नामदेव का जन्मकाल निश्चित किया गया है। स्व० म० गो० आटवले ने१ इसे त्याज्य ठहराया है क्योंकि पिले जन्त्री के अनुसार उस दिन
रविवार न आकर गुरुवार आता है। अंग्रेजी तारीख फरवरी १३६४ आती है। और शके १२८५।
'रितु रितुराज अनूप सुहाई। तिय पंचमी' के अनुसार बहुतों ने 'पंचमी' को अपनी सुविधा के अनुरूप 'वसंत पंचमी' गृहीत कर चर्चा करने का प्रयत्न किया है।२
`[L13
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएं ७३
है। इसमें भारद्वाज और भिंगारकर के विवाद का उल्लेख कर कहा गया है—'अखां तां
नामदेव दे जनम मरणादि तारीखों तो जो मरहठी कताव विच दिती आ हन । उपरला
सिटा कढिभासी असे ओह सानु । ठीक वी मलूम देंदा है ।'
स्व० बारटक्के के अनुसार पंजाब युनिवर्सिटी के प्राध्यापक तथा लाहौर की
गुरुद्वारा कमिटी के सभासद ज्ञानी खजानसिंह ने कुछ घटनाओं को छोड़कर इसी मत
का अनुमोदन किया है ।
दरबार कमिटी घुमान द्वारा प्रकाशित बाबा भगतराम चरित 'श्री स्वामी नाम-
देव ' शीर्षक जीवनी में बाबा भगतराय ने सं० १३७० ई० को नामदेव का जन्मकाल
माना है ।
पं० बलदेव प्रसाद ने 'संत बानी संग्रह' में नाभादास के 'भक्तमाल' के आधार
पर नामदेव का जन्मकाल ई० स० १४२३ अर्थात् शके १३४५ के आस पास निश्चित
किया है ।
पं० वंशीधर शास्त्री ने बाबा पूरनदास-चरित 'जनम साखी' में गृहीत नामदेव
का जन्मकाल शक संवत् १४२० (शके १२८५) स० १३६३ ई० को ही प्रामाणिक
माना है ।
पंजाबी परंपरा द्वारा अनुमोदित नामदेव के काल का कोई आधार प्रस्तुत नहीं
किया गया है ।
महाराष्ट्रीय विद्वानों के मत :
सुप्रसिद्ध दार्शनिक डॉ० रा० द० रानडे लिखते हैं कि नामदेव ही के एक अभंग
के अनुसार उनका जन्म शके ११६२ में हुआ :—
"From an Abhang written by Namdeva himself, it seems thaI
Namdeva was born in 1270 A. D. (Sake 1192), that is a few years
before Dnanadeva. Namdeva tells us that a certain Brahmin Baba-
ji by name had cast his horoscope, toretelling that Namdeva would
compose a hundred crores of Abhangs '’¹
संत साहित्य के मर्मज्ञ डॉ० शं० गो० तुलपुले बिना किसी तर्क के शके ११६२
ही को नामदेव का जन्मकाल मानते हैं—'संप्रति नीचे उद्धृत किये गये अभंग को
आधार मानकर स्वर्गीय भिंगारकर ने नामदेव का जो काल निश्चित किया है, वह
समीचीन प्रतीत होता है ।'²
१. Mysticism in Maharashtra p. 185.
२. पाँच संत कवि,—पृ० १३७ ।
प्रथम भाग: साखी एवं पद संग्रह (नाम-सुमिरन व गुरु-महिमा)
७४ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव-विरचित निम्नलिखित अभंग¹ को आधार मानकर श्री ल० ग०
पांगारकर नामदेव का जन्मकाल शके ११६२ मानते हैं—'शके ११६२, प्रभव संवत्सर,
कार्तिक शुक्ल ११, रविवार को सूर्योदय के समय गोणाई प्रसूत होकर उसको जो पुत्र
हुआ, उसका नाम नामदेव रखा गया ।' श्री० पांगारकर नामदेव को अयोनिज
मानते हैं ।²
हिन्दी के विद्वानों के मत
आचार्य विनयमोहन शर्मा डॉ० मोहनसिंह 'दीवाना' के मत का खण्डन करते
हुए नामदेव के जन्मकाल के सम्बन्ध में अपना मत इस प्रकार व्यक्त करते हैं—'ज्ञानदेव
का समय उन्हों की कृति ज्ञानेश्वरी से प्राय: निर्णीत ही है । और वह है—सं० १२७५-
१२६६ ई० । नामदेव, ज्ञानदेव की समाधि के लगभग ५० वर्ष बाद समाधिस्थ हुए
अर्थात् १३५० ई० में उनका निर्वाण हुआ । उनका जन्म ई० सं० १२७० में हुआ ।
फीरोज बहमनी का काल १३६७-१४२२ ई० है जिसे नामदेव का काल नही माना जा
सकता ।'³
आचार्य परशुराम चतुर्वेदी महाराष्ट्र में प्रचलित नामदेव के जन्म शक ही का
अनुमोदन करते हैं—
'सन्त नामदेव के जन्म का समय कार्तिक सुदी ११ शके ११६२ ( तदनुसार
सन् १२७० ई० अथवा सं० १३२६ ) कहा जाता है और इस विषय में अधिक मतभेद
नही दिखलाई पड़ता ।'⁴
डॉ० बड़थ्वाल लिखते हैं—'मराठी के उनके एक अभंग से पता चलता है कि
उनका जन्म संवत् १३२७ ( सन् १२७० ई० ) में हुआ था ।'⁵ इस विषय में वे डॉ०
रानडे के मत से सहमत है ।
डॉ० रामकुमार वर्मा नामदेव द्वारा दी गई तिथि को ही प्रामाणिक मानते
हैं—'ये दामा शेट नामक दर्जी के पुत्र थे और इनका जन्म संवत् १३२७ ( सन् १२७०
ई० ) में हुआ था ।'⁶
१. माझे जन्मपत्र बाबाजी ब्राह्मणे । सकल संत गाथा, अभंग १२५४
२. मराठी वाङ्मयाचा इतिहास ( खंड पहला )—पृ० १५५
३. हिन्दी को मराठी सन्तों की देन—पृ० १०६
४. उत्तरी भारत की सन्त परम्परा—पृ० ११०
५. हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय—पृ० ६६
६. हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास—पृ० २१७
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ७५
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार नामदेव का जन्मकाल शके ११८६ है ।
'महाराष्ट्र देश में नामदेव का जन्मकाल शक संवत् ११८६ और मृत्यु काल शक संवत्
१२७२ प्रसिद्ध है ।'¹
संभाव्य जन्म शक
ज्ञानदेवकालीन नामदेव का जन्मकाल निम्नलिखित तीन शको के आधार पर
निश्चित करना होगा—
(१) शके ११८५
(२) शके ११८६
(३) शके ११९२
श्री शं० पु० जोशी ने शके ११८५ को नामदेव का जन्मकाल माना है ।²
श्री आजगांवकर ने अपने नामदेव चरित्र में इसी का अनुमोदन किया है ।³
श्री भारद्वाज⁴ ने शके ११८६ को न्याय्य ठहराया है । यह शक अभंग के
साथ विसंगत होने के कारण उसको नामदेव का जन्म शक नही माना जा सकता ।
ग्राह्य शक और अभंग की चिकित्सा
शके ११९२ को नामदेव का जन्मकाल स्वीकार करने से इस समस्या के हल
होने की सम्भावना है । परन्तु इसमें एक बात खटकती है । शके ११९२ में 'प्रभव'
नही बल्कि 'प्रमोद' संवत्सर आता है । इस विवाद विषय को छोड़ दिया जाय तो
तिथि, वार तथा मास सब मेल खाते हैं । दोनों संवत्सरो के नाम का प्रारम्भ 'प्र' से
होने के कारण लेखन-प्रमाद की भी सम्भावना है ।
निष्कर्ष
'माझें जन्म पत्र बाबाजी ब्राह्मणें' शीर्षक अभंग में नामदेव के जन्म के शक,
मास, तिथि तथा वार आदि सम्बन्धी सत्य पर आधारित जानकारी पाई जाती है ।
इसमें विसंगतियां कम और सुसंगतियां अधिक मात्रा में पाई जाती हैं । ज्ञानदेवकालीन
नामदेव के साथ इनका मेल बैठने से शक संवत् ११९२ को ही नामदेव का जन्म काल
मानना उचित होगा ।
१. हिन्दी साहित्य का इतिहास ( सं० २०२२ का संस्करण ) पृ० ६८ ।
२. पंजाबातील नामदेव, — पृ० १५
३. संत शिरोमणि नामदेव महाराज आणि त्यांचे समकालीन संत ।
४. श्री भारद्वाज के लेख: 'सुधारक' १८६८ ।
७६ नामदेव की हिन्दी कविता
नामदेव का समाधि शक विकृत नाम संवत्सर शके १२७२, आषाढ वद्य १३,
शनिवार निश्चित किया गया है। अतः शके ११९२ को नामदेव का जन्म काल तथा
शके १२७२ को उनका समाधि काल मानना ‘ऐंशी वर्षे आयुष्य पत्रिका प्रमाण’ इस
चरण के साथ पूर्णतया सुसंगत है।
जन्म स्थान
सबसे जटिल तथा महत्त्वपूर्ण प्रश्न नामदेव के जन्म स्थान का है। जन्मकाल
की ही तरह उनके जन्म स्थान के सम्बन्ध में भी अनेक मत प्रचलित हैं। इस विषय
में अभी तक कोई एक निश्चित धारणा नहीं बनाई जा सकी है।
नामदेव के जन्म स्थान के सम्बन्ध में दो मत प्रस्तुत किये जाते हैं—
(१) नामदेव का जन्म स्थान पंढरपुर है।
(२) नामदेव का मूल गाँव नरसी है और वहीं उनका जन्म हुआ।
नामदेव का जन्म पंढरपुर में होने के पक्ष में निम्नलिखित प्रमाण उपलब्ध हैं—
जनाबाई अपने एक अभंग में कहती है—‘नामदेव के जन्म के पूर्व उसके माता-
पिता पंढरपुर में रहते थे। गोणाई ने पुत्र प्राप्ति के लिए मनौती की। उसको जो बेटा
हुआ वही नामदेव है।’¹
सन्त एकनाथ ने नामदेव-जन्म की इसी कथा को दुहराया है।²
हिन्दी में नामदेव का सर्वप्रथम चरित्र लिखने वाले परिचयीकार अनन्तदास
हैं। उन्होंने ‘नामदेव की परचै’ में नामदेव का जन्मस्थान पंढरपुर बताया है।³
डॉ० भागीरथ मिश्र स्पष्टतः लिखते हैं कि ‘नामदेव का जन्म कराड के नरसी
१. गोणाईने नवस केला । देवा पुत्र देई भला ॥
शुद्ध देखोनिया भाव । पोटी आले नामदेव ।
—आपटे प्रत, अभंग १३६
२ द्वारकेहुनि विठु पंढरीये आला । नामयाचा पूर्वज दामाशेट्टी वहिला ।
—आपटे प्रत, अभंग १५५७
३ पंढरपुर जहाँ नगर सहन भोग कराही ।
नामदेव को पिता बसे बैरोजा माही ॥
जाको पुत्र पुनीत नामदेव सब विधि पूरो ।
सकल सिरोमनि सन्त विप्र सूर निभे सूरो ॥
—नामदेव की परिचयी ( हस्तलिखित प्रति )
जयकर ग्रन्थालय, पूना विश्वविद्यालय, पूना।
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ७७
बामनी गाँव में हुआ था, और कुछ ही दिन पश्चात् उनके माँ-बाप पंढरपुर जाकर
रहने लगे थे ।'¹
डॉ० भगीरथ मिश्र इस सम्बन्ध में डॉ० भाडारकर, माधवराव अप्पाजी मुले,
पाडुरंग शर्मा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य विनयमोहन शर्मा, आचार्य परशुराम
चतुर्वेदी और मेकालिफ के मत का ही अनुसरण करते हैं । वे डॉ० शं० गो० तुलपुले,
श्री० पांगारकर, धो भावे, श्री केशवराव कोरटकर तथा डॉ० ईनामदार की इस
स्थापना को अस्वीकार करते हैं कि नामदेव का जन्म परभणी जिले के नरसी बामनी
गाँव में हुआ था ।
इस सन्दर्भ में डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित का मत दृष्टव्य है—'डॉ० भगीरथ
मिश्र के विचारों में विभिन्न मतों के बीच समन्वय खोज निकालने की भावना ही
प्रबल है । क्योंकि नामदेव द्वारा अपने पिता के सम्बन्ध में यह कहा जाना कि वह
नरसी बमनी के निवासी थे यह सिद्ध नहीं करता कि नामदेव का जन्म भी यही हुआ
था । और यह नरसी बमनी कराड के अन्तर्गत वाली ही है । नरसो बमनी उनके कुल
का मूलस्थान हो सकती है । इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस
अभंग में दामा शेट को नरसी बमनी का शिंपी बताया गया है उसे अनेक विद्वानों ने
प्रक्षिप्त बताया है । अत. उसके आधार पर कुछ भी कहना सम्भव नही है ।'²
सारा विवाद इस बात को लेकर चला है कि नरसी ब्राह्मणी कहाँ स्थित है ?
सातारा जिले के कराड के पास अथवा मराठवाडा के परभणी जिले में ? इस विषय
में विद्वानों में मतैक्य नहीं है । नरसी की स्थिति के सम्बन्ध में तीन मत प्रस्तुत किये
जाते हैं :—
(१) कराड के पास कृष्णा-तट पर
(२) सोलापुर जिले की बार्सी के पास
(३) मराठवाड़ा के परभणी जिले में
अब हम क्रमशः एक-एक मत पर विचार करेंगे—
(१) कराड के पास कृष्णा तट पर .—डॉ० भाडारकर नरसी ब्राह्मणी गाँव
को कराड के समीप सातारा जिले में स्थित बताते हैं जो अब बहे नरसिंगपूर अथवा
कोले नरसिंगपूर कहलाता है ।³
१. सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली—पृ० ३२
२. नामदेव का कृतित्व . डॉ० आनंदप्रकाश दीक्षित—पृ० ११२
'राष्ट्रवाणी'—सन्त नामदेव विशेषांक,
—अक्तूबर-नवंबर, १६७०
३. वैष्णविज्म शैविज्म एण्ड अदर मायनर रिलीजस सिस्टम्स—पृ० ८१
'श्री नामदेव चरित्र' के लेखक श्री माधव अप्पाजी मुले के अनुसार—'श्री
नामदेव महाराज के वंश का मूल पुरुष यदुशेट था। यह जाति का 'शिंपी' (दर्जी)
था और उसका उपनाम रेलेकर था। यह कराड के निकट कृष्णा-तट पर नरसी
ब्राह्मणी नामक एक देहात का रहने वाला था। इसी देहात को बहे नरसिंगपूर अथवा
कोले नरसिंगपूर कहा जाता है।'१
बहे नरसिंगपूर अथवा कोले नरसिंगपूर को ही नामदेव की नरसी मानकर तथा
वहाँ के दैवत श्री नरसिंह का नामदेव के घराने के साथ सम्बन्ध दिखाते हुए स्व०
पाटसकर लिखते हैं—
'नामदेव के पूर्वजों का कुल दैवत श्री नरसिंह था। वहां की समाधि नामदेव
की न होकर उनके पूर्वजो की है जो नरसिंह के परम भक्त थे।'२
डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित भी नरसी को कराड के पास मानने के पक्ष में हैं।
वे स्पष्टतया लिखते हैं—'यों तो कराड के पास की नरसी बमनी में उनके पूर्वज की
समाधि भी है और इससे उनका मूलस्थान वह अधिक सिद्ध हो सकता है।'३
इस विषय में डॉ० बडथ्वाल,४ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल,५ आचार्य विनयमोहन
शर्मा,६ आचार्य परशुराम चतुर्वेदी,७ डॉ० रामकुमार वर्मा,८ डॉ० रामचन्द्र
१. श्री नामदेव चरित्र (पुनर्मुद्रण, सन् १९५२), पृ० २७
२. बालभक्त श्री नामदेव महाराज दरोडेखोर होते काय ? पृ० १३
३. नामदेव का कृतित्व : 'राष्ट्रवाणी'
—अक्तूबर नवम्बर १९७०,—पृ० ११२
४. 'नामदेव का जन्म सातारा जिले के नरसी बमनी गाँव में एक शैव परिवार में
हुआ था।' —हिन्दी काव्य में निर्गुण संप्रदाय, पृ० ६५।
५. 'ये दक्षिण के नरसी वमनी (सातार जिला) के दरजी थे।
—हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ० ६८।
६. 'नामदेव ने नरसी ब्राह्मणी गांव में जन्म धारण किया।'
—हिन्दी को मराठी संतों की देन, पृ० ६८।
७. 'इनका (नामदेव का) जन्म सातारा जिले के अन्तर्गत कन्हाड के निकटवर्ती किसी
नरसी बमनी गाँव में हुआ था।'
—उत्तरी भारत की संत परम्परा, पृ० १०६।
८. 'क्योकि नामदेव का कुटुम्ब पहले नरसी बामणी गाँव (कन्हाड-सातारा) में ही
निवास करता था। बाद में वह पंढरपुर में आ बसा था, जहाँ नामदेव का जन्म
हुआ।' —हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृ० २३६।
संत नामदेव : व्यक्तित्व और रचनाएँ ७६
मिश्र¹ तथा मेकलिफ² भी यही मत रखते हैं।
(२) सोलापुर जिले की बार्शी के पास :—ऐसा भी एक मत प्रस्तुत किया
जाता है कि नरसी ब्राह्मणी सोलापुर जिले की बार्शी के पास है। गाथा में बार्शी का
उल्लेख दो बार आया है—
(१) बारसी भगवन्त तेरसी तिळया । विट्ठलु सोयरीया पांडुरंगा ॥
अभंग १७५३।
यह अभंग विष्णुदास नामा का है संत नामदेव का नही ।
(२) द्वादशीच्या गावी जाहला उपदेश । देवावीण ओस स्थल नाही ।
अभंग १३६१
इस अभंग से इतना ही पता चलता है कि बिसोबा खेचर ने नामदेव को बार्सी
के भगवंत के मंदिर मे उपदेश किया।
परन्तु सोलापुर जिले में नरसी अथवा नरसी ब्राह्मणी अथवा नरसी बामणी
नाम का गांव आज भी नही है और पहले होने का प्रमाण उपलब्ध नही होता ।
(३) मराठवाडा के परभणी जिले में :—कुछ वर्ष पहले तक अर्थात् सं०
१९२६ ई० तक नरसी ब्राह्मणी को जिला सातारा में माना जाता था। पर १९२६ में
पूना के भारत इतिहास संशोधक मंडल की त्रैमासिक पत्रिका मे श्री० केशवराव कोरटकर
का एक लेख छपा जिसमें बताया गया कि नरसी ब्राह्मणी गांव मराठवाडा के परभणी
जिले में है। तब से लगभग सभी विद्वान् परभणी जिले की नरसी ब्राह्मणी को नामदेव
का जन्मस्थान मानने लगे है। श्री पांगारकर, डॉ० शं० गो० तुलपुले, न्यायमूर्ति
केशवराव कोरटकर, डॉ० हे० वि० इनामदार आदि इसी मत के समर्थक है।
श्री पांगारकर के अनुसार 'नरसी बामणी मोगलाई में परभणी जिले मे है।'³
डॉ० शं० गो० तुलपुले भी इस विषय में श्री पांगारकर से सहमत है—'उनका
(नामदेव का) पिता दामा शेट शिंपी मूलतः परभणी प्रांत के नरसी बामणी गाँव का
रहने वाला था।'⁴
१. 'बम्बई अहाते के सातारा जिलान्तर्गत नरसी बमनी ग्राम में नामदेव का जन्म
हुआ।'
—संत नामदेव और हिन्दी पद साहित्य, पृ० ६० ।
2. 'Namdev was the son of Damasheti, a tailor who resided at
Narsi Bamani, a village near Karad'.
—Sikh Religion Vol. VI, p. 17.
३. मराठी वाङ्मयाचा इतिहास (खंड पहला) पृ० ५५५ ।
४. पाँच संत कवी, पृ० १३७ ।
८० नामदेव की हिन्दी कविता
न्यायमूर्ति केशवराव कोरटकर के अनुसार 'नरसी पुरानी हैदराबाद रियासत के
(आज के महाराष्ट्र राज्य के) परभणी जिले के हिंगोली तालुके में है। ब्राह्मणी नाम का
गाँव वहाँ नहीं है। अलबत्ता बामणी नामक एक गाँव है जो नरसी से दस कोस पर है।
यह भी इसी परभणी जिले में है। ये दोनों गाँव परस्पर कैसे संबद्ध हुए यह कहा नहीं
जा सकता। औंढ्या नागनाथ का मंदिर नरसी से पाँच कोस पर है। नामदेव-चरित्र में
ऐसा उल्लेख पाया जाता है कि नामदेव प्रतिदिन नागनाथ के दर्शन के लिए जाया करते
थे। नामदेव का नागनाथ के दर्शन के लिए प्रतिदिन नरसी से औंढ्या जाना सम्भव है
परन्तु नरसी को यदि हम बार्शी के पास मानें तो नामदेव का नित्य नागनाथ के दर्शन
के लिए जाना युक्ति-संगत नहीं लगता क्योंकि बार्शी से औंढ्या नागनाथ ४० कोस अथवा
उससे भी अधिक दूरी पर है। मेरा अपना गाँव कसबा कोरट है जो औंढा से तीन कोस
पर है। मेरे गाँव ही में नहीं तो हमारे इलाके में सभी इसी नरसी को नामदेव की नरसी
समझते हैं।'¹
डॉ० हे० वि० इनामदार² श्री० केशवराव कोरटकर के मत का समर्थन कर
नरसी को मराठवाड़ा के परभणी जिले में ही मानते हैं। वे निम्नलिखित तर्क उपस्थित
कर नरसी को वराड के पास मानने वालों के मत का खण्डन करते हैं--
(१) दामा शेट का विट्ठल का उपासक होने का गाथा में³ उल्लेख है परन्तु
उनके नरसिंह के भक्त होने का कहीं निर्देश नहीं पाया जाता। प्रस्तुत अभंग प्रक्षिप्त है।
उसी में नामदेव की डकैती का भी उल्लेख है।
(२) नरसिंह का मंदिर नरसिंगपूर में है और केशवराज की मूर्ति तांबवे में है।
(३) श्री पाटसकर के अनुसार नरसिंगपूर के पास नदी तट पर जो समाधि है
वह सिद्धेश्वर महाराज के बड़े बेटे की है। वह समाधि नामदेव के पूर्वजों की नहीं है।
नरसी का मराठवाड़े में होने का एक और प्रमाण
महाराष्ट्र शासन के प्रकाशन विभाग ने 'महाराष्ट्र के जिले · परभणी' नामक एक
पुस्तक बम्बई से प्रकाशित की है। इसमें औंढ्या नागनाथ, नरसी और बामणी इन तीन
गाँवों का स्वतन्त्र रीति से उल्लेख किया गया है।
१. 'नामदेवाची नरसी', पृ० १२०-१२१ ।
—भारत इतिहास संशोधक मंडल, त्रैमासिक पत्रिका, वर्ष ७ वाँ, अंक १-४ ।
२. संत नामदेव डॉ० हे० वि० इनामदार, पृ० ३० ।
३. नरसी ब्राह्मणीचा दामा शेट शिपी ।
केशीराज रूपी मग्न असे ।
—आवटे प्रत, अभंग १२४५ ।