सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ नामदेव की हिन्दी कविता
डॉ० भांडारकर ने अपने मत की पुष्टि में निम्नलिखित प्रमाण दिये हैं—
(१) ज्ञानेश्वर की भाषा की तुलना में नामदेव की भाषा अर्वाचीन लगती है।
(२) यदि नामदेव का जन्म-काल ११६२-१२०२ माना जाय तो १३ वीं
शताब्दी के हिन्दी कवि चन्द की भाषा पुरानी प्रतीत होती है। उसकी अपेक्षा नामदेव
के हिंदी पदों की भाषा अर्वाचीन लगती है।
(३) नाभादास ने विष्णुस्वामी की जो परंपरा दी है उसमें ज्ञानेश्वर का नाम
प्रथम और नामदेव का बाद में दिया है।
(४) नामदेव के गुरु विसोबा खेचर मूर्ति-पूजा के विरोधी थे। उन्होंने कहा
है—'पाषाण की प्रतिमा कभी बोलती नहीं।' १ इस्लाम भी मूर्ति-पूजा का विरोधी है।
मुसलमानों का शासन १४ वीं शताब्दी में दक्षिण में दृढमूल हुआ। अतः विसोबा खेचर
का काल भी यही हो।
(५) मराठवाड़े में मुसलमानों के प्रवेश अर्थात् १४ वीं शताब्दी का अंत ही
नामदेव का काल हो। यह उनके अभंग की निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट होता है—
ऐसे देव हहि फोडिले तुरकीं।
घातले उदकीं बोभातिना ॥
(तुर्कों ने इस प्रकार मूर्ति-भंजन किया।)
अब डॉ० भांडारकर के इन तर्कों पर क्रमशः विचार करेंगे—
(१) भाषा का अर्वाचीनत्व
लोग नामदेव के मराठी अभंगों की भाषा की नवीनता (अर्वाचीनता) की
दृष्टि से उनका आविर्भाव काल ज्ञानदेव से सौ वर्ष बाद का मानते हैं। परन्तु आधुनिक
भाषाएँ उतनी नवीन नहीं हैं जितनी बहुधा समझी जाती हैं।
ज्ञानदेव नामदेव के समकालीन अवश्य थे परंतु उनकी भाषा की प्राचीनता का
यह कारण नहीं है कि उस समय तक आधुनिक मराठी का आविर्भाव नहीं हुआ था
बल्कि यह कि व्युत्पन्न होने के कारण परंपरागत साहित्यिक भाषा पर उनका अधिकार
था जिसे लिखने में साधारण पढ़े-लिखे होने के कारण नामदेव असमर्थ थे। स्वयं ज्ञान-
देव ने सीधी-सादी मराठी में अभंग रचना की थी।
नामदेव की भाषा की अर्वाचीनता के संबंध में डॉ० रा० द० रानडे का मत
दृष्टव्य है—
१. पाषाणाचा देव बोलेचिना कभी।
—सकल संत गाथा, अभंग १३६१