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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 332 में से

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पृष्ठ 60

संत नामदेव की हिन्दी कविता ६३
तत्कालीन संतो और उत्तरकालीन संतो ने भी पर्याप्त मात्रा में लिया है। नामदेव के
बचपन से लेकर ज्ञानेश्वर की समाधि और उसके बाद एक तीर्थयात्रा का उल्लेख तो
मिलता ही है। ज्ञानेश्वर की समाधि (ई० सं० १२६४) के समय नामदेव (जन्म ई०
स० १२७०) २६ वर्ष के थे। उसके बाद वे तीर्थयात्रा के लिए गये। उसके बाद के
जीवन में नामदेव कहाँ रहे, क्या करते रहे, क्या चमत्कार किये आदि किसी भी एक
घटना का उल्लेख मराठी साहित्य और इतिहास में नही मिलता। मराठी का सारा संत
साहित्य भी नामदेव के उत्तरकालीन जीवन के बारे में बिलकुल मौन है। इस बात को
देखकर मुझे ऐसा लगता है कि नामदेव अपने जीवन के उत्तरकाल में महाराष्ट्र के
बाहर रहे। संभवत. इस काल में थे पंजाब में रहे हो। इसीलिए उनके उत्तरकालीन
जीवन का उल्लेख महाराष्ट्र में कही भी नही मिलता।
नामदेव रचित हिन्दी पदों के वर्ण्य विषय की बात अवश्य ही विचारणीय है।
वस्तुतः नामदेव ने जब बिसोबा खेचर से दीक्षा ली तभी उनमे एक प्रकार का परिवर्तन
आ गया जिसका संकेत मराठी अभंगों में १ भी कही-कही मिल जाता है। उसके बाद
उन्हे ईश्वर की सर्वव्यापकता का ज्ञान हुआ और धीरे-धीरे पंढरी के विट्ठल के प्रति उनका
मोह कम होने लगा। ज्ञानेश्वर की समाधि के पश्चात् शक १२५२ के आस पास वे जब
दूसरी बार तीर्थयात्रा के लिए गये थे तब उन्हे ईश्वर के विश्वरूप का ज्ञान हुआ और
वे सभी जगह विट्ठल को देखने लगे ।२ उत्तर भारत में उस समय नाथो और सिद्धो का
बड़ा प्रभाव था जिससे नामदेव बच नही सके। उन्होंने महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक
की साधना और भक्ति देखी थी अतः उनकी अनुभूति में एक परिपक्वता आ गई थी।
हिन्दी पदों में अनुभूति की यही परिपक्वता व्यक्त हुई है। कथन शैली, भाषा, छंद आदि
सब उत्तर भारत की परंपरा का है। उन्होंने तत्कालीन उत्तर भारत की साधना पद्धति
को आधार बनाकर भक्ति का प्रचार किया। इन बातो से स्पष्ट है कि मराठी अभंगो
का रचयिता नामदेव तथा हिन्दी पदों का रचयिता नामदेव दोनो एक ही हैं। अन्तर
१. सतसंगे माझा पालट झाला।
पाहता विठुला रूप तुझें ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १६६८ ।
२. पाषाणाचा देव बोलत भलताते ।
सांगते ऐकते मूर्ख दोघे ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १३६१ ।
ईभे बीठलु ऊभे बीठलु, बीठल बिनु संसारु नही।
थान थनंतरि नामा प्रणवे पूरि रहिउ तू सरब मही ॥
—पंजाबातील नामदेव, पृ० ८३ ।